बुधवार, 30 दिसंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

साङ्‍ख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः।
 एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम्‌॥

उपर्युक्त संन्यास और कर्मयोग को मूर्ख लोग पृथक्‌-पृथक् फल देने वाले कहते हैं न कि पण्डितजन, क्योंकि दोनों में से एक में भी सम्यक्‌ प्रकार से स्थित पुरुष दोनों के फलरूप परमात्मा को प्राप्त होता है
 ॥4॥

~ श्लोक 4 - अध्याय 5 - कर्मयोग-कृष्णभावनाभावित कर्म

मंगलवार, 29 दिसंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

ज्ञेयः स नित्यसन्न्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्‍क्षति।
 निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते॥

हे अर्जुन! जो पुरुष न किसी से द्वेष करता है और न किसी की आकांक्षा करता है, वह कर्मयोगी सदा संन्यासी ही समझने योग्य है क्योंकि राग-द्वेषादि द्वंद्वों से रहित पुरुष सुखपूर्वक संसार बंधन से मुक्त हो जाता है
 ॥3॥

~ श्लोक 3 - अध्याय 5 - कर्मयोग-कृष्णभावनाभावित कर्म

रविवार, 27 दिसंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

श्रीभगवानुवाच
 सन्न्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ।
 तयोस्तु कर्मसन्न्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते॥

श्री भगवान बोले- कर्म संन्यास और कर्मयोग- ये दोनों ही परम कल्याण के करने वाले हैं, परन्तु उन दोनों में भी कर्म संन्यास से कर्मयोग साधन में सुगम होने से श्रेष्ठ है
 ॥2॥

~ श्लोक 2 - अध्याय 5 - कर्मयोग-कृष्णभावनाभावित कर्म

बुधवार, 23 दिसंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

( सांख्ययोग और कर्मयोग का निर्णय ) 
 अर्जुन उवाच
 सन्न्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि।
 यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम्‌॥

अर्जुन बोले- हे कृष्ण! आप कर्मों के संन्यास की और फिर कर्मयोग की प्रशंसा करते हैं। इसलिए इन दोनों में से जो एक मेरे लिए भलीभाँति निश्चित कल्याणकारक साधन हो, उसको कहिए
 ॥1॥

~ श्लोक 1 - अध्याय 5 - कर्मयोग-कृष्णभावनाभावित कर्म

मंगलवार, 22 दिसंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

तस्मादज्ञानसम्भूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनात्मनः।
 छित्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत॥

इसलिए हे भरतवंशी अर्जुन! तू हृदय में स्थित इस अज्ञानजनित अपने संशय का विवेकज्ञान रूप तलवार द्वारा छेदन करके समत्वरूप कर्मयोग में स्थित हो जा और युद्ध के लिए खड़ा हो जा
 ॥42॥

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे ज्ञानकर्मसंन्यास योगो नाम चतुर्थोऽध्यायः॥4॥

~ श्लोक 42 - अध्याय 4 - दिव्य ज्ञान

सोमवार, 21 दिसंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

योगसन्नयस्तकर्माणं ज्ञानसञ्न्निसंशयम्‌।
 आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय॥

हे धनंजय! जिसने कर्मयोग की विधि से समस्त कर्मों का परमात्मा में अर्पण कर दिया है और जिसने विवेक द्वारा समस्त संशयों का नाश कर दिया है, ऐसे वश में किए हुए अन्तःकरण वाले पुरुष को कर्म नहीं बाँधते
 ॥41॥

~ श्लोक 41 - अध्याय 4 - दिव्य ज्ञान

रविवार, 20 दिसंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

अज्ञश्चश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति।
 नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः॥

विवेकहीन और श्रद्धारहित संशययुक्त मनुष्य परमार्थ से अवश्य भ्रष्ट हो जाता है। ऐसे संशययुक्त मनुष्य के लिए न यह लोक है, न परलोक है और न सुख ही है
 ॥40॥

~ श्लोक 40 - अध्याय 4 - दिव्य ज्ञान

शुक्रवार, 18 दिसंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः।
 ज्ञानं लब्धवा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति॥

जितेन्द्रिय, साधनपरायण और श्रद्धावान मनुष्य ज्ञान को प्राप्त होता है तथा ज्ञान को प्राप्त होकर वह बिना विलम्ब के- तत्काल ही भगवत्प्राप्तिरूप परम शान्ति को प्राप्त हो जाता है
 ॥39॥

~ श्लोक 39 - अध्याय 4 - दिव्य ज्ञान

गुरुवार, 17 दिसंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।
 तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति॥

इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला निःसंदेह कुछ भी नहीं है। उस ज्ञान को कितने ही काल से कर्मयोग द्वारा शुद्धान्तःकरण हुआ मनुष्य अपने-आप ही आत्मा में पा लेता है
 ॥38॥

~ श्लोक 38 - अध्याय 4 - दिव्य ज्ञान

बुधवार, 16 दिसंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन।
 ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा॥

क्योंकि हे अर्जुन! जैसे प्रज्वलित अग्नि ईंधनों को भस्ममय कर देता है, वैसे ही ज्ञानरूप अग्नि सम्पूर्ण कर्मों को भस्ममय कर देता है
 ॥37॥

~ श्लोक 37 - अध्याय 4 - दिव्य ज्ञान

मंगलवार, 15 दिसंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः।
 सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि॥

यदि तू अन्य सब पापियों से भी अधिक पाप करने वाला है, तो भी तू ज्ञान रूप नौका द्वारा निःसंदेह सम्पूर्ण पाप-समुद्र से भलीभाँति तर जाएगा
 ॥36॥

~ श्लोक 36 - अध्याय 4 - दिव्य ज्ञान

सोमवार, 14 दिसंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव।
 येन भुतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि॥

जिसको जानकर फिर तू इस प्रकार मोह को नहीं प्राप्त होगा तथा हे अर्जुन! जिस ज्ञान द्वारा तू सम्पूर्ण भूतों को निःशेषभाव से पहले अपने में (गीता अध्याय 6 श्लोक 29 में देखना चाहिए।) और पीछे मुझ सच्चिदानन्दघन परमात्मा में देखेगा। (गीता अध्याय 6 श्लोक 30 में देखना चाहिए।)
 ॥35॥

~ श्लोक 35 - अध्याय 4 - दिव्य ज्ञान

रविवार, 13 दिसंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।
 उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्वदर्शिनः॥

उस ज्ञान को तू तत्वदर्शी ज्ञानियों के पास जाकर समझ, उनको भलीभाँति दण्डवत्‌ प्रणाम करने से, उनकी सेवा करने से और कपट छोड़कर सरलतापूर्वक प्रश्न करने से वे परमात्म तत्व को भलीभाँति जानने वाले ज्ञानी महात्मा तुझे उस तत्वज्ञान का उपदेश करेंगे
 ॥34॥

~ श्लोक 34 - अध्याय 4 - दिव्य ज्ञान

गुरुवार, 10 दिसंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

( ज्ञान की महिमा ) श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप।
 सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते॥

हे परंतप अर्जुन! द्रव्यमय यज्ञ की अपेक्षा ज्ञान यज्ञ अत्यन्त श्रेष्ठ है तथा यावन्मात्र सम्पूर्ण कर्म ज्ञान में समाप्त हो जाते हैं
 ॥33॥

~ श्लोक 33 - अध्याय 4 - दिव्य ज्ञान

सोमवार, 7 दिसंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे।
 कर्मजान्विद्धि तान्सर्वानेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे॥

इसी प्रकार और भी बहुत तरह के यज्ञ वेद की वाणी में विस्तार से कहे गए हैं। उन सबको तू मन, इन्द्रिय और शरीर की क्रिया द्वारा सम्पन्न होने वाले जान, इस प्रकार तत्व से जानकर उनके अनुष्ठान द्वारा तू कर्म बंधन से सर्वथा मुक्त हो जाएगा
 ॥32॥

~ श्लोक 32 - अध्याय 4 - दिव्य ज्ञान

शुक्रवार, 4 दिसंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम्‌।
 नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम॥

हे कुरुश्रेष्ठ अर्जुन! यज्ञ से बचे हुए अमृत का अनुभव करने वाले योगीजन सनातन परब्रह्म परमात्मा को प्राप्त होते हैं। और यज्ञ न करने वाले पुरुष के लिए तो यह मनुष्यलोक भी सुखदायक नहीं है, फिर परलोक कैसे सुखदायक हो सकता है?
 ॥31॥

~ श्लोक 31 - अध्याय 4 - दिव्य ज्ञान

गुरुवार, 3 दिसंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथापरे।
 प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः॥
 अपरे नियताहाराः प्राणान्प्राणेषु जुह्वति।
 सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः॥

दूसरे कितने ही योगीजन अपान वायु में प्राणवायु को हवन करते हैं, वैसे ही अन्य योगीजन प्राणवायु में अपान वायु को हवन करते हैं तथा अन्य कितने ही नियमित आहार (गीता अध्याय 6 श्लोक 17 में देखना चाहिए।) करने वाले प्राणायाम परायण पुरुष प्राण और अपान की गति को रोककर प्राणों को प्राणों में ही हवन किया करते हैं। ये सभी साधक यज्ञों द्वारा पापों का नाश कर देने वाले और यज्ञों को जानने वाले हैं
 ॥29-30॥

~ श्लोक 29, 30 - अध्याय 4 - दिव्य ज्ञान

बुधवार, 2 दिसंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे।
 स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयः संशितव्रताः॥

कई पुरुष द्रव्य संबंधी यज्ञ करने वाले हैं, कितने ही तपस्या रूप यज्ञ करने वाले हैं तथा दूसरे कितने ही योगरूप यज्ञ करने वाले हैं, कितने ही अहिंसादि तीक्ष्णव्रतों से युक्त यत्नशील पुरुष स्वाध्यायरूप ज्ञानयज्ञ करने वाले हैं
 ॥28॥

~ श्लोक 28 - अध्याय 4 - दिव्य ज्ञान

मंगलवार, 1 दिसंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे।
 आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते॥

दूसरे योगीजन इन्द्रियों की सम्पूर्ण क्रियाओं और प्राणों की समस्त क्रियाओं को ज्ञान से प्रकाशित आत्म संयम योगरूप अग्नि में हवन किया करते हैं (सच्चिदानंदघन परमात्मा के सिवाय अन्य किसी का भी न चिन्तन करना ही उन सबका हवन करना है।)
 ॥27॥

~ श्लोक 27 - अध्याय 4 - दिव्य ज्ञान

सोमवार, 30 नवंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति।
 शब्दादीन्विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति॥

अन्य योगीजन श्रोत्र आदि समस्त इन्द्रियों को संयम रूप अग्नियों में हवन किया करते हैं और दूसरे योगी लोग शब्दादि समस्त विषयों को इन्द्रिय रूप अग्नियों में हवन किया करते हैं
 ॥26॥

~ श्लोक 26 - अध्याय 4 - दिव्य ज्ञान

शनिवार, 28 नवंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते।
 ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति॥

दूसरे योगीजन देवताओं के पूजनरूप यज्ञ का ही भलीभाँति अनुष्ठान किया करते हैं और अन्य योगीजन परब्रह्म परमात्मारूप अग्नि में अभेद दर्शनरूप यज्ञ द्वारा ही आत्मरूप यज्ञ का हवन किया करते हैं। (परब्रह्म परमात्मा में ज्ञान द्वारा एकीभाव से स्थित होना ही ब्रह्मरूप अग्नि में यज्ञ द्वारा यज्ञ को हवन करना है।)
 ॥25॥

~ श्लोक 25 - अध्याय 4 - दिव्य ज्ञान

शुक्रवार, 27 नवंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

( फलसहित पृथक-पृथक यज्ञों का कथन ) ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्रौ ब्रह्मणा हुतम्‌।
 ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना॥

जिस यज्ञ में अर्पण अर्थात स्रुवा आदि भी ब्रह्म है और हवन किए जाने योग्य द्रव्य भी ब्रह्म है तथा ब्रह्मरूप कर्ता द्वारा ब्रह्मरूप अग्नि में आहुति देना रूप क्रिया भी ब्रह्म है- उस ब्रह्मकर्म में स्थित रहने वाले योगी द्वारा प्राप्त किए जाने योग्य फल भी ब्रह्म ही हैं
 ॥24॥

~ श्लोक 24 - अध्याय 4 - दिव्य ज्ञान

गुरुवार, 26 नवंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

गतसङ्‍गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः।
 यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते॥

जिसकी आसक्ति सर्वथा नष्ट हो गई है, जो देहाभिमान और ममता से रहित हो गया है, जिसका चित्त निरन्तर परमात्मा के ज्ञान में स्थित रहता है- ऐसा केवल यज्ञसम्पादन के लिए कर्म करने वाले मनुष्य के सम्पूर्ण कर्म भलीभाँति विलीन हो जाते हैं
 ॥23॥

~ श्लोक 23 - अध्याय 4 - दिव्य ज्ञान

बुधवार, 25 नवंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

यदृच्छालाभसंतुष्टो द्वंद्वातीतो विमत्सरः।
 समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते॥

जो बिना इच्छा के अपने-आप प्राप्त हुए पदार्थ में सदा संतुष्ट रहता है, जिसमें ईर्ष्या का सर्वथा अभाव हो गया हो, जो हर्ष-शोक आदि द्वंद्वों से सर्वथा अतीत हो गया है- ऐसा सिद्धि और असिद्धि में सम रहने वाला कर्मयोगी कर्म करता हुआ भी उनसे नहीं बँधता
 ॥22॥

~ श्लोक 22 - अध्याय 4 - दिव्य ज्ञान

सोमवार, 23 नवंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः।
 कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किंचित्करोति सः॥

जो पुरुष समस्त कर्मों में और उनके फल में आसक्ति का सर्वथा त्याग करके संसार के आश्रय से रहित हो गया है और परमात्मा में नित्य तृप्त है, वह कर्मों में भलीभाँति बर्तता हुआ भी वास्तव में कुछ भी नहीं करता
 ॥20॥

~ श्लोक 20 - अध्याय 4 - दिव्य ज्ञान

रविवार, 22 नवंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

( योगी महात्मा पुरुषों के आचरण और उनकी महिमा ) यस्य सर्वे समारम्भाः कामसंकल्पवर्जिताः।
 ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पंडितं बुधाः॥

जिसके सम्पूर्ण शास्त्रसम्मत कर्म बिना कामना और संकल्प के होते हैं तथा जिसके समस्त कर्म ज्ञानरूप अग्नि द्वारा भस्म हो गए हैं, उस महापुरुष को ज्ञानीजन भी पंडित कहते हैं
 ॥19॥

~ श्लोक 19 - अध्याय 4 - दिव्य ज्ञान

शुक्रवार, 20 नवंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

कर्मण्य कर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः।
 स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत्‌॥

जो मनुष्य कर्म में अकर्म देखता है और जो अकर्म में कर्म देखता है, वह मनुष्यों में बुद्धिमान है और वह योगी समस्त कर्मों को करने वाला है
 ॥18॥

~ श्लोक 18 - अध्याय 4 - दिव्य ज्ञान

गुरुवार, 19 नवंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः।
 अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः॥

कर्म का स्वरूप भी जानना चाहिए और अकर्मण का स्वरूप भी जानना चाहिए तथा विकर्म का स्वरूप भी जानना चाहिए क्योंकि कर्म की गति गहन है
 ॥17॥

~ श्लोक 17 - अध्याय 4 - दिव्य ज्ञान

बुधवार, 18 नवंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः।
 तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्‌॥

कर्म क्या है? और अकर्म क्या है? इस प्रकार इसका निर्णय करने में बुद्धिमान पुरुष भी मोहित हो जाते हैं। इसलिए वह कर्मतत्व मैं तुझे भलीभाँति समझाकर कहूँगा, जिसे जानकर तू अशुभ से अर्थात कर्मबंधन से मुक्त हो जाएगा
 ॥16॥

~ श्लोक 16 - अध्याय 4 - दिव्य ज्ञान

मंगलवार, 17 नवंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः।
 कुरु कर्मैव तस्मात्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम्‌॥

पूर्वकाल में मुमुक्षुओं ने भी इस प्रकार जानकर ही कर्म किए हैं, इसलिए तू भी पूर्वजों द्वारा सदा से किए जाने वाले कर्मों को ही कर
 ॥15॥

~ श्लोक 15 - अध्याय 4 - दिव्य ज्ञान

सोमवार, 16 नवंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा।
 इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते॥

कर्मों के फल में मेरी स्पृहा नहीं है, इसलिए मुझे कर्म लिप्त नहीं करते- इस प्रकार जो मुझे तत्व से जान लेता है, वह भी कर्मों से नहीं बँधता
 ॥14॥

~ श्लोक 14 - अध्याय 4 - दिव्य ज्ञान

शुक्रवार, 13 नवंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

काङ्‍क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः।
 क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा॥

इस मनुष्य लोक में कर्मों के फल को चाहने वाले लोग देवताओं का पूजन किया करते हैं क्योंकि उनको कर्मों से उत्पन्न होने वाली सिद्धि शीघ्र मिल जाती है
 ॥12॥

~ श्लोक 12 - अध्याय 4 - दिव्य ज्ञान

गुरुवार, 12 नवंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

ये यथा माँ प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्‌।
 मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥

हे अर्जुन! जो भक्त मुझे जिस प्रकार भजते हैं, मैं भी उनको उसी प्रकार भजता हूँ क्योंकि सभी मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं
 ॥11॥

~ श्लोक 11 - अध्याय 4 - दिव्य ज्ञान

मंगलवार, 10 नवंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

वीतरागभय क्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः।
 बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः॥

पहले भी, जिनके राग, भय और क्रोध सर्वथा नष्ट हो गए थे और जो मुझ में अनन्य प्रेमपूर्वक स्थित रहते थे, ऐसे मेरे आश्रित रहने वाले बहुत से भक्त उपर्युक्त ज्ञान रूप तप से पवित्र होकर मेरे स्वरूप को प्राप्त हो चुके हैं
 ॥10॥

~ श्लोक 10 - अध्याय 4 - दिव्य ज्ञान

सोमवार, 9 नवंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्वतः।
 त्यक्तवा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन॥

हे अर्जुन! मेरे जन्म और कर्म दिव्य अर्थात निर्मल और अलौकिक हैं- इस प्रकार जो मनुष्य तत्व से (सर्वशक्तिमान, सच्चिदानन्दन परमात्मा अज, अविनाशी और सर्वभूतों के परम गति तथा परम आश्रय हैं, वे केवल धर्म को स्थापन करने और संसार का उद्धार करने के लिए ही अपनी योगमाया से सगुणरूप होकर प्रकट होते हैं। इसलिए परमेश्वर के समान सुहृद्, प्रेमी और पतितपावन दूसरा कोई नहीं है, ऐसा समझकर जो पुरुष परमेश्वर का अनन्य प्रेम से निरन्तर चिन्तन करता हुआ आसक्तिरहित संसार में बर्तता है, वही उनको तत्व से जानता है।) जान लेता है, वह शरीर को त्याग कर फिर जन्म को प्राप्त नहीं होता, किन्तु मुझे ही प्राप्त होता है
 ॥9॥

~ श्लोक 9 - अध्याय 4 - दिव्य ज्ञान

रविवार, 8 नवंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्‌।
 धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥

साधु पुरुषों का उद्धार करने के लिए, पाप कर्म करने वालों का विनाश करने के लिए और धर्म की अच्छी तरह से स्थापना करने के लिए मैं युग-युग में प्रकट हुआ करता हूँ
 ॥9॥

~ श्लोक 8 - अध्याय 4 - दिव्य ज्ञान

शुक्रवार, 6 नवंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
 अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्‌॥

हे भारत! जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब ही मैं अपने रूप को रचता हूँ अर्थात साकार रूप से लोगों के सम्मुख प्रकट होता हूँ
 ॥7॥

~ श्लोक 7 - अध्याय 4 - दिव्य ज्ञान

गुरुवार, 5 नवंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्‌।
 प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया॥

मैं अजन्मा और अविनाशीस्वरूप होते हुए भी तथा समस्त प्राणियों का ईश्वर होते हुए भी अपनी प्रकृति को अधीन करके अपनी योगमाया से प्रकट होता हूँ
 ॥6॥

~ श्लोक 6 - अध्याय 4 - दिव्य ज्ञान

बुधवार, 4 नवंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

श्रीभगवानुवाच बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन।
 तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप॥

श्री भगवान बोले- हे परंतप अर्जुन! मेरे और तेरे बहुत से जन्म हो चुके हैं। उन सबको तू नहीं जानता, किन्तु मैं जानता हूँ
 ॥5॥

~ श्लोक 5 - अध्याय 4 - दिव्य ज्ञान

मंगलवार, 3 नवंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

अर्जुन उवाच अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः।
 कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति॥

अर्जुन बोले- आपका जन्म तो अर्वाचीन-अभी हाल का है और सूर्य का जन्म बहुत पुराना है अर्थात कल्प के आदि में हो चुका था। तब मैं इस बात को कैसे समूझँ कि आप ही ने कल्प के आदि में सूर्य से यह योग कहा था?
 ॥4॥

~ श्लोक 4 - अध्याय 4 - दिव्य ज्ञान

सोमवार, 2 नवंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः।
 भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम्‌॥

तू मेरा भक्त और प्रिय सखा है, इसलिए वही यह पुरातन योग आज मैंने तुझको कहा है क्योंकि यह बड़ा ही उत्तम रहस्य है अर्थात गुप्त रखने योग्य विषय है
 ॥3॥

~ श्लोक 3 - अध्याय 4 - दिव्य ज्ञान

रविवार, 1 नवंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः।
 स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप॥

हे परन्तप अर्जुन! इस प्रकार परम्परा से प्राप्त इस योग को राजर्षियों ने जाना, किन्तु उसके बाद वह योग बहुत काल से इस पृथ्वी लोक में लुप्तप्राय हो गया
 ॥2॥

~ श्लोक 2 - अध्याय 4 - दिव्य ज्ञान

शनिवार, 31 अक्टूबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

( सगुण भगवान का प्रभाव और कर्मयोग का विषय ) श्री भगवानुवाच इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्‌।
 विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्‌॥

श्री भगवान बोले- मैंने इस अविनाशी योग को सूर्य से कहा था, सूर्य ने अपने पुत्र वैवस्वत मनु से कहा और मनु ने अपने पुत्र राजा इक्ष्वाकु से कहा
 ॥1॥

~ श्लोक 1 - अध्याय 4 - दिव्य ज्ञान

शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

एवं बुद्धेः परं बुद्धवा संस्तभ्यात्मानमात्मना।
 जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम्‌॥

इस प्रकार बुद्धि से पर अर्थात सूक्ष्म, बलवान और अत्यन्त श्रेष्ठ आत्मा को जानकर और बुद्धि द्वारा मन को वश में करके हे महाबाहो! तू इस कामरूप दुर्जय शत्रु को मार डाल
 ॥43॥ 
 ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे कर्मयोगो नाम तृतीयोऽध्यायः
 ॥3॥

~ श्लोक 43 - अध्याय 3 - कर्मयोग

गुरुवार, 29 अक्टूबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः।
 मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः॥

इन्द्रियों को स्थूल शरीर से पर यानी श्रेष्ठ, बलवान और सूक्ष्म कहते हैं। इन इन्द्रियों से पर मन है, मन से भी पर बुद्धि है और जो बुद्धि से भी अत्यन्त पर है वह आत्मा है
 ॥42॥

~ श्लोक 42 - अध्याय 3 - कर्मयोग

बुधवार, 28 अक्टूबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ।
 पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम्‌॥

इसलिए हे अर्जुन! तू पहले इन्द्रियों को वश में करके इस ज्ञान और विज्ञान का नाश करने वाले महान पापी काम को अवश्य ही बलपूर्वक मार डाल
 ॥41॥

~ श्लोक 41 - अध्याय 3 - कर्मयोग

मंगलवार, 27 अक्टूबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते।
 एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम्‌॥

इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि- ये सब इसके वासस्थान कहे जाते हैं। यह काम इन मन, बुद्धि और इन्द्रियों द्वारा ही ज्ञान को आच्छादित करके जीवात्मा को मोहित करता है।
 ॥40॥

~ श्लोक 40 - अध्याय 3 - कर्मयोग

सोमवार, 26 अक्टूबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा।
 कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च॥

और हे अर्जुन! इस अग्नि के समान कभी न पूर्ण होने वाले काम रूप ज्ञानियों के नित्य वैरी द्वारा मनुष्य का ज्ञान ढँका हुआ है
 ॥39॥

~ श्लोक 39 - अध्याय 3 - कर्मयोग

रविवार, 25 अक्टूबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

धूमेनाव्रियते वह्निर्यथादर्शो मलेन च।
 यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम्‌॥

जिस प्रकार धुएँ से अग्नि और मैल से दर्पण ढँका जाता है तथा जिस प्रकार जेर से गर्भ ढँका रहता है, वैसे ही उस काम द्वारा यह ज्ञान ढँका रहता है
 ॥38॥

~ श्लोक 38 - अध्याय 3 - कर्मयोग

शनिवार, 24 अक्टूबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

श्रीभगवानुवाच काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः।
 महाशनो महापाप्मा विद्धयेनमिह वैरिणम्‌॥

श्री भगवान बोले- रजोगुण से उत्पन्न हुआ यह काम ही क्रोध है। यह बहुत खाने वाला अर्थात भोगों से कभी न अघानेवाला और बड़ा पापी है। इसको ही तू इस विषय में वैरी जान
 ॥37॥

~ श्लोक 37 - अध्याय 3 - कर्मयोग

शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

( काम के निरोध का विषय ) अर्जुन उवाचः अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पुरुषः।

 अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः॥


अर्जुन बोले- हे कृष्ण! तो फिर यह मनुष्य स्वयं न चाहता हुआ भी बलात्‌ लगाए हुए की भाँति किससे प्रेरित होकर पाप का आचरण करता है

 ॥36॥॥

~ श्लोक 36 - अध्याय 3 - कर्मयोग

बुधवार, 21 अक्टूबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ।
 तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ॥

इन्द्रिय-इन्द्रिय के अर्थ में अर्थात प्रत्येक इन्द्रिय के विषय में राग और द्वेष छिपे हुए स्थित हैं। मनुष्य को उन दोनों के वश में नहीं होना चाहिए क्योंकि वे दोनों ही इसके कल्याण मार्ग में विघ्न करने वाले महान्‌ शत्रु हैं
 ॥34॥

~ श्लोक 34 - अध्याय 3 - कर्मयोग

मंगलवार, 20 अक्टूबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि।
 प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति॥

सभी प्राणी प्रकृति को प्राप्त होते हैं अर्थात अपने स्वभाव के परवश हुए कर्म करते हैं। ज्ञानवान्‌ भी अपनी प्रकृति के अनुसार चेष्टा करता है। फिर इसमें किसी का हठ क्या करेगा
 ॥33॥

~ श्लोक 33 - अध्याय 3 - कर्मयोग

सोमवार, 19 अक्टूबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम्‌।
 सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः॥

परन्तु जो मनुष्य मुझमें दोषारोपण करते हुए मेरे इस मत के अनुसार नहीं चलते हैं, उन मूर्खों को तू सम्पूर्ण ज्ञानों में मोहित और नष्ट हुए ही समझ
 ॥32॥

~ श्लोक 32 - अध्याय 3 - कर्मयोग

रविवार, 18 अक्टूबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः।
 श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽति कर्मभिः॥

जो कोई मनुष्य दोषदृष्टि से रहित और श्रद्धायुक्त होकर मेरे इस मत का सदा अनुसरण करते हैं, वे भी सम्पूर्ण कर्मों से छूट जाते हैं
 ॥31॥

~ श्लोक 31 - अध्याय 3 - कर्मयोग

शनिवार, 17 अक्टूबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

मयि सर्वाणि कर्माणि सन्नयस्याध्यात्मचेतसा।
 निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः॥

मुझ अन्तर्यामी परमात्मा में लगे हुए चित्त द्वारा सम्पूर्ण कर्मों को मुझमें अर्पण करके आशारहित, ममतारहित और सन्तापरहित होकर युद्ध कर
 ॥30॥

~ श्लोक 30 - अध्याय 3 - कर्मयोग

शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

प्रकृतेर्गुणसम्मूढ़ाः सज्जन्ते गुणकर्मसु।
 तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्न विचालयेत्‌॥

प्रकृति के गुणों से अत्यन्त मोहित हुए मनुष्य गुणों में और कर्मों में आसक्त रहते हैं, उन पूर्णतया न समझने वाले मन्दबुद्धि अज्ञानियों को पूर्णतया जानने वाला ज्ञानी विचलित न करे
 ॥29॥

~ श्लोक 29 - अध्याय 3 - कर्मयोग

गुरुवार, 15 अक्टूबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः।
 गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते॥

परन्तु हे महाबाहो! गुण विभाग और कर्म विभाग (त्रिगुणात्मक माया के कार्यरूप पाँच महाभूत और मन, बुद्धि, अहंकार तथा पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ और शब्दादि पाँच विषय- इन सबके समुदाय का नाम 'गुण विभाग' है और इनकी परस्पर की चेष्टाओं का नाम 'कर्म विभाग' है।) के तत्व (उपर्युक्त 'गुण विभाग' और 'कर्म विभाग' से आत्मा को पृथक अर्थात्‌ निर्लेप जानना ही इनका तत्व जानना है।) को जानने वाला ज्ञान योगी सम्पूर्ण गुण ही गुणों में बरत रहे हैं, ऐसा समझकर उनमें आसक्त नहीं होता।
 ॥28॥

~ श्लोक 28 - अध्याय 3 - कर्मयोग

बुधवार, 14 अक्टूबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः।
 अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते॥

- वास्तव में सम्पूर्ण कर्म सब प्रकार से प्रकृति के गुणों द्वारा किए जाते हैं, तो भी जिसका अन्तःकरण अहंकार से मोहित हो रहा है, ऐसा अज्ञानी 'मैं कर्ता हूँ' ऐसा मानता है
 ॥27॥

~ श्लोक 27 - अध्याय 3 - कर्मयोग

मंगलवार, 13 अक्टूबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङि्गनाम्‌।
 जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्तः समाचरन्‌॥

परमात्मा के स्वरूप में अटल स्थित हुए ज्ञानी पुरुष को चाहिए कि वह शास्त्रविहित कर्मों में आसक्ति वाले अज्ञानियों की बुद्धि में भ्रम अर्थात कर्मों में अश्रद्धा उत्पन्न न करे, किन्तु स्वयं शास्त्रविहित समस्त कर्म भलीभाँति करता हुआ उनसे भी वैसे ही करवाए
 ॥26॥

~ श्लोक 26 - अध्याय 3 - कर्मयोग

रविवार, 11 अक्टूबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

( अज्ञानी और ज्ञानवान के लक्षण तथा राग-द्वेष से रहित होकर कर्म करने के लिए प्रेरणा ) सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत।
 कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसंग्रहम्‌॥

हे भारत! कर्म में आसक्त हुए अज्ञानीजन जिस प्रकार कर्म करते हैं, आसक्तिरहित विद्वान भी लोकसंग्रह करना चाहता हुआ उसी प्रकार कर्म करे
 ॥25॥

~ श्लोक 25 - अध्याय 3 - कर्मयोग

शनिवार, 10 अक्टूबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

यदि उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम्‌।
 संकरस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः॥

इसलिए यदि मैं कर्म न करूँ तो ये सब मनुष्य नष्ट-भ्रष्ट हो जाएँ और मैं संकरता का करने वाला होऊँ तथा इस समस्त प्रजा को नष्ट करने वाला बनूँ
 ॥24॥

~ श्लोक 24 - अध्याय 3 - कर्मयोग

शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः।
 मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥

क्योंकि हे पार्थ! यदि कदाचित्‌ मैं सावधान होकर कर्मों में न बरतूँ तो बड़ी हानि हो जाए क्योंकि मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं
 ॥23॥

~ श्लोक 23 - अध्याय 3 - कर्मयोग

गुरुवार, 8 अक्टूबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किंचन।
 नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि॥

हे अर्जुन! मुझे इन तीनों लोकों में न तो कुछ कर्तव्य है और न कोई भी प्राप्त करने योग्य वस्तु अप्राप्त है, तो भी मैं कर्म में ही बरतता हूँ
 ॥22॥

~ श्लोक 22 - अध्याय 3 - कर्मयोग

मंगलवार, 6 अक्टूबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।
 स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥

श्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण करता है, अन्य पुरुष भी वैसा-वैसा ही आचरण करते हैं। वह जो कुछ प्रमाण कर देता है, समस्त मनुष्य-समुदाय उसी के अनुसार बरतने लग जाता है (यहाँ क्रिया में एकवचन है, परन्तु 'लोक' शब्द समुदायवाचक होने से भाषा में बहुवचन की क्रिया लिखी गई है।)
 ॥21॥

~ श्लोक 21 - अध्याय 3 - कर्मयोग

सोमवार, 5 अक्टूबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः।
 लोकसंग्रहमेवापि सम्पश्यन्कर्तुमर्हसि॥

जनकादि ज्ञानीजन भी आसक्ति रहित कर्मद्वारा ही परम सिद्धि को प्राप्त हुए थे, इसलिए तथा लोकसंग्रह को देखते हुए भी तू कर्म करने के ही योग्य है अर्थात तुझे कर्म करना ही उचित है
 ॥20॥

~ श्लोक 20 - अध्याय 3 - कर्मयोग

रविवार, 4 अक्टूबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर।
 असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पुरुषः॥

इसलिए तू निरन्तर आसक्ति से रहित होकर सदा कर्तव्यकर्म को भलीभाँति करता रह क्योंकि आसक्ति से रहित होकर कर्म करता हुआ मनुष्य परमात्मा को प्राप्त हो जाता है
 ॥19॥

~ श्लोक 19 - अध्याय 3 - कर्मयोग

शनिवार, 3 अक्टूबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

संजय उवाच: नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन।
 न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः॥

उस महापुरुष का इस विश्व में न तो कर्म करने से कोई प्रयोजन रहता है और न कर्मों के न करने से ही कोई प्रयोजन रहता है तथा सम्पूर्ण प्राणियों में भी इसका किञ्चिन्मात्र भी स्वार्थ का संबंध नहीं रहता
 ॥18॥

~ श्लोक 18 - अध्याय 3 - कर्मयोग

शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

( ज्ञानवान और भगवान के लिए भी लोकसंग्रहार्थ कर्मों की आवश्यकता ) यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः।
 आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते॥

परन्तु जो मनुष्य आत्मा में ही रमण करने वाला और आत्मा में ही तृप्त तथा आत्मा में ही सन्तुष्ट हो, उसके लिए कोई कर्तव्य नहीं है
 ॥17॥

~ श्लोक 17 - अध्याय 3 - कर्मयोग

गुरुवार, 1 अक्टूबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः।
 अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति॥

हे पार्थ! जो पुरुष इस लोक में इस प्रकार परम्परा से प्रचलित सृष्टिचक्र के अनुकूल नहीं बरतता अर्थात अपने कर्तव्य का पालन नहीं करता, वह इन्द्रियों द्वारा भोगों में रमण करने वाला पापायु पुरुष व्यर्थ ही जीता है
 ॥16॥

~ श्लोक 16 - अध्याय 3 - कर्मयोग

मंगलवार, 29 सितंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः।
 यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः॥
 कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम्‌।
 तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम्‌॥

सम्पूर्ण प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैं, अन्न की उत्पत्ति वृष्टि से होती है, वृष्टि यज्ञ से होती है और यज्ञ विहित कर्मों से उत्पन्न होने वाला है। कर्मसमुदाय को तू वेद से उत्पन्न और वेद को अविनाशी परमात्मा से उत्पन्न हुआ जान। इससे सिद्ध होता है कि सर्वव्यापी परम अक्षर परमात्मा सदा ही यज्ञ में प्रतिष्ठित है
 ॥14-15॥

~ श्लोक 14, 15 - अध्याय 3 - कर्मयोग

सोमवार, 28 सितंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः।
 भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्‌॥

यज्ञ से बचे हुए अन्न को खाने वाले श्रेष्ठ पुरुष सब पापों से मुक्त हो जाते हैं और जो पापी लोग अपना शरीर-पोषण करने के लिए ही अन्न पकाते हैं, वे तो पाप को ही खाते हैं
 ॥13॥

~ श्लोक 13 - अध्याय 3 - कर्मयोग

रविवार, 27 सितंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः।
 तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुंक्ते स्तेन एव सः॥

यज्ञ द्वारा बढ़ाए हुए देवता तुम लोगों को बिना माँगे ही इच्छित भोग निश्चय ही देते रहेंगे। इस प्रकार उन देवताओं द्वारा दिए हुए भोगों को जो पुरुष उनको बिना दिए स्वयं भोगता है, वह चोर ही है
 ॥12॥

~ श्लोक 12 - अध्याय 3 - कर्मयोग

शनिवार, 26 सितंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः।
 परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ॥

तुम लोग इस यज्ञ द्वारा देवताओं को उन्नत करो और वे देवता तुम लोगों को उन्नत करें। इस प्रकार निःस्वार्थ भाव से एक-दूसरे को उन्नत करते हुए तुम लोग परम कल्याण को प्राप्त हो जाओगे
 ॥11॥

~ श्लोक 11 - अध्याय 3 - कर्मयोग

शुक्रवार, 25 सितंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

सहयज्ञाः प्रजाः सृष्टा पुरोवाचप्रजापतिः।
 अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक्‌॥

प्रजापति ब्रह्मा ने कल्प के आदि में यज्ञ सहित प्रजाओं को रचकर उनसे कहा कि तुम लोग इस यज्ञ द्वारा वृद्धि को प्राप्त होओ और यह यज्ञ तुम लोगों को इच्छित भोग प्रदान करने वाला हो
 
 ॥10॥

~ श्लोक 10 - अध्याय 3 - कर्मयोग

बुधवार, 23 सितंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

( यज्ञादि कर्मों की आवश्यकता का निरूपण ) यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबंधनः।
 तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसंगः समाचर॥

यज्ञ के निमित्त किए जाने वाले कर्मों से अतिरिक्त दूसरे कर्मों में लगा हुआ ही यह मुनष्य समुदाय कर्मों से बँधता है। इसलिए हे अर्जुन! तू आसक्ति से रहित होकर उस यज्ञ के निमित्त ही भलीभाँति कर्तव्य कर्म कर
 ॥9॥

~ श्लोक 9 - अध्याय 3 - कर्मयोग

सोमवार, 21 सितंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन।
 कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते॥

किन्तु हे अर्जुन! जो पुरुष मन से इन्द्रियों को वश में करके अनासक्त हुआ समस्त इन्द्रियों द्वारा कर्मयोग का आचरण करता है, वही श्रेष्ठ है
 ॥7॥॥

~ श्लोक 7 - अध्याय 3 - कर्मयोग

रविवार, 20 सितंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन।
 कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते॥

किन्तु हे अर्जुन! जो पुरुष मन से इन्द्रियों को वश में करके अनासक्त हुआ समस्त इन्द्रियों द्वारा कर्मयोग का आचरण करता है, वही श्रेष्ठ है
 ॥7॥॥

~ श्लोक 7 - अध्याय 3 - कर्मयोग

शुक्रवार, 18 सितंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन्‌।
 इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते॥

जो मूढ़ बुद्धि मनुष्य समस्त इन्द्रियों को हठपूर्वक ऊपर से रोककर मन से उन इन्द्रियों के विषयों का चिन्तन करता रहता है, वह मिथ्याचारी अर्थात दम्भी कहा जाता है
 ॥6॥

~ श्लोक 6 - अध्याय 3 - कर्मयोग

गुरुवार, 17 सितंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्‌।
 कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः॥

निःसंदेह कोई भी मनुष्य किसी भी काल में क्षणमात्र भी बिना कर्म किए नहीं रहता क्योंकि सारा मनुष्य समुदाय प्रकृति जनित गुणों द्वारा परवश हुआ कर्म करने के लिए बाध्य किया जाता है
 ॥5॥

~ श्लोक 5 - अध्याय 3 - कर्मयोग

मंगलवार, 15 सितंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

न कर्मणामनारंभान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते।
 न च सन्न्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति॥

मनुष्य न तो कर्मों का आरंभ किए बिना निष्कर्मता (जिस अवस्था को प्राप्त हुए पुरुष के कर्म अकर्म हो जाते हैं अर्थात फल उत्पन्न नहीं कर सकते, उस अवस्था का नाम 'निष्कर्मता' है।) को यानी योगनिष्ठा को प्राप्त होता है और न कर्मों के केवल त्यागमात्र से सिद्धि यानी सांख्यनिष्ठा को ही प्राप्त होता है
 ॥4॥

~ श्लोक 4 - अध्याय 3 - कर्मयोग

शुक्रवार, 11 सितंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे।
 तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम्‌॥

आप मिले हुए-से वचनों से मेरी बुद्धि को मानो मोहित कर रहे हैं। इसलिए उस एक बात को निश्चित करके कहिए जिससे मैं कल्याण को प्राप्त हो जाऊँ
 ॥2॥॥

~ श्लोक 2 - अध्याय 3 - कर्मयोग

गुरुवार, 10 सितंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

(ज्ञानयोग और कर्मयोग के अनुसार अनासक्त भाव से नियत कर्म करने की श्रेष्ठता का निरूपण) अर्जुन उवाच ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन।
 तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव॥

अर्जुन बोले- हे जनार्दन! यदि आपको कर्म की अपेक्षा ज्ञान श्रेष्ठ मान्य है तो फिर हे केशव! मुझे भयंकर कर्म में क्यों लगाते हैं?
 ॥1॥

~ श्लोक 1 - अध्याय 3 - कर्मयोग

बुधवार, 9 सितंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति।
 स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति॥

हे अर्जुन! यह ब्रह्म को प्राप्त हुए पुरुष की स्थिति है, इसको प्राप्त होकर योगी कभी मोहित नहीं होता और अंतकाल में भी इस ब्राह्मी स्थिति में स्थित होकर ब्रह्मानन्द को प्राप्त हो जाता है
 ॥72॥ 

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे सांख्ययोगो नाम द्वितीयोऽध्यायः 
 ॥2॥

~ श्लोक 72 - अध्याय 2 - गीता का सार

गुरुवार, 3 सितंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं-
 समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत्‌।
 तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे
 स शान्तिमाप्नोति न कामकामी॥

जैसे नाना नदियों के जल सब ओर से परिपूर्ण, अचल प्रतिष्ठा वाले समुद्र में उसको विचलित न करते हुए ही समा जाते हैं, वैसे ही सब भोग जिस स्थितप्रज्ञ पुरुष में किसी प्रकार का विकार उत्पन्न किए बिना ही समा जाते हैं, वही पुरुष परम शान्ति को प्राप्त होता है, भोगों को चाहने वाला नहीं
 ॥70॥

~ श्लोक 70 - अध्याय 2 - गीता का सार

बुधवार, 2 सितंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।
 यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः॥

सम्पूर्ण प्राणियों के लिए जो रात्रि के समान है, उस नित्य ज्ञानस्वरूप परमानन्द की प्राप्ति में स्थितप्रज्ञ योगी जागता है और जिस नाशवान सांसारिक सुख की प्राप्ति में सब प्राणी जागते हैं, परमात्मा के तत्व को जानने वाले मुनि के लिए वह रात्रि के समान है
 ॥69॥

~ श्लोक 69 - अध्याय 2 - गीता का सार

सोमवार, 31 अगस्त 2020

श्रीमद्भागवत गीता

तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः।
 इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥

इसलिए हे महाबाहो! जिस पुरुष की इन्द्रियाँ इन्द्रियों के विषयों में सब प्रकार निग्रह की हुई हैं, उसी की बुद्धि स्थिर है
 ॥68॥

~ श्लोक 68 - अध्याय 2 - गीता का सार

रविवार, 30 अगस्त 2020

श्रीमद्भागवत गीता

इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते।
 तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि॥

क्योंकि जैसे जल में चलने वाली नाव को वायु हर लेती है, वैसे ही विषयों में विचरती हुई इन्द्रियों में से मन जिस इन्द्रिय के साथ रहता है, वह एक ही इन्द्रिय इस अयुक्त पुरुष की बुद्धि को हर लेती है
 ॥67॥

~ श्लोक 67 - अध्याय 2 - गीता का सार

शुक्रवार, 28 अगस्त 2020

श्रीमद्भागवत गीता

नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना।
 न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम्‌॥

न जीते हुए मन और इन्द्रियों वाले पुरुष में निश्चयात्मिका बुद्धि नहीं होती और उस अयुक्त मनुष्य के अन्तःकरण में भावना भी नहीं होती तथा भावनाहीन मनुष्य को शान्ति नहीं मिलती और शान्तिरहित मनुष्य को सुख कैसे मिल सकता है?
 ॥66॥

~ श्लोक 66 - अध्याय 2 - गीता का सार

बुधवार, 26 अगस्त 2020

श्रीमद्भागवत गीता

( क्षत्रिय धर्म के अनुसार युद्ध करने की आवश्यकता का निरूपण )स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि।
 धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते॥

तथा अपने धर्म को देखकर भी तू भय करने योग्य नहीं है अर्थात्‌ तुझे भय नहीं करना चाहिए क्योंकि क्षत्रिय के लिए धर्मयुक्त युद्ध से बढ़कर दूसरा कोई कल्याणकारी कर्तव्य नहीं है
 ॥31॥

~ श्लोक 31 - अध्याय 2 - गीता का सार

श्रीमद्भगवद्गीता

श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला।
 समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि॥

भाँति-भाँति के वचनों को सुनने से विचलित हुई तेरी बुद्धि जब परमात्मा में अचल और स्थिर ठहर जाएगी, तब तू योग को प्राप्त हो जाएगा अर्थात तेरा परमात्मा से नित्य संयोग हो जाएगा
 ॥53॥

~ श्लोक 53 - अध्याय 2 - गीता का सार

श्रीमद्भागवत गीता

रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन्‌।
 आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति॥

परंन्तु अपने अधीन किए हुए अन्तःकरण वाला साधक अपने वश में की हुई, राग-द्वेष रहित इन्द्रियों द्वारा विषयों में विचरण करता हुआ अन्तःकरण की प्रसन्नता को प्राप्त होता है
 ॥64॥

~ श्लोक 64 - अध्याय 2 - गीता का सार

मंगलवार, 25 अगस्त 2020

श्रीमद्भागवत गीता

क्रोधाद्‍भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः।
 स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥

क्रोध से अत्यन्त मूढ़ भाव उत्पन्न हो जाता है, मूढ़ भाव से स्मृति में भ्रम हो जाता है, स्मृति में भ्रम हो जाने से बुद्धि अर्थात ज्ञानशक्ति का नाश हो जाता है और बुद्धि का नाश हो जाने से यह पुरुष अपनी स्थिति से गिर जाता है
 ॥63॥

~ श्लोक 63 - अध्याय 2 - गीता का सार

सोमवार, 24 अगस्त 2020

श्रीमद्भागवत गीता

ध्यायतो विषयान्पुंसः संगस्तेषूपजायते।
 संगात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥

विषयों का चिन्तन करने वाले पुरुष की उन विषयों में आसक्ति हो जाती है, आसक्ति से उन विषयों की कामना उत्पन्न होती है और कामना में विघ्न पड़ने से क्रोध उत्पन्न होता है
 ॥62॥

~ श्लोक 62 - अध्याय 2 - गीता का सार

रविवार, 23 अगस्त 2020

श्रीमद्भागवत गीता

तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः।
 वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥

इसलिए साधक को चाहिए कि वह उन सम्पूर्ण इन्द्रियों को वश में करके समाहित चित्त हुआ मेरे परायण होकर ध्यान में बैठे क्योंकि जिस पुरुष की इन्द्रियाँ वश में होती हैं, उसी की बुद्धि स्थिर हो जाती है
 ॥61॥

~ श्लोक 61 - अध्याय 2 - गीता का सार

शनिवार, 22 अगस्त 2020

श्रीमद्भगवद्गीता

यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः।
 इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः॥

हे अर्जुन! आसक्ति का नाश न होने के कारण ये प्रमथन स्वभाव वाली इन्द्रियाँ यत्न करते हुए बुद्धिमान पुरुष के मन को भी बलात्‌ हर लेती हैं
 ॥60॥

~ श्लोक 60 - अध्याय 2 - गीता का सार

शुक्रवार, 21 अगस्त 2020

श्रीमद्भागवत गीता

विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः।
 रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्टवा निवर्तते॥

इन्द्रियों द्वारा विषयों को ग्रहण न करने वाले पुरुष के भी केवल विषय तो निवृत्त हो जाते हैं, परन्तु उनमें रहने वाली आसक्ति निवृत्त नहीं होती। इस स्थितप्रज्ञ पुरुष की तो आसक्ति भी परमात्मा का साक्षात्कार करके निवृत्त हो जाती है
 ॥59॥

~ श्लोक 59 - अध्याय 2 - गीता का सार

गुरुवार, 20 अगस्त 2020

श्रीमद्भागवत गीता

यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गनीव सर्वशः।
 इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥

और कछुवा सब ओर से अपने अंगों को जैसे समेट लेता है, वैसे ही जब यह पुरुष इन्द्रियों के विषयों से इन्द्रियों को सब प्रकार से हटा लेता है, तब उसकी बुद्धि स्थिर है (ऐसा समझना चाहिए)
 ॥58॥

~ श्लोक 58 - अध्याय 2 - गीता का सार

बुधवार, 19 अगस्त 2020

श्रीमद्भागवत गीता

यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम्‌।
 नाभिनंदति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥

जो पुरुष सर्वत्र स्नेहरहित हुआ उस-उस शुभ या अशुभ वस्तु को प्राप्त होकर न प्रसन्न होता है और न द्वेष करता है, उसकी बुद्धि स्थिर है
 ॥57॥

~ श्लोक 57 - अध्याय 2 - गीता का सार

मंगलवार, 18 अगस्त 2020

श्रीमद्भागवत गीता

दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः।
 वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते॥

दुःखों की प्राप्ति होने पर जिसके मन में उद्वेग नहीं होता, सुखों की प्राप्ति में सर्वथा निःस्पृह है तथा जिसके राग, भय और क्रोध नष्ट हो गए हैं, ऐसा मुनि स्थिरबुद्धि कहा जाता है
 ॥56॥

~ श्लोक 56 - अध्याय 2 - गीता का सार

सोमवार, 17 अगस्त 2020

श्रीमद्भागवत गीता

श्रीभगवानुवाच
 प्रजहाति यदा कामान्‌ सर्वान्पार्थ मनोगतान्‌।
 आत्मयेवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते॥

श्री भगवान्‌ बोले- हे अर्जुन! जिस काल में यह पुरुष मन में स्थित सम्पूर्ण कामनाओं को भलीभाँति त्याग देता है और आत्मा से आत्मा में ही संतुष्ट रहता है, उस काल में वह स्थितप्रज्ञ कहा जाता है
 ॥55॥

~ श्लोक 55 - अध्याय 2 - गीता का सार

रविवार, 16 अगस्त 2020

श्रीमद्भागवत गीता

( स्थिरबुद्धि पुरुष के लक्षण और उसकी महिमा )
 अर्जुन उवाच
 स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव।
 स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम्‌॥

अर्जुन बोले- हे केशव! समाधि में स्थित परमात्मा को प्राप्त हुए स्थिरबुद्धि पुरुष का क्या लक्षण है? वह स्थिरबुद्धि पुरुष कैसे बोलता है, कैसे बैठता है और कैसे चलता है?
 ॥54॥

~ श्लोक 54 - अध्याय 2 - गीता का सार

शनिवार, 15 अगस्त 2020

श्रीमद्भगवद्गीता

श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला।
 समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि॥

भाँति-भाँति के वचनों को सुनने से विचलित हुई तेरी बुद्धि जब परमात्मा में अचल और स्थिर ठहर जाएगी, तब तू योग को प्राप्त हो जाएगा अर्थात तेरा परमात्मा से नित्य संयोग हो जाएगा
 ॥53॥

~ श्लोक 53 - अध्याय 2 - गीता का सार

शुक्रवार, 14 अगस्त 2020

श्रीमद्भागवत गीता

यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति।
 तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च॥

जिस काल में तेरी बुद्धि मोहरूपी दलदल को भलीभाँति पार कर जाएगी, उस समय तू सुने हुए और सुनने में आने वाले इस लोक और परलोक संबंधी सभी भोगों से वैराग्य को प्राप्त हो जाएगा
 ॥52॥

~ श्लोक 52 - अध्याय 2 - गीता का सार

गुरुवार, 13 अगस्त 2020

श्रीमद्भागवत गीता

कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः।
 जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम्‌॥

क्योंकि समबुद्धि से युक्त ज्ञानीजन कर्मों से उत्पन्न होने वाले फल को त्यागकर जन्मरूप बंधन से मुक्त हो निर्विकार परम पद को प्राप्त हो जाते हैं
 ॥51॥

~ श्लोक 51 - अध्याय 2 - गीता का सार

बुधवार, 12 अगस्त 2020

श्रीमद्भागवत गीता

बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते।
 तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्‌॥

समबुद्धियुक्त पुरुष पुण्य और पाप दोनों को इसी लोक में त्याग देता है अर्थात उनसे मुक्त हो जाता है। इससे तू समत्व रूप योग में लग जा, यह समत्व रूप योग ही कर्मों में कुशलता है अर्थात कर्मबंध से छूटने का उपाय है
 ॥50॥

~ श्लोक 50 - अध्याय 2 - गीता का सार

मंगलवार, 11 अगस्त 2020

श्रीमद्भागवत गीता

दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनंजय।
 बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः॥

इस समत्वरूप बुद्धियोग से सकाम कर्म अत्यन्त ही निम्न श्रेणी का है। इसलिए हे धनंजय! तू समबुद्धि में ही रक्षा का उपाय ढूँढ अर्थात्‌ बुद्धियोग का ही आश्रय ग्रहण कर क्योंकि फल के हेतु बनने वाले अत्यन्त दीन हैं
 ॥49॥

~ श्लोक 49 - अध्याय 2 - गीता का सार

गुरुवार, 6 अगस्त 2020

श्रीमद्भागवत गीता

योगस्थः कुरु कर्माणि संग त्यक्त्वा धनंजय।
 सिद्धयसिद्धयोः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥

हे धनंजय! तू आसक्ति को त्यागकर तथा सिद्धि और असिद्धि में समान बुद्धिवाला होकर योग में स्थित हुआ कर्तव्य कर्मों को कर, समत्व (जो कुछ भी कर्म किया जाए, उसके पूर्ण होने और न होने में तथा उसके फल में समभाव रहने का नाम 'समत्व' है।) ही योग कहलाता है
 ॥48॥

~ श्लोक 48 - अध्याय 2 - गीता का सार

बुधवार, 5 अगस्त 2020

श्रीमद्भागवत गीता

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
 मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि॥

तेरा कर्म करने में ही अधिकार है, उसके फलों में कभी नहीं। इसलिए तू कर्मों के फल हेतु मत हो तथा तेरी कर्म न करने में भी आसक्ति न हो
 ॥47॥

~ श्लोक 47 - अध्याय 2 - गीता का सार

शनिवार, 1 अगस्त 2020

श्रीमद्भागवत गीता

यावानर्थ उदपाने सर्वतः सम्प्लुतोदके।
 तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः॥

सब ओर से परिपूर्ण जलाशय के प्राप्त हो जाने पर छोटे जलाशय में मनुष्य का जितना प्रयोजन रहता है, ब्रह्म को तत्व से जानने वाले ब्राह्मण का समस्त वेदों में उतना ही प्रयोजन रह जाता है
 ॥46॥

~ श्लोक 46 - अध्याय 2 - गीता का सार

गुरुवार, 30 जुलाई 2020

श्रीमद्भागवत गीता

त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन।
 निर्द्वन्द्वो नित्यसत्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्‌॥

हे अर्जुन! वेद उपर्युक्त प्रकार से तीनों गुणों के कार्य रूप समस्त भोगों एवं उनके साधनों का प्रतिपादन करने वाले हैं, इसलिए तू उन भोगों एवं उनके साधनों में आसक्तिहीन, हर्ष-शोकादि द्वंद्वों से रहित, नित्यवस्तु परमात्मा में स्थित योग (अप्राप्त की प्राप्ति का नाम 'योग' है।) क्षेम (प्राप्त वस्तु की रक्षा का नाम 'क्षेम' है।) को न चाहने वाला और स्वाधीन अन्तःकरण वाला हो
 ॥45॥
~ श्लोक 45 - अध्याय 2

बुधवार, 29 जुलाई 2020

श्रीमद्भागवत गीता

यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः।
 वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः॥
 कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम्‌।
 क्रियाविश्लेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति॥
 भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम्‌।
 व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते॥

हे अर्जुन! जो भोगों में तन्मय हो रहे हैं, जो कर्मफल के प्रशंसक वेदवाक्यों में ही प्रीति रखते हैं, जिनकी बुद्धि में स्वर्ग ही परम प्राप्य वस्तु है और जो स्वर्ग से बढ़कर दूसरी कोई वस्तु ही नहीं है- ऐसा कहने वाले हैं, वे अविवेकीजन इस प्रकार की जिस पुष्पित अर्थात्‌ दिखाऊ शोभायुक्त वाणी को कहा करते हैं, जो कि जन्मरूप कर्मफल देने वाली एवं भोग तथा ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिए नाना प्रकार की बहुत-सी क्रियाओं का वर्णन करने वाली है, उस वाणी द्वारा जिनका चित्त हर लिया गया है, जो भोग और ऐश्वर्य में अत्यन्त आसक्त हैं, उन पुरुषों की परमात्मा में निश्चियात्मिका बुद्धि नहीं होती
 ॥42-44॥

~ श्लोक 42, 43, 44 - अध्याय 2 - गीता का सार

मंगलवार, 28 जुलाई 2020

श्रीमद्भागवत गीता

व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन।
 बहुशाका ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम्‌॥

हे अर्जुन! इस कर्मयोग में निश्चयात्मिका बुद्धि एक ही होती है, किन्तु अस्थिर विचार वाले विवेकहीन सकाम मनुष्यों की बुद्धियाँ निश्चय ही बहुत भेदों वाली और अनन्त होती हैं
 ॥41॥

~ श्लोक 41 - अध्याय 2 - गीता का सार

सोमवार, 27 जुलाई 2020

श्रीमद्भागवत गीता

यनेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवातो न विद्यते।
 स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्‌॥

इस कर्मयोग में आरंभ का अर्थात बीज का नाश नहीं है और उलटा फलरूप दोष भी नहीं है, बल्कि इस कर्मयोग रूप धर्म का थोड़ा-सा भी साधन जन्म-मृत्यु रूप महान भय से रक्षा कर लेता है
 ॥40॥

~ श्लोक 40 - अध्याय 2 - गीता का सार

रविवार, 26 जुलाई 2020

श्रीमद्भागवत गीता

( कर्मयोग का विषय )
 एषा तेऽभिहिता साङ्‍ख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां श्रृणु।
 बुद्ध्‌या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि॥

हे पार्थ! यह बुद्धि तेरे लिए ज्ञानयोग के विषय में कही गई और अब तू इसको कर्मयोग के (अध्याय 3 श्लोक 3 की टिप्पणी में इसका विस्तार देखें।) विषय में सुन- जिस बुद्धि से युक्त हुआ तू कर्मों के बंधन को भली-भाँति त्याग देगा अर्थात सर्वथा नष्ट कर डालेगा
 ॥39॥

~ श्लोक 39 - अध्याय 2

शुक्रवार, 24 जुलाई 2020

श्रीमद्भागवत गीता

सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ।
 ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि॥

जय-पराजय, लाभ-हानि और सुख-दुख को समान समझकर, उसके बाद युद्ध के लिए तैयार हो जा, इस प्रकार युद्ध करने से तू पाप को नहीं प्राप्त होगा
 ॥38॥

~ श्लोक 38 - अध्याय 2 - गीता का सार

गुरुवार, 23 जुलाई 2020

श्रीमद्भागवत गीता

हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्‌।
 तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः॥

या तो तू युद्ध में मारा जाकर स्वर्ग को प्राप्त होगा अथवा संग्राम में जीतकर पृथ्वी का राज्य भोगेगा। इस कारण हे अर्जुन! तू युद्ध के लिए निश्चय करके खड़ा हो जा
 ॥37॥

~ श्लोक 37 - अध्याय 2 - गीता का सार

बुधवार, 22 जुलाई 2020

श्रीमद्भागवत गीता

अवाच्यवादांश्च बहून्‌ वदिष्यन्ति तवाहिताः।
 निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम्‌॥

तेरे वैरी लोग तेरे सामर्थ्य की निंदा करते हुए तुझे बहुत से न कहने योग्य वचन भी कहेंगे, उससे अधिक दुःख और क्या होगा?
 ॥36॥

~ श्लोक 36 - अध्याय 2

मंगलवार, 21 जुलाई 2020

श्रीमद्भागवत गीता

भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः।
 येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम्‌॥

और जिनकी दृष्टि में तू पहले बहुत सम्मानित होकर अब लघुता को प्राप्त होगा, वे महारथी लोग तुझे भय के कारण युद्ध से हटा हुआ मानेंगे
 ॥35॥

~ श्लोक 35 - अध्याय 2

रविवार, 19 जुलाई 2020

श्रीमद्भागवत गीता

अकीर्तिं चापि भूतानि
 कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम्‌।
 सम्भावितस्य चाकीर्ति-
 र्मरणादतिरिच्यते॥

तथा सब लोग तेरी बहुत काल तक रहने वाली अपकीर्ति का भी कथन करेंगे और माननीय पुरुष के लिए अपकीर्ति मरण से भी बढ़कर है
 ॥34॥

~ श्लोक 34 - अध्याय 2 - गीता का सार

शनिवार, 18 जुलाई 2020

श्रीमद्भागवत गीता

अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं सङ्‍ग्रामं न करिष्यसि।
 ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि॥

किन्तु यदि तू इस धर्मयुक्त युद्ध को नहीं करेगा तो स्वधर्म और कीर्ति को खोकर पाप को प्राप्त होगा 
 ॥33॥

~ श्लोक 33 - अध्याय 2 - गीता का सार

शुक्रवार, 17 जुलाई 2020

श्रीमद्भागवत गीता

यदृच्छया चोपपन्नां स्वर्गद्वारमपावृतम्‌।
 सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम्‌॥

हे पार्थ! अपने-आप प्राप्त हुए और खुले हुए स्वर्ग के द्वार रूप इस प्रकार के युद्ध को भाग्यवान क्षत्रिय लोग ही पाते हैं
 ॥32॥

~ श्लोक 32 - अध्याय 2 - गीता का सार

रविवार, 12 जुलाई 2020

श्रीमद्भागवत गीता

( क्षत्रिय धर्म के अनुसार युद्ध करने की आवश्यकता का निरूपण )स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि।
 धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते॥

तथा अपने धर्म को देखकर भी तू भय करने योग्य नहीं है अर्थात्‌ तुझे भय नहीं करना चाहिए क्योंकि क्षत्रिय के लिए धर्मयुक्त युद्ध से बढ़कर दूसरा कोई कल्याणकारी कर्तव्य नहीं है
 ॥31॥

~ श्लोक 31 - अध्याय 2 - गीता का सार

शनिवार, 11 जुलाई 2020

श्रीमद्भागवत गीता

देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत।
 तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि॥

हे अर्जुन! यह आत्मा सबके शरीर में सदा ही अवध्य (जिसका वध नहीं किया जा सके) है। इस कारण सम्पूर्ण प्राणियों के लिए तू शोक करने योग्य नहीं है
 ॥30॥

~ श्लोक 30 - अध्याय 2 - गीता का सार

शुक्रवार, 10 जुलाई 2020

श्रीमद्भागवत गीता

आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेन-
 माश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः।
 आश्चर्यवच्चैनमन्यः श्रृणोति
 श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित्‌॥

कोई एक महापुरुष ही इस आत्मा को आश्चर्य की भाँति देखता है और वैसे ही दूसरा कोई महापुरुष ही इसके तत्व का आश्चर्य की भाँति वर्णन करता है तथा दूसरा कोई अधिकारी पुरुष ही इसे आश्चर्य की भाँति सुनता है और कोई-कोई तो सुनकर भी इसको नहीं जानता
 ॥29॥

~ श्लोक 29 - अध्याय 2 - गीता का सार

बुधवार, 8 जुलाई 2020

श्रीमद्भागवत गीता

अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत।
 अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना॥

हे अर्जुन! सम्पूर्ण प्राणी जन्म से पहले अप्रकट थे और मरने के बाद भी अप्रकट हो जाने वाले हैं, केवल बीच में ही प्रकट हैं, फिर ऐसी स्थिति में क्या शोक करना है?
 ॥28॥

~ श्लोक 28 - अध्याय 2 - गीता का सार

मंगलवार, 7 जुलाई 2020

श्रीमद्भागवत गीता

जातस्त हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च।
 तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि॥

क्योंकि इस मान्यता के अनुसार जन्मे हुए की मृत्यु निश्चित है और मरे हुए का जन्म निश्चित है। इससे भी इस बिना उपाय वाले विषय में तू शोक करने योग्य नहीं है
 ॥27॥

~ श्लोक 27 - अध्याय 2 - गीता का सार

सोमवार, 6 जुलाई 2020

श्रीमद्भागवत गीता

अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम्‌।
 तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि॥

किन्तु यदि तू इस आत्मा को सदा जन्मने वाला तथा सदा मरने वाला मानता हो, तो भी हे महाबाहो! तू इस प्रकार शोक करने योग्य नहीं है
 ॥26॥

~ श्लोक 26 - अध्याय 2 - गीता का सार

रविवार, 5 जुलाई 2020

श्रीमद्भागवत गीता

अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते।
 तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि॥॥

यह आत्मा अव्यक्त है, यह आत्मा अचिन्त्य है और यह आत्मा विकाररहित कहा जाता है। इससे हे अर्जुन! इस आत्मा को उपर्युक्त प्रकार से जानकर तू शोक करने के योग्य नहीं है अर्थात्‌ तुझे शोक करना उचित नहीं है
 ॥25॥

~ श्लोक 25 - अध्याय 2 - गीता का सार

शनिवार, 4 जुलाई 2020

श्रीमद्भागवत गीता

अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च।
 नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः॥

क्योंकि यह आत्मा अच्छेद्य है, यह आत्मा अदाह्य, अक्लेद्य और निःसंदेह अशोष्य है तथा यह आत्मा नित्य, सर्वव्यापी, अचल, स्थिर रहने वाला और सनातन है
 ॥24॥

~ श्लोक 24 - अध्याय 2

बुधवार, 1 जुलाई 2020

श्रीमद्भागवत गीता

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।
 न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः॥

इस आत्मा को शस्त्र नहीं काट सकते, इसको आग नहीं जला सकती, इसको जल नहीं गला सकता और वायु नहीं सुखा सकता
 ॥23॥

~ श्लोक 23 - अध्याय 2 - गीता का सार

मंगलवार, 30 जून 2020

श्रीमद्भागवत गीता

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय
 नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।
 तथा शरीराणि विहाय जीर्णा-
 न्यन्यानि संयाति नवानि देही॥

जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर दूसरे नए वस्त्रों को ग्रहण करता है, वैसे ही जीवात्मा पुराने शरीरों को त्यागकर दूसरे नए शरीरों को प्राप्त होता है
 ॥22॥

~ श्लोक 22 - अध्याय 2 - गीता का सार

सोमवार, 29 जून 2020

श्रीमद्भागवत गीता

वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम्‌।
 कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम्‌॥

हे पृथापुत्र अर्जुन! जो पुरुष इस आत्मा को नाशरहित, नित्य, अजन्मा और अव्यय जानता है, वह पुरुष कैसे किसको मरवाता है और कैसे किसको मारता है?
 ॥21॥

~ श्लोक 21 - अध्याय 2 - गीता का सार

रविवार, 28 जून 2020

श्रीमद्भगवद्गीता

न जायते म्रियते वा कदाचि-
 न्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।
 अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो-
 न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥

यह आत्मा किसी काल में भी न तो जन्मता है और न मरता ही है तथा न यह उत्पन्न होकर फिर होने वाला ही है क्योंकि यह अजन्मा, नित्य, सनातन और पुरातन है, शरीर के मारे जाने पर भी यह नहीं मारा जाता
 ॥20॥

~ श्लोक 20 - अध्याय 2 

शनिवार, 27 जून 2020

श्रीमद्भागवत गीता

य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम्‌।
 उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते॥

जो इस आत्मा को मारने वाला समझता है तथा जो इसको मरा मानता है, वे दोनों ही नहीं जानते क्योंकि यह आत्मा वास्तव में न तो किसी को मारता है और न किसी द्वारा मारा जाता है
 ॥19॥

~ श्लोक 19 - अध्याय 2 - गीता का सार

शुक्रवार, 26 जून 2020

श्रीमद्भागवत गीता

अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः।
 अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत॥

इस नाशरहित, अप्रमेय, नित्यस्वरूप जीवात्मा के ये सब शरीर नाशवान कहे गए हैं, इसलिए हे भरतवंशी अर्जुन! तू युद्ध कर
 ॥18॥

~ श्लोक 18 - अध्याय 2 - गीता का सार

गुरुवार, 18 जून 2020

श्रीमद्भागवत गीता

अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम्‌।
 विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति॥

नाशरहित तो तू उसको जान, जिससे यह सम्पूर्ण जगत्‌- दृश्यवर्ग व्याप्त है। इस अविनाशी का विनाश करने में कोई भी समर्थ नहीं है
 ॥17॥

~ श्लोक 17 - अध्याय 2 - गीता का सार

बुधवार, 17 जून 2020

श्रीमद्भागवत गीता

नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः।
 उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्वदर्शिभिः॥

असत्‌ वस्तु की तो सत्ता नहीं है और सत्‌ का अभाव नहीं है। इस प्रकार इन दोनों का ही तत्व तत्वज्ञानी पुरुषों द्वारा देखा गया है
 ॥16॥

~ श्लोक 16 - अध्याय 2 

मंगलवार, 16 जून 2020

श्रीमद्भागवत गीता

यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ।
 समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते॥

क्योंकि हे पुरुषश्रेष्ठ! दुःख-सुख को समान समझने वाले जिस धीर पुरुष को ये इन्द्रिय और विषयों के संयोग व्याकुल नहीं करते, वह मोक्ष के योग्य होता है
 ॥15॥

~ श्लोक 15 - अध्याय 2 

सोमवार, 15 जून 2020

श्रीमद्भागवत गीता

मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः।
 आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत॥

हे कुंतीपुत्र! सर्दी-गर्मी और सुख-दुःख को देने वाले इन्द्रिय और विषयों के संयोग तो उत्पत्ति-विनाशशील और अनित्य हैं, इसलिए हे भारत! उनको तू सहन कर
 ॥14॥

~ श्लोक 14 - अध्याय 2 

शनिवार, 13 जून 2020

श्रीमद्भागवत गीता

देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा।
 तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति॥

जैसे जीवात्मा की इस देह में बालकपन, जवानी और वृद्धावस्था होती है, वैसे ही अन्य शरीर की प्राप्ति होती है, उस विषय में धीर पुरुष मोहित नहीं होता।13॥

~ श्लोक 13 - अध्याय 2 

शुक्रवार, 12 जून 2020

श्रीमद्भागवत गीता

न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः।
 न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम्‌॥

न तो ऐसा ही है कि मैं किसी काल में नहीं था, तू नहीं था अथवा ये राजा लोग नहीं थे और न ऐसा ही है कि इससे आगे हम सब नहीं रहेंगे
 ॥12॥

~ श्लोक 12 - अध्याय 2 

गुरुवार, 11 जून 2020

श्रीमद्भागवत गीता

( सांख्ययोग का विषय )
 श्री भगवानुवाच
 अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे।
 गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः॥

श्री भगवान बोले, हे अर्जुन! तू न शोक करने योग्य मनुष्यों के लिए शोक करता है और पण्डितों के से वचनों को कहता है, परन्तु जिनके प्राण चले गए हैं, उनके लिए और जिनके प्राण नहीं गए हैं उनके लिए भी पण्डितजन शोक नहीं करते
 ॥11॥

~ श्लोक 11 - अध्याय 2 

सोमवार, 8 जून 2020

श्रीमद्भागवत गीता

तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत।
 सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदंतमिदं वचः॥

हे भरतवंशी धृतराष्ट्र! अंतर्यामी श्रीकृष्ण महाराज दोनों सेनाओं के बीच में शोक करते हुए उस अर्जुन को हँसते हुए से यह वचन बोले
 
 ॥10॥

~ श्लोक 10 - अध्याय 2 

रविवार, 7 जून 2020

श्रीमद्भागवत गीता

संजय उवाच
 एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तप।
 न योत्स्य इतिगोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह॥

संजय बोले- हे राजन्‌! निद्रा को जीतने वाले अर्जुन अंतर्यामी श्रीकृष्ण महाराज के प्रति इस प्रकार कहकर फिर श्री गोविंद भगवान्‌ से 'युद्ध नहीं करूँगा' यह स्पष्ट कहकर चुप हो गए
 ॥9॥

~ श्लोक 9 - अध्याय 2 

शनिवार, 6 जून 2020

श्रीमद्भागवत गीता

न हि प्रपश्यामि ममापनुद्या-
 द्यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम्‌।
 अवाप्य भूमावसपत्रमृद्धं-
 राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम्‌॥

क्योंकि भूमि में निष्कण्टक, धन-धान्य सम्पन्न राज्य को और देवताओं के स्वामीपने को प्राप्त होकर भी मैं उस उपाय को नहीं देखता हूँ, जो मेरी इन्द्रियों के सुखाने वाले शोक को दूर कर सके
 ॥8॥

~ श्लोक 8 - अध्याय 2 

शुक्रवार, 5 जून 2020

श्रीमद्भागवत गीता

कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः
 पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः।
 यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे
 शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्‌॥

इसलिए कायरता रूप दोष से उपहत हुए स्वभाव वाला तथा धर्म के विषय में मोहित चित्त हुआ मैं आपसे पूछता हूँ कि जो साधन निश्चित कल्याणकारक हो, वह मेरे लिए कहिए क्योंकि मैं आपका शिष्य हूँ, इसलिए आपके शरण हुए मुझको शिक्षा दीजिए
 ॥7॥

~ श्लोक 7 - अध्याय 2 

गुरुवार, 4 जून 2020

श्रीमद्भागवत गीता

न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो-
 यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः।
 यानेव हत्वा न जिजीविषाम-
 स्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः॥

हम यह भी नहीं जानते कि हमारे लिए युद्ध करना और न करना- इन दोनों में से कौन-सा श्रेष्ठ है, अथवा यह भी नहीं जानते कि उन्हें हम जीतेंगे या हमको वे जीतेंगे। और जिनको मारकर हम जीना भी नहीं चाहते, वे ही हमारे आत्मीय धृतराष्ट्र के पुत्र हमारे मुकाबले में खड़े हैं
 ॥6॥

~ श्लोक 6 - अध्याय 2 

बुधवार, 3 जून 2020

श्रीमद्भागवत गीता

गुरूनहत्वा हि महानुभावा-
 ञ्छ्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके।
 हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव
 भुंजीय भोगान्‌ रुधिरप्रदिग्धान्‌॥

इसलिए इन महानुभाव गुरुजनों को न मारकर मैं इस लोक में भिक्षा का अन्न भी खाना कल्याणकारक समझता हूँ क्योंकि गुरुजनों को मारकर भी इस लोक में रुधिर से सने हुए अर्थ और कामरूप भोगों को ही तो भोगूँगा
 ॥5॥

~ श्लोक 5 - अध्याय 2 

मंगलवार, 2 जून 2020

श्रीमद्भागवत गीता

अर्जुन उवाच
 कथं भीष्ममहं सङ्‍ख्ये द्रोणं च मधुसूदन।
 इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन॥

अर्जुन बोले- हे मधुसूदन! मैं रणभूमि में किस प्रकार बाणों से भीष्म पितामह और द्रोणाचार्य के विरुद्ध लड़ूँगा? क्योंकि हे अरिसूदन! वे दोनों ही पूजनीय हैं
 ॥4॥

~ श्लोक 4 - अध्याय 2

शुक्रवार, 29 मई 2020

श्रीमद्भागवत गीता

श्रीभगवानुवाच
 कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम्‌।
 अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन।

श्रीभगवान बोले- हे अर्जुन! तुझे इस असमय में यह मोह किस हेतु से प्राप्त हुआ? क्योंकि न तो यह श्रेष्ठ पुरुषों द्वारा आचरित है, न स्वर्ग को देने वाला है और न कीर्ति को करने वाला ही है
 ॥2॥

~ श्लोक 2 - अध्याय 2

गुरुवार, 28 मई 2020

श्रीमद्भागवत गीता

( अर्जुन की कायरता के विषय में श्री कृष्णार्जुन-संवाद )
 संजय उवाच
 तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम्‌।
 विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः॥

संजय बोले- उस प्रकार करुणा से व्याप्त और आँसुओं से पूर्ण तथा व्याकुल नेत्रों वाले शोकयुक्त उस अर्जुन के प्रति भगवान मधुसूदन ने यह वचन कहा
 ॥1॥

~ श्लोक 1 - अध्याय 2 

बुधवार, 27 मई 2020

श्रीमद्भागवत गीता

एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति।
 स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति॥

हे अर्जुन! यह ब्रह्म को प्राप्त हुए पुरुष की स्थिति है, इसको प्राप्त होकर योगी कभी मोहित नहीं होता और अंतकाल में भी इस ब्राह्मी स्थिति में स्थित होकर ब्रह्मानन्द को प्राप्त हो जाता है
 ॥72॥ 

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे सांख्ययोगो नाम द्वितीयोऽध्यायः 
 ॥2॥

~ श्लोक 72 - अध्याय 2 

मंगलवार, 26 मई 2020

श्रीमद्भागवत गीता

विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः।
 निर्ममो निरहंकारः स शान्तिमधिगच्छति॥

जो पुरुष सम्पूर्ण कामनाओं को त्याग कर ममतारहित, अहंकाररहित और स्पृहारहित हुआ विचरता है, वही शांति को प्राप्त होता है अर्थात वह शान्ति को प्राप्त है
 ॥71॥

~ श्लोक 71 - अध्याय 2 

सोमवार, 25 मई 2020

श्रीमद्भागवत गीता

आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं-
 समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत्‌।
 तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे
 स शान्तिमाप्नोति न कामकामी॥

जैसे नाना नदियों के जल सब ओर से परिपूर्ण, अचल प्रतिष्ठा वाले समुद्र में उसको विचलित न करते हुए ही समा जाते हैं, वैसे ही सब भोग जिस स्थितप्रज्ञ पुरुष में किसी प्रकार का विकार उत्पन्न किए बिना ही समा जाते हैं, वही पुरुष परम शान्ति को प्राप्त होता है, भोगों को चाहने वाला नहीं
 ॥70॥

~ श्लोक 70 - अध्याय 2 

शुक्रवार, 22 मई 2020

श्रीमद्भागवत गीता

या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।
 यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः॥

सम्पूर्ण प्राणियों के लिए जो रात्रि के समान है, उस नित्य ज्ञानस्वरूप परमानन्द की प्राप्ति में स्थितप्रज्ञ योगी जागता है और जिस नाशवान सांसारिक सुख की प्राप्ति में सब प्राणी जागते हैं, परमात्मा के तत्व को जानने वाले मुनि के लिए वह रात्रि के समान है
 ॥69॥

~ श्लोक 69 - अध्याय 2 

गुरुवार, 21 मई 2020

श्रीमद्भागवत गीता

तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः।
 इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥

इसलिए हे महाबाहो! जिस पुरुष की इन्द्रियाँ इन्द्रियों के विषयों में सब प्रकार निग्रह की हुई हैं, उसी की बुद्धि स्थिर है
 ॥68॥

~ श्लोक 68 - अध्याय 2 

बुधवार, 20 मई 2020

श्रीमद्भागवत गीता

इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते।
 तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि॥

क्योंकि जैसे जल में चलने वाली नाव को वायु हर लेती है, वैसे ही विषयों में विचरती हुई इन्द्रियों में से मन जिस इन्द्रिय के साथ रहता है, वह एक ही इन्द्रिय इस अयुक्त पुरुष की बुद्धि को हर लेती है
 ॥67॥

~ श्लोक 67 - अध्याय 2 

मंगलवार, 19 मई 2020

श्रीमद्भागवत गीता

नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना।
 न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम्‌॥

न जीते हुए मन और इन्द्रियों वाले पुरुष में निश्चयात्मिका बुद्धि नहीं होती और उस अयुक्त मनुष्य के अन्तःकरण में भावना भी नहीं होती तथा भावनाहीन मनुष्य को शान्ति नहीं मिलती और शान्तिरहित मनुष्य को सुख कैसे मिल सकता है?
 ॥66॥

~ श्लोक 66 - अध्याय 2

सोमवार, 18 मई 2020

श्रीमद्भागवत गीता

प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते।
 प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते॥

अन्तःकरण की प्रसन्नता होने पर इसके सम्पूर्ण दुःखों का अभाव हो जाता है और उस प्रसन्नचित्त वाले कर्मयोगी की बुद्धि शीघ्र ही सब ओर से हटकर एक परमात्मा में ही भलीभाँति स्थिर हो जाती है
 ॥65॥

~ श्लोक 65 - अध्याय 2 

शनिवार, 16 मई 2020

श्रीमद्भागवत गीता

रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन्‌।
 आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति॥

परंन्तु अपने अधीन किए हुए अन्तःकरण वाला साधक अपने वश में की हुई, राग-द्वेष रहित इन्द्रियों द्वारा विषयों में विचरण करता हुआ अन्तःकरण की प्रसन्नता को प्राप्त होता है
 ॥64॥

~ श्लोक 64 - अध्याय 2 

गुरुवार, 14 मई 2020

श्रीमद्भागवत गीता

क्रोधाद्‍भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः।
 स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥

क्रोध से अत्यन्त मूढ़ भाव उत्पन्न हो जाता है, मूढ़ भाव से स्मृति में भ्रम हो जाता है, स्मृति में भ्रम हो जाने से बुद्धि अर्थात ज्ञानशक्ति का नाश हो जाता है और बुद्धि का नाश हो जाने से यह पुरुष अपनी स्थिति से गिर जाता है
 ॥63॥

~ श्लोक 63 - अध्याय 2 

मंगलवार, 12 मई 2020

श्रीमद्भागवत गीता

ध्यायतो विषयान्पुंसः संगस्तेषूपजायते।
 संगात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥

विषयों का चिन्तन करने वाले पुरुष की उन विषयों में आसक्ति हो जाती है, आसक्ति से उन विषयों की कामना उत्पन्न होती है और कामना में विघ्न पड़ने से क्रोध उत्पन्न होता है
 ॥62॥

~ श्लोक 62 - अध्याय 2

सोमवार, 11 मई 2020

श्रीमद्भागवत गीता

तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः।
 वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥

इसलिए साधक को चाहिए कि वह उन सम्पूर्ण इन्द्रियों को वश में करके समाहित चित्त हुआ मेरे परायण होकर ध्यान में बैठे क्योंकि जिस पुरुष की इन्द्रियाँ वश में होती हैं, उसी की बुद्धि स्थिर हो जाती है
 ॥61॥

~ श्लोक 61 - अध्याय 2

शनिवार, 9 मई 2020

श्रीमद्भागवत गीता

यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः।
 इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः॥

हे अर्जुन! आसक्ति का नाश न होने के कारण ये प्रमथन स्वभाव वाली इन्द्रियाँ यत्न करते हुए बुद्धिमान पुरुष के मन को भी बलात्‌ हर लेती हैं
 ॥60॥

~ श्लोक 60 - अध्याय 2

शुक्रवार, 8 मई 2020

श्रीमद्भागवत गीता

विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः।
 रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्टवा निवर्तते॥

इन्द्रियों द्वारा विषयों को ग्रहण न करने वाले पुरुष के भी केवल विषय तो निवृत्त हो जाते हैं, परन्तु उनमें रहने वाली आसक्ति निवृत्त नहीं होती। इस स्थितप्रज्ञ पुरुष की तो आसक्ति भी परमात्मा का साक्षात्कार करके निवृत्त हो जाती है
 ॥59॥

~ श्लोक 59 - अध्याय 2

मंगलवार, 5 मई 2020

श्रीमद्भागवत गीता

दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः।
 वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते॥

दुःखों की प्राप्ति होने पर जिसके मन में उद्वेग नहीं होता, सुखों की प्राप्ति में सर्वथा निःस्पृह है तथा जिसके राग, भय और क्रोध नष्ट हो गए हैं, ऐसा मुनि स्थिरबुद्धि कहा जाता है
 ॥56॥

~ श्लोक 56 - अध्याय 2 

सोमवार, 4 मई 2020

श्रीमद्भागवत गीता

श्रीभगवानुवाच
 प्रजहाति यदा कामान्‌ सर्वान्पार्थ मनोगतान्‌।
 आत्मयेवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते॥

श्री भगवान्‌ बोले- हे अर्जुन! जिस काल में यह पुरुष मन में स्थित सम्पूर्ण कामनाओं को भलीभाँति त्याग देता है और आत्मा से आत्मा में ही संतुष्ट रहता है, उस काल में वह स्थितप्रज्ञ कहा जाता है
 ॥55॥

~ श्लोक 55 - अध्याय 2 

रविवार, 3 मई 2020

श्रीमद्भागवत गीता

( स्थिरबुद्धि पुरुष के लक्षण और उसकी महिमा )
 अर्जुन उवाच
 स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव।
 स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम्‌॥

अर्जुन बोले- हे केशव! समाधि में स्थित परमात्मा को प्राप्त हुए स्थिरबुद्धि पुरुष का क्या लक्षण है? वह स्थिरबुद्धि पुरुष कैसे बोलता है, कैसे बैठता है और कैसे चलता है?
 ॥54॥

~ श्लोक 54 - अध्याय 2 

शनिवार, 2 मई 2020

श्रीमद्भागवत गीता

श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला।
 समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि॥

भाँति-भाँति के वचनों को सुनने से विचलित हुई तेरी बुद्धि जब परमात्मा में अचल और स्थिर ठहर जाएगी, तब तू योग को प्राप्त हो जाएगा अर्थात तेरा परमात्मा से नित्य संयोग हो जाएगा
 ॥53॥

~ श्लोक 53 - अध्याय 2 

शुक्रवार, 1 मई 2020

श्रीमद्भागवत गीता

यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति।
 तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च॥

जिस काल में तेरी बुद्धि मोहरूपी दलदल को भलीभाँति पार कर जाएगी, उस समय तू सुने हुए और सुनने में आने वाले इस लोक और परलोक संबंधी सभी भोगों से वैराग्य को प्राप्त हो जाएगा
 ॥52॥

~ श्लोक 52 - अध्याय 2 

गुरुवार, 30 अप्रैल 2020

श्रीमद्भागवत गीता

कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः।
 जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम्‌॥

क्योंकि समबुद्धि से युक्त ज्ञानीजन कर्मों से उत्पन्न होने वाले फल को त्यागकर जन्मरूप बंधन से मुक्त हो निर्विकार परम पद को प्राप्त हो जाते हैं
 ॥51॥

~ श्लोक 51 - अध्याय 2 

बुधवार, 29 अप्रैल 2020

श्रीमद्भागवत गीता

बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते।
 तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्‌॥

समबुद्धियुक्त पुरुष पुण्य और पाप दोनों को इसी लोक में त्याग देता है अर्थात उनसे मुक्त हो जाता है। इससे तू समत्व रूप योग में लग जा, यह समत्व रूप योग ही कर्मों में कुशलता है अर्थात कर्मबंध से छूटने का उपाय है
 ||50||

मंगलवार, 28 अप्रैल 2020

श्रीमद्भागवत गीता

दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनंजय।
 बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः॥

इस समत्वरूप बुद्धियोग से सकाम कर्म अत्यन्त ही निम्न श्रेणी का है। इसलिए हे धनंजय! तू समबुद्धि में ही रक्षा का उपाय ढूँढ अर्थात्‌ बुद्धियोग का ही आश्रय ग्रहण कर क्योंकि फल के हेतु बनने वाले अत्यन्त दीन हैं
 ॥49॥

~ श्लोक 49 - अध्याय 2

सोमवार, 27 अप्रैल 2020

श्रीमद्भागवत गीता

योगस्थः कुरु कर्माणि संग त्यक्त्वा धनंजय।
 सिद्धयसिद्धयोः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥

हे धनंजय! तू आसक्ति को त्यागकर तथा सिद्धि और असिद्धि में समान बुद्धिवाला होकर योग में स्थित हुआ कर्तव्य कर्मों को कर, समत्व (जो कुछ भी कर्म किया जाए, उसके पूर्ण होने और न होने में तथा उसके फल में समभाव रहने का नाम 'समत्व' है।) ही योग कहलाता है
 ॥48॥

~ श्लोक 48 - अध्याय 2 

रविवार, 26 अप्रैल 2020

श्रीमद्भागवत गीता

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
 मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि॥

तेरा कर्म करने में ही अधिकार है, उसके फलों में कभी नहीं। इसलिए तू कर्मों के फल हेतु मत हो तथा तेरी कर्म न करने में भी आसक्ति न हो
 ॥47॥

~ श्लोक 47 - अध्याय 2 - गीता का सार

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शुक्रवार, 24 अप्रैल 2020

श्रीमद्भागवत गीता

यावानर्थ उदपाने सर्वतः सम्प्लुतोदके।
 तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः॥

सब ओर से परिपूर्ण जलाशय के प्राप्त हो जाने पर छोटे जलाशय में मनुष्य का जितना प्रयोजन रहता है, ब्रह्म को तत्व से जानने वाले ब्राह्मण का समस्त वेदों में उतना ही प्रयोजन रह जाता है
 ॥46॥

~ श्लोक 46 - अध्याय 2

मंगलवार, 14 अप्रैल 2020

लक्ष्मण कथा

जानिए रामायण का एक अनजान सत्य... केवल लक्ष्मण ही मेघनाद का वध कर सकते थे..क्या कारण था ?..पढ़िये पूरी कथा     हनुमानजी की रामभक्ति की गाथा संसार में भर में गाई जाती है। लक्ष्मणजी की भक्ति भी अद्भुत थी। लक्ष्मणजी की कथा के बिना श्री रामकथा पूर्ण नहीं है।  अगस्त्य मुनि अयोध्या आए और लंका युद्ध का प्रसंग छिड़ गया ।    भगवान श्रीराम ने बताया कि उन्होंने कैसे रावण और कुंभकर्ण जैसे प्रचंड वीरों का वध किया और लक्ष्मण ने भी इंद्रजीत और अतिकाय जैसे शक्तिशाली असुरों को मारा ॥     अगस्त्य मुनि बोले- श्रीराम बेशक रावण और कुंभकर्ण प्रचंड वीर थे, लेकिन सबसे बड़ा वीर तो मेघनाध ही था ॥ उसने अंतरिक्ष में स्थित होकर इंद्र से युद्ध किया था और बांधकर लंका ले आया था॥     ब्रह्मा ने इंद्रजीत से दान के रूप में इंद्र को मांगा तब इंद्र मुक्त हुए थे ॥ लक्ष्मण ने उसका वध किया, इसलिए वे सबसे बड़े योद्धा हुए ॥    श्रीराम को आश्चर्य हुआ लेकिन भाई की वीरता की प्रशंसा से वह खुश थे॥ फिर भी उनके मन में जिज्ञासा पैदा हुई कि आखिर अगस्त्य मुनि ऐसा क्यों कह रहे हैं कि इंद्रजीत का वध रावण से ज्यादा मुश्किल था ॥     अगस्त्य मुनि ने कहा- प्रभु इंद्रजीत को वरदान था कि उसका वध वही कर सकता था जो.....  (१) चौदह वर्षों तक न सोया हो,   (२) जिसने चौदह साल तक किसी स्त्री का मुख न देखा हो, और   (३) चौदह साल तक भोजन न किया हो ॥       श्रीराम बोले- परंतु मैं बनवास काल में चौदह वर्षों तक नियमित रूप से लक्ष्मण के हिस्से का फल-फूल देता रहा ॥     मैं सीता के साथ एक कुटी में रहता था, बगल की कुटी में लक्ष्मण थे, फिर सीता का मुख भी न देखा हो, और चौदह वर्षों तक सोए न हों, ऐसा कैसे संभव है ॥     अगस्त्य मुनि सारी बात समझकर मुस्कुराए॥ प्रभु से कुछ छुपा है भला! दरअसल, सभी लोग सिर्फ श्रीराम का गुणगान करते थे, लेकिन प्रभु चाहते थे कि लक्ष्मण के तप और वीरता की चर्चा भी अयोध्या के घर-घर में हो ॥   अगस्त्य मुनि ने कहा – क्यों न लक्ष्मणजी से पूछा जाए ॥    लक्ष्मणजी आए प्रभु ने कहा कि आपसे जो पूछा जाए उसे सच-सच कहिएगा॥     प्रभु ने पूछा- हम तीनों चौदह वर्षों तक साथ रहे फिर तुमने सीता का मुख कैसे नहीं देखा ?, फल दिए गए फिर भी अनाहारी कैसे रहे ?, और १४ साल तक सोए नहीं ? यह कैसे हुआ ?    लक्ष्मणजी ने बताया- भैया जब हम भाभी को तलाशते ऋष्यमूक पर्वत गए तो सुग्रीव ने हमें उनके आभूषण दिखाकर पहचानने को कहा ॥         आपको स्मरण होगा मैं तो सिवाए उनके पैरों के नुपूर के कोई आभूषण नहीं पहचान पाया था क्योंकि मैंने कभी भी उनके चरणों के ऊपर देखा ही नहीं.    चौदह वर्ष नहीं सोने के बारे में सुनिए – आप औऱ माता एक कुटिया में सोते थे. मैं रातभर बाहर धनुष पर बाण चढ़ाए पहरेदारी में खड़ा रहता था. निद्रा ने मेरी आंखों पर कब्जा करने की कोशिश की तो मैंने निद्रा को अपने बाणों से बेध दिया था॥      निद्रा ने हारकर स्वीकार किया कि वह चौदह साल तक मुझे स्पर्श नहीं करेगी लेकिन जब श्रीराम का अयोध्या में राज्याभिषेक हो रहा होगा और मैं उनके पीछे सेवक की तरह छत्र लिए खड़ा रहूंगा तब वह मुझे घेरेगी ॥      आपको याद होगा राज्याभिषेक के समय मेरे हाथ से छत्र गिर गया था।    अब मैं १४ साल तक अनाहारी कैसे रहा! मैं जो फल-फूल लाता था आप उसके तीन भाग करते थे. एक भाग देकर आप मुझसे कहते थे लक्ष्मण फल रख लो॥      आपने कभी फल खाने को नहीं कहा- फिर बिना आपकी आज्ञा के मैं उसे खाता कैसे?      मैंने उन्हें संभाल कर रख दिया॥ सभी फल उसी कुटिया में अभी भी रखे होंगे ॥ प्रभु के आदेश पर लक्ष्मणजी चित्रकूट की कुटिया में से वे सारे फलों की टोकरी लेकर आए और दरबार में रख दिया॥ फलों की गिनती हुई, सात दिन के हिस्से के फल नहीं थे॥    प्रभु ने कहा- इसका अर्थ है कि तुमने सात दिन तो आहार लिया था?     लक्ष्मणजी ने सात फल कम होने के बारे बताया- उन सात दिनों में फल आए ही नहीं :—१--जिस दिन हमें पिताश्री के स्वर्गवासी होने की सूचना मिली, हम निराहारी रहे॥२--जिस दिन रावण ने माता का हरण किया उस दिन फल लाने कौन जाता॥३--जिस दिन समुद्र की साधना कर आप उससे राह मांग रहे थे, ।४--जिस दिन आप इंद्रजीत के नागपाश में बंधकर दिनभर अचेत रहे,।५--जिस दिन इंद्रजीत ने मायावी सीता को काटा था और हम शोक में रहे,।६--जिस दिन मेघनाद ने मुझे शक्ति मारी,७--और जिस दिन आपने रावण-वध किया ॥  इन दिनों में हमें भोजन की सुध कहां थी॥ विश्वामित्र मुनि से मैंने एक अतिरिक्त विद्या का ज्ञान लिया था- बिना आहार किए जीने की विद्या. उसके प्रयोग से मैं चौदह साल तक अपनी भूख को नियंत्रित कर सका जिससे इंद्रजीत मारा गया ॥    भगवान श्रीराम ने लक्ष्मणजी की तपस्या के बारे में सुनकर उन्हें ह्रदय से लगा लिया ।        

जय सियाराम जय जय राम            
जय  शेषावतार लक्ष्मण भैया की     
जय संकट मोचन वीर हनुमान की.......।

श्रीमद्भागवत गीता

त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन।
 निर्द्वन्द्वो नित्यसत्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्‌॥

हे अर्जुन! वेद उपर्युक्त प्रकार से तीनों गुणों के कार्य रूप समस्त भोगों एवं उनके साधनों का प्रतिपादन करने वाले हैं, इसलिए तू उन भोगों एवं उनके साधनों में आसक्तिहीन, हर्ष-शोकादि द्वंद्वों से रहित, नित्यवस्तु परमात्मा में स्थित योग (अप्राप्त की प्राप्ति का नाम 'योग' है।) क्षेम (प्राप्त वस्तु की रक्षा का नाम 'क्षेम' है।) को न चाहने वाला और स्वाधीन अन्तःकरण वाला हो
 ॥45॥

~ श्लोक 45 - अध्याय 2 

रविवार, 5 अप्रैल 2020

श्रीमद्भागवत गीता

यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः।
 वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः॥
 कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम्‌।
 क्रियाविश्लेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति॥
 भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम्‌।
 व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते॥

हे अर्जुन! जो भोगों में तन्मय हो रहे हैं, जो कर्मफल के प्रशंसक वेदवाक्यों में ही प्रीति रखते हैं, जिनकी बुद्धि में स्वर्ग ही परम प्राप्य वस्तु है और जो स्वर्ग से बढ़कर दूसरी कोई वस्तु ही नहीं है- ऐसा कहने वाले हैं, वे अविवेकीजन इस प्रकार की जिस पुष्पित अर्थात्‌ दिखाऊ शोभायुक्त वाणी को कहा करते हैं, जो कि जन्मरूप कर्मफल देने वाली एवं भोग तथा ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिए नाना प्रकार की बहुत-सी क्रियाओं का वर्णन करने वाली है, उस वाणी द्वारा जिनका चित्त हर लिया गया है, जो भोग और ऐश्वर्य में अत्यन्त आसक्त हैं, उन पुरुषों की परमात्मा में निश्चियात्मिका बुद्धि नहीं होती
 ॥42-44॥

~ श्लोक 42, 43, 44 - अध्याय 2

शनिवार, 4 अप्रैल 2020

श्रीमद्भागवत गीता

व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन।
 बहुशाका ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम्‌॥

हे अर्जुन! इस कर्मयोग में निश्चयात्मिका बुद्धि एक ही होती है, किन्तु अस्थिर विचार वाले विवेकहीन सकाम मनुष्यों की बुद्धियाँ निश्चय ही बहुत भेदों वाली और अनन्त होती हैं
 ॥41॥

~ श्लोक 41 - अध्याय 2 

शुक्रवार, 3 अप्रैल 2020

श्रीमद्भागवत गीता

यनेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवातो न विद्यते।
 स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्‌॥

इस कर्मयोग में आरंभ का अर्थात बीज का नाश नहीं है और उलटा फलरूप दोष भी नहीं है, बल्कि इस कर्मयोग रूप धर्म का थोड़ा-सा भी साधन जन्म-मृत्यु रूप महान भय से रक्षा कर लेता है
 ॥40॥

~ श्लोक 40 - अध्याय 2

गुरुवार, 2 अप्रैल 2020

श्रीमद्भागवत गीता

( कर्मयोग का विषय )
 एषा तेऽभिहिता साङ्‍ख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां श्रृणु।
 बुद्ध्‌या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि॥

हे पार्थ! यह बुद्धि तेरे लिए ज्ञानयोग के विषय में कही गई और अब तू इसको कर्मयोग के (अध्याय 3 श्लोक 3 की टिप्पणी में इसका विस्तार देखें।) विषय में सुन- जिस बुद्धि से युक्त हुआ तू कर्मों के बंधन को भली-भाँति त्याग देगा अर्थात सर्वथा नष्ट कर डालेगा
 ॥39॥

~ श्लोक 39 - अध्याय 2 

बुधवार, 1 अप्रैल 2020

श्रीमद्भागवत गीता

सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ।
 ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि॥

जय-पराजय, लाभ-हानि और सुख-दुख को समान समझकर, उसके बाद युद्ध के लिए तैयार हो जा, इस प्रकार युद्ध करने से तू पाप को नहीं प्राप्त होगा
 ॥38॥

~ श्लोक 38 - अध्याय 2

मंगलवार, 31 मार्च 2020

श्रीमद्भागवत गीता

हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्‌।
 तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः॥

या तो तू युद्ध में मारा जाकर स्वर्ग को प्राप्त होगा अथवा संग्राम में जीतकर पृथ्वी का राज्य भोगेगा। इस कारण हे अर्जुन! तू युद्ध के लिए निश्चय करके खड़ा हो जा
 ॥37॥

~ श्लोक 37 - अध्याय 2 

सोमवार, 30 मार्च 2020

श्रीमद्भागवत गीता

अवाच्यवादांश्च बहून्‌ वदिष्यन्ति तवाहिताः।
 निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम्‌॥

तेरे वैरी लोग तेरे सामर्थ्य की निंदा करते हुए तुझे बहुत से न कहने योग्य वचन भी कहेंगे, उससे अधिक दुःख और क्या होगा?
 ॥36॥

~ श्लोक 36 - अध्याय 2 

रविवार, 29 मार्च 2020

श्रीमद्भागवत गीता

भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः।
 येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम्‌॥

और जिनकी दृष्टि में तू पहले बहुत सम्मानित होकर अब लघुता को प्राप्त होगा, वे महारथी लोग तुझे भय के कारण युद्ध से हटा हुआ मानेंगे
 ॥35॥

~ श्लोक 35 - अध्याय 2 

शनिवार, 28 मार्च 2020

श्रीमद्भागवत गीता

अकीर्तिं चापि भूतानि
 कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम्‌।
 सम्भावितस्य चाकीर्ति-
 र्मरणादतिरिच्यते॥

तथा सब लोग तेरी बहुत काल तक रहने वाली अपकीर्ति का भी कथन करेंगे और माननीय पुरुष के लिए अपकीर्ति मरण से भी बढ़कर है
 ॥34॥

~ श्लोक 34 - अध्याय 2 

शुक्रवार, 27 मार्च 2020

श्रीमद्भागवत गीता

अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं सङ्‍ग्रामं न करिष्यसि।
 ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि॥

किन्तु यदि तू इस धर्मयुक्त युद्ध को नहीं करेगा तो स्वधर्म और कीर्ति को खोकर पाप को प्राप्त होगा 
 ॥33॥

~ श्लोक 33 - अध्याय 2

गुरुवार, 26 मार्च 2020

श्रीमद्भागवत गीता

यदृच्छया चोपपन्नां स्वर्गद्वारमपावृतम्‌।
 सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम्‌॥

हे पार्थ! अपने-आप प्राप्त हुए और खुले हुए स्वर्ग के द्वार रूप इस प्रकार के युद्ध को भाग्यवान क्षत्रिय लोग ही पाते हैं
 ॥32॥

~ श्लोक 32 - अध्याय 2 

बुधवार, 25 मार्च 2020

श्रीमद्भागवत गीता

( क्षत्रिय धर्म के अनुसार युद्ध करने की आवश्यकता का निरूपण )स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि।
 धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते॥

तथा अपने धर्म को देखकर भी तू भय करने योग्य नहीं है अर्थात्‌ तुझे भय नहीं करना चाहिए क्योंकि क्षत्रिय के लिए धर्मयुक्त युद्ध से बढ़कर दूसरा कोई कल्याणकारी कर्तव्य नहीं है
 ॥31॥

~ श्लोक 31 - अध्याय 2 

श्रीमद्भागवत गीता

देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत।
 तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि॥

हे अर्जुन! यह आत्मा सबके शरीर में सदा ही अवध्य (जिसका वध नहीं किया जा सके) है। इस कारण सम्पूर्ण प्राणियों के लिए तू शोक करने योग्य नहीं है
 ॥30॥

~ श्लोक 30 - अध्याय 2 

सोमवार, 23 मार्च 2020

श्रीमद्भागवत गीता

आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेन-
 माश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः।
 आश्चर्यवच्चैनमन्यः श्रृणोति
 श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित्‌॥

कोई एक महापुरुष ही इस आत्मा को आश्चर्य की भाँति देखता है और वैसे ही दूसरा कोई महापुरुष ही इसके तत्व का आश्चर्य की भाँति वर्णन करता है तथा दूसरा कोई अधिकारी पुरुष ही इसे आश्चर्य की भाँति सुनता है और कोई-कोई तो सुनकर भी इसको नहीं जानता
 ॥29॥

~ श्लोक 29 - अध्याय 2

बुधवार, 18 मार्च 2020

श्रीमद्भागवत गीता

अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत।
 अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना॥

हे अर्जुन! सम्पूर्ण प्राणी जन्म से पहले अप्रकट थे और मरने के बाद भी अप्रकट हो जाने वाले हैं, केवल बीच में ही प्रकट हैं, फिर ऐसी स्थिति में क्या शोक करना है?
 ॥28॥

~ श्लोक 28 - अध्याय 2 

रविवार, 15 मार्च 2020

श्रीमद्भगवद्गीता

जातस्त हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च।
 तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि॥

क्योंकि इस मान्यता के अनुसार जन्मे हुए की मृत्यु निश्चित है और मरे हुए का जन्म निश्चित है। इससे भी इस बिना उपाय वाले विषय में तू शोक करने योग्य नहीं है
 ॥27॥

~ श्लोक 27 - अध्याय 2 

शनिवार, 14 मार्च 2020

श्रीमद्भागवत गीता

अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम्‌।
 तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि॥

किन्तु यदि तू इस आत्मा को सदा जन्मने वाला तथा सदा मरने वाला मानता हो, तो भी हे महाबाहो! तू इस प्रकार शोक करने योग्य नहीं है
 ॥26॥

~ श्लोक 26 - अध्याय 2

शुक्रवार, 13 मार्च 2020

श्रीमद्भागवत गीता

अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते।
 तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि॥॥

यह आत्मा अव्यक्त है, यह आत्मा अचिन्त्य है और यह आत्मा विकाररहित कहा जाता है। इससे हे अर्जुन! इस आत्मा को उपर्युक्त प्रकार से जानकर तू शोक करने के योग्य नहीं है अर्थात्‌ तुझे शोक करना उचित नहीं है
 ॥25॥

~ श्लोक 25 - अध्याय 2

गुरुवार, 12 मार्च 2020

श्रीमद्भागवत गीता

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।
 न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः॥

इस आत्मा को शस्त्र नहीं काट सकते, इसको आग नहीं जला सकती, इसको जल नहीं गला सकता और वायु नहीं सुखा सकता
 ॥23॥

~ श्लोक 23 - अध्याय 2

बुधवार, 11 मार्च 2020

श्रीमद्भागवत गीता

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय
 नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।
 तथा शरीराणि विहाय जीर्णा-
 न्यन्यानि संयाति नवानि देही॥

जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर दूसरे नए वस्त्रों को ग्रहण करता है, वैसे ही जीवात्मा पुराने शरीरों को त्यागकर दूसरे नए शरीरों को प्राप्त होता है
 ॥22॥

~ श्लोक 22 - अध्याय 2 

सोमवार, 9 मार्च 2020

श्रीमद्भागवत गीता

वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम्‌।
 कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम्‌॥

हे पृथापुत्र अर्जुन! जो पुरुष इस आत्मा को नाशरहित, नित्य, अजन्मा और अव्यय जानता है, वह पुरुष कैसे किसको मरवाता है और कैसे किसको मारता है?
 ॥21॥

~ श्लोक 21 - अध्याय 2 

रविवार, 8 मार्च 2020

श्रीमद्भागवत गीता

न जायते म्रियते वा कदाचि-
 न्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।
 अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो-
 न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥

यह आत्मा किसी काल में भी न तो जन्मता है और न मरता ही है तथा न यह उत्पन्न होकर फिर होने वाला ही है क्योंकि यह अजन्मा, नित्य, सनातन और पुरातन है, शरीर के मारे जाने पर भी यह नहीं मारा जाता
 ॥20॥

~ श्लोक 20 - अध्याय 2 

शनिवार, 7 मार्च 2020

Shrimadbhagavat Gita

य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम्‌।
 उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते॥

जो इस आत्मा को मारने वाला समझता है तथा जो इसको मरा मानता है, वे दोनों ही नहीं जानते क्योंकि यह आत्मा वास्तव में न तो किसी को मारता है और न किसी द्वारा मारा जाता है
 ॥19॥

~ श्लोक 19 - अध्याय 2 

शुक्रवार, 6 मार्च 2020

श्रीमद्भागवत गीता

अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः।
 अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत॥

इस नाशरहित, अप्रमेय, नित्यस्वरूप जीवात्मा के ये सब शरीर नाशवान कहे गए हैं, इसलिए हे भरतवंशी अर्जुन! तू युद्ध कर
 ॥18॥

~ श्लोक 18 - अध्याय 2

गुरुवार, 5 मार्च 2020

श्रीमद्भागवत गीता

अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम्‌।
 विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति॥

नाशरहित तो तू उसको जान, जिससे यह सम्पूर्ण जगत्‌- दृश्यवर्ग व्याप्त है। इस अविनाशी का विनाश करने में कोई भी समर्थ नहीं है
 ॥17॥

~ श्लोक 17 - अध्याय 2 

बुधवार, 4 मार्च 2020

श्रीमद्भागवत गीता

नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः।
 उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्वदर्शिभिः॥

असत्‌ वस्तु की तो सत्ता नहीं है और सत्‌ का अभाव नहीं है। इस प्रकार इन दोनों का ही तत्व तत्वज्ञानी पुरुषों द्वारा देखा गया है
 ॥16॥

~ श्लोक 16 - अध्याय 2 

मंगलवार, 3 मार्च 2020

श्रीमद्भागवत गीता

यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ।
 समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते॥

क्योंकि हे पुरुषश्रेष्ठ! दुःख-सुख को समान समझने वाले जिस धीर पुरुष को ये इन्द्रिय और विषयों के संयोग व्याकुल नहीं करते, वह मोक्ष के योग्य होता है
 ॥15॥

~ श्लोक 15 - अध्याय 2

सोमवार, 2 मार्च 2020

श्रीमद्भागवत गीता

मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः।
 आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत॥

हे कुंतीपुत्र! सर्दी-गर्मी और सुख-दुःख को देने वाले इन्द्रिय और विषयों के संयोग तो उत्पत्ति-विनाशशील और अनित्य हैं, इसलिए हे भारत! उनको तू सहन कर
 ॥14॥

~ श्लोक 14 - अध्याय 2 

शनिवार, 29 फ़रवरी 2020

श्रीमद्भागवत गीता

देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा।
 तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति॥

जैसे जीवात्मा की इस देह में बालकपन, जवानी और वृद्धावस्था होती है, वैसे ही अन्य शरीर की प्राप्ति होती है, उस विषय में धीर पुरुष मोहित नहीं होता।13॥

~ श्लोक 13 - अध्याय 2 

गुरुवार, 27 फ़रवरी 2020

श्रीमद्भागवत गीता

न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः।
 न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम्‌॥

न तो ऐसा ही है कि मैं किसी काल में नहीं था, तू नहीं था अथवा ये राजा लोग नहीं थे और न ऐसा ही है कि इससे आगे हम सब नहीं रहेंगे
 ॥12॥

~ श्लोक 12 - अध्याय 2

बुधवार, 26 फ़रवरी 2020

श्रीमद्भागवत गीता

( सांख्ययोग का विषय )
 श्री भगवानुवाच
 अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे।
 गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः॥

श्री भगवान बोले, हे अर्जुन! तू न शोक करने योग्य मनुष्यों के लिए शोक करता है और पण्डितों के से वचनों को कहता है, परन्तु जिनके प्राण चले गए हैं, उनके लिए और जिनके प्राण नहीं गए हैं उनके लिए भी पण्डितजन शोक नहीं करते
 ॥11॥

~ श्लोक 11 - अध्याय 2 

मंगलवार, 25 फ़रवरी 2020

श्रीमद्भगवद्गीता

तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत।
 सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदंतमिदं वचः॥

हे भरतवंशी धृतराष्ट्र! अंतर्यामी श्रीकृष्ण महाराज दोनों सेनाओं के बीच में शोक करते हुए उस अर्जुन को हँसते हुए से यह वचन बोले
 
 ॥10॥

~ श्लोक 10 - अध्याय 2

सोमवार, 24 फ़रवरी 2020

श्रीमद्भागवत गीता

संजय उवाच
 एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तप।
 न योत्स्य इतिगोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह॥

संजय बोले- हे राजन्‌! निद्रा को जीतने वाले अर्जुन अंतर्यामी श्रीकृष्ण महाराज के प्रति इस प्रकार कहकर फिर श्री गोविंद भगवान्‌ से 'युद्ध नहीं करूँगा' यह स्पष्ट कहकर चुप हो गए
 ॥9॥

~ श्लोक 9 - अध्याय 2 

रविवार, 23 फ़रवरी 2020

श्रीमद्भागवत गीता

न हि प्रपश्यामि ममापनुद्या-
 द्यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम्‌।
 अवाप्य भूमावसपत्रमृद्धं-
 राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम्‌॥

क्योंकि भूमि में निष्कण्टक, धन-धान्य सम्पन्न राज्य को और देवताओं के स्वामीपने को प्राप्त होकर भी मैं उस उपाय को नहीं देखता हूँ, जो मेरी इन्द्रियों के सुखाने वाले शोक को दूर कर सके
 ॥8॥

~ श्लोक 8 - अध्याय 2 

शनिवार, 22 फ़रवरी 2020

श्रीमद्भागवत गीता

कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः
 पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः।
 यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे
 शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्‌॥

इसलिए कायरता रूप दोष से उपहत हुए स्वभाव वाला तथा धर्म के विषय में मोहित चित्त हुआ मैं आपसे पूछता हूँ कि जो साधन निश्चित कल्याणकारक हो, वह मेरे लिए कहिए क्योंकि मैं आपका शिष्य हूँ, इसलिए आपके शरण हुए मुझको शिक्षा दीजिए
 ॥7॥

~ श्लोक 7 - अध्याय 2

शुक्रवार, 21 फ़रवरी 2020

श्रीमद्भागवत गीता

न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो-
 यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः।
 यानेव हत्वा न जिजीविषाम-
 स्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः॥

हम यह भी नहीं जानते कि हमारे लिए युद्ध करना और न करना- इन दोनों में से कौन-सा श्रेष्ठ है, अथवा यह भी नहीं जानते कि उन्हें हम जीतेंगे या हमको वे जीतेंगे। और जिनको मारकर हम जीना भी नहीं चाहते, वे ही हमारे आत्मीय धृतराष्ट्र के पुत्र हमारे मुकाबले में खड़े हैं
 ॥6॥

~ श्लोक 6 - अध्याय 2

गुरुवार, 20 फ़रवरी 2020

श्रीमद्भागवत गीता

न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो-
 यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः।
 यानेव हत्वा न जिजीविषाम-
 स्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः॥

हम यह भी नहीं जानते कि हमारे लिए युद्ध करना और न करना- इन दोनों में से कौन-सा श्रेष्ठ है, अथवा यह भी नहीं जानते कि उन्हें हम जीतेंगे या हमको वे जीतेंगे। और जिनको मारकर हम जीना भी नहीं चाहते, वे ही हमारे आत्मीय धृतराष्ट्र के पुत्र हमारे मुकाबले में खड़े हैं
 ॥6॥

~ श्लोक 6 - अध्याय 2 

बुधवार, 19 फ़रवरी 2020

श्रीमद्भागवत गीता

गुरूनहत्वा हि महानुभावा-
 ञ्छ्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके।
 हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव
 भुंजीय भोगान्‌ रुधिरप्रदिग्धान्‌॥

इसलिए इन महानुभाव गुरुजनों को न मारकर मैं इस लोक में भिक्षा का अन्न भी खाना कल्याणकारक समझता हूँ क्योंकि गुरुजनों को मारकर भी इस लोक में रुधिर से सने हुए अर्थ और कामरूप भोगों को ही तो भोगूँगा
 ॥5॥

~ श्लोक 5 - अध्याय 2

मंगलवार, 18 फ़रवरी 2020

श्रीमद्भागवत गीता

अर्जुन उवाच
 कथं भीष्ममहं सङ्‍ख्ये द्रोणं च मधुसूदन।
 इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन॥

अर्जुन बोले- हे मधुसूदन! मैं रणभूमि में किस प्रकार बाणों से भीष्म पितामह और द्रोणाचार्य के विरुद्ध लड़ूँगा? क्योंकि हे अरिसूदन! वे दोनों ही पूजनीय हैं
 ॥4॥

~ श्लोक 4 - अध्याय 2 

सोमवार, 17 फ़रवरी 2020

श्रीमद्भागवत गीता

क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते।
 क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप॥

इसलिए हे अर्जुन! नपुंसकता को मत प्राप्त हो, तुझमें यह उचित नहीं जान पड़ती। हे परंतप! हृदय की तुच्छ दुर्बलता को त्यागकर युद्ध के लिए खड़ा हो जा
 ॥3॥

~ श्लोक 3 - अध्याय 2 

रविवार, 16 फ़रवरी 2020

श्रीमद्भागवत गीता

श्रीभगवानुवाच
 कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम्‌।
 अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन।

श्रीभगवान बोले- हे अर्जुन! तुझे इस असमय में यह मोह किस हेतु से प्राप्त हुआ? क्योंकि न तो यह श्रेष्ठ पुरुषों द्वारा आचरित है, न स्वर्ग को देने वाला है और न कीर्ति को करने वाला ही है
 ॥2॥

~ श्लोक 2 - अध्याय 2 

शनिवार, 15 फ़रवरी 2020

श्रीमद्भागवत गीता।

( अर्जुन की कायरता के विषय में श्री कृष्णार्जुन-संवाद )
 संजय उवाच
 तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम्‌।
 विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः॥

संजय बोले- उस प्रकार करुणा से व्याप्त और आँसुओं से पूर्ण तथा व्याकुल नेत्रों वाले शोकयुक्त उस अर्जुन के प्रति भगवान मधुसूदन ने यह वचन कहा
 ॥1॥

~ श्लोक 1 - अध्याय 2

शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2020

श्रीमद्भागवत गीता।

संजय उवाच
 एवमुक्त्वार्जुनः सङ्‍ख्ये रथोपस्थ उपाविशत्‌।
 विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः॥

संजय बोले- रणभूमि में शोक से उद्विग्न मन वाले अर्जुन इस प्रकार कहकर, बाणसहित धनुष को त्यागकर रथ के पिछले भाग में बैठ गए
 ॥47॥
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादेऽर्जुनविषादयोगो नाम प्रथमोऽध्यायः। 
 ॥1॥

~ श्लोक 47 - अध्याय 1

गुरुवार, 13 फ़रवरी 2020

श्रीमद्भागवत गीता।

यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः।
 धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत्‌॥

यदि मुझ शस्त्ररहित एवं सामना न करने वाले को शस्त्र हाथ में लिए हुए धृतराष्ट्र के पुत्र रण में मार डालें तो वह मारना भी मेरे लिए अधिक कल्याणकारक होगा
 ॥46॥

~ श्लोक 46 - अध्याय 1

बुधवार, 12 फ़रवरी 2020

श्रीमद्भागवत गीता।

अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम्‌।
 यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः॥

हा! शोक! हम लोग बुद्धिमान होकर भी महान पाप करने को तैयार हो गए हैं, जो राज्य और सुख के लोभ से स्वजनों को मारने के लिए उद्यत हो गए हैं
 ॥45॥

~ श्लोक 45 - अध्याय 1

मंगलवार, 11 फ़रवरी 2020

श्रीमद्भागवत गीता।

उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन।
 नरकेऽनियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम॥

हे जनार्दन! जिनका कुल-धर्म नष्ट हो गया है, ऐसे मनुष्यों का अनिश्चितकाल तक नरक में वास होता है, ऐसा हम सुनते आए हैं
 ॥44॥

~ श्लोक 44 - अध्याय 1

सोमवार, 10 फ़रवरी 2020

श्रीमद्भागवत गीता

दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसंकरकारकैः।
 उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः॥

इन वर्णसंकरकारक दोषों से कुलघातियों के सनातन कुल-धर्म और जाति-धर्म नष्ट हो जाते हैं
 ॥43॥

~ श्लोक 43 - अध्याय 1

रविवार, 9 फ़रवरी 2020

श्रीमद्भागवत गीता।

संकरो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च।
 पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः॥

वर्णसंकर कुलघातियों को और कुल को नरक में ले जाने के लिए ही होता है। लुप्त हुई पिण्ड और जल की क्रिया वाले अर्थात श्राद्ध और तर्पण से वंचित इनके पितर लोग भी अधोगति को प्राप्त होते हैं
 ॥42॥

~ श्लोक 42 - अध्याय 1

शुक्रवार, 7 फ़रवरी 2020

श्रीमद्भागवत गीता

अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः।
 स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसंकरः॥

हे कृष्ण! पाप के अधिक बढ़ जाने से कुल की स्त्रियाँ अत्यन्त दूषित हो जाती हैं और हे वार्ष्णेय! स्त्रियों के दूषित हो जाने पर वर्णसंकर उत्पन्न होता है
 ॥41॥

~ श्लोक 41 - अध्याय 1

गुरुवार, 6 फ़रवरी 2020

श्रीमद्भागवत गीता

कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः।
 धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत॥

कुल के नाश से सनातन कुल-धर्म नष्ट हो जाते हैं तथा धर्म का नाश हो जाने पर सम्पूर्ण कुल में पाप भी बहुत फैल जाता है
 ॥40॥

~ श्लोक 40 - अध्याय 1

बुधवार, 5 फ़रवरी 2020

श्रीमद्भागवत गीता

यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः।
 कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम्‌॥
 कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम्‌।
 कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन॥

यद्यपि लोभ से भ्रष्टचित्त हुए ये लोग कुल के नाश से उत्पन्न दोष को और मित्रों से विरोध करने में पाप को नहीं देखते, तो भी हे जनार्दन! कुल के नाश से उत्पन्न दोष को जानने वाले हम लोगों को इस पाप से हटने के लिए क्यों नहीं विचार करना चाहिए?
 ॥38-39॥

~ श्लोक 38, 39 - अध्याय 1

मंगलवार, 4 फ़रवरी 2020

श्रीमद्भागवत गीता

तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान्‌।
 स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव॥

अतएव हे माधव! अपने ही बान्धव धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारने के लिए हम योग्य नहीं हैं क्योंकि अपने ही कुटुम्ब को मारकर हम कैसे सुखी होंगे?
 ॥37॥

~ श्लोक 37 - अध्याय 1

सोमवार, 3 फ़रवरी 2020

श्रीमद्भागवत गीता

निहत्य धार्तराष्ट्रान्न का प्रीतिः स्याज्जनार्दन।
 पापमेवाश्रयेदस्मान्‌ हत्वैतानाततायिनः॥

हे जनार्दन! धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारकर हमें क्या प्रसन्नता होगी? इन आततायियों को मारकर तो हमें पाप ही लगेगा
 ॥36॥

~ श्लोक 36 - अध्याय 1

रविवार, 2 फ़रवरी 2020

श्रीमद्भागवत गीता

एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन।
 अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते॥

हे मधुसूदन! मुझे मारने पर भी अथवा तीनों लोकों के राज्य के लिए भी मैं इन सबको मारना नहीं चाहता, फिर पृथ्वी के लिए तो कहना ही क्या है?
 ॥35॥

~ श्लोक 35 - अध्याय 1 

शनिवार, 1 फ़रवरी 2020

Shremad Bhagwat Gita

आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः।
 मातुलाः श्वशुराः पौत्राः श्यालाः संबंधिनस्तथा॥

गुरुजन, ताऊ-चाचे, लड़के और उसी प्रकार दादे, मामे, ससुर, पौत्र, साले तथा और भी संबंधी लोग हैं 
 ॥34॥

~ श्लोक 34 - अध्याय 1 

शुक्रवार, 31 जनवरी 2020

Shreemad Bhagwat Gita

येषामर्थे काङक्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च।
 त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च॥

हमें जिनके लिए राज्य, भोग और सुखादि अभीष्ट हैं, वे ही ये सब धन और जीवन की आशा को त्यागकर युद्ध में खड़े हैं
 ॥33॥

~ श्लोक 33 - अध्याय 1