शनिवार, 31 अक्टूबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

( सगुण भगवान का प्रभाव और कर्मयोग का विषय ) श्री भगवानुवाच इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्‌।
 विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्‌॥

श्री भगवान बोले- मैंने इस अविनाशी योग को सूर्य से कहा था, सूर्य ने अपने पुत्र वैवस्वत मनु से कहा और मनु ने अपने पुत्र राजा इक्ष्वाकु से कहा
 ॥1॥

~ श्लोक 1 - अध्याय 4 - दिव्य ज्ञान

शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

एवं बुद्धेः परं बुद्धवा संस्तभ्यात्मानमात्मना।
 जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम्‌॥

इस प्रकार बुद्धि से पर अर्थात सूक्ष्म, बलवान और अत्यन्त श्रेष्ठ आत्मा को जानकर और बुद्धि द्वारा मन को वश में करके हे महाबाहो! तू इस कामरूप दुर्जय शत्रु को मार डाल
 ॥43॥ 
 ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे कर्मयोगो नाम तृतीयोऽध्यायः
 ॥3॥

~ श्लोक 43 - अध्याय 3 - कर्मयोग

गुरुवार, 29 अक्टूबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः।
 मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः॥

इन्द्रियों को स्थूल शरीर से पर यानी श्रेष्ठ, बलवान और सूक्ष्म कहते हैं। इन इन्द्रियों से पर मन है, मन से भी पर बुद्धि है और जो बुद्धि से भी अत्यन्त पर है वह आत्मा है
 ॥42॥

~ श्लोक 42 - अध्याय 3 - कर्मयोग

बुधवार, 28 अक्टूबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ।
 पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम्‌॥

इसलिए हे अर्जुन! तू पहले इन्द्रियों को वश में करके इस ज्ञान और विज्ञान का नाश करने वाले महान पापी काम को अवश्य ही बलपूर्वक मार डाल
 ॥41॥

~ श्लोक 41 - अध्याय 3 - कर्मयोग

मंगलवार, 27 अक्टूबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते।
 एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम्‌॥

इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि- ये सब इसके वासस्थान कहे जाते हैं। यह काम इन मन, बुद्धि और इन्द्रियों द्वारा ही ज्ञान को आच्छादित करके जीवात्मा को मोहित करता है।
 ॥40॥

~ श्लोक 40 - अध्याय 3 - कर्मयोग

सोमवार, 26 अक्टूबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा।
 कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च॥

और हे अर्जुन! इस अग्नि के समान कभी न पूर्ण होने वाले काम रूप ज्ञानियों के नित्य वैरी द्वारा मनुष्य का ज्ञान ढँका हुआ है
 ॥39॥

~ श्लोक 39 - अध्याय 3 - कर्मयोग

रविवार, 25 अक्टूबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

धूमेनाव्रियते वह्निर्यथादर्शो मलेन च।
 यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम्‌॥

जिस प्रकार धुएँ से अग्नि और मैल से दर्पण ढँका जाता है तथा जिस प्रकार जेर से गर्भ ढँका रहता है, वैसे ही उस काम द्वारा यह ज्ञान ढँका रहता है
 ॥38॥

~ श्लोक 38 - अध्याय 3 - कर्मयोग

शनिवार, 24 अक्टूबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

श्रीभगवानुवाच काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः।
 महाशनो महापाप्मा विद्धयेनमिह वैरिणम्‌॥

श्री भगवान बोले- रजोगुण से उत्पन्न हुआ यह काम ही क्रोध है। यह बहुत खाने वाला अर्थात भोगों से कभी न अघानेवाला और बड़ा पापी है। इसको ही तू इस विषय में वैरी जान
 ॥37॥

~ श्लोक 37 - अध्याय 3 - कर्मयोग

शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

( काम के निरोध का विषय ) अर्जुन उवाचः अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पुरुषः।

 अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः॥


अर्जुन बोले- हे कृष्ण! तो फिर यह मनुष्य स्वयं न चाहता हुआ भी बलात्‌ लगाए हुए की भाँति किससे प्रेरित होकर पाप का आचरण करता है

 ॥36॥॥

~ श्लोक 36 - अध्याय 3 - कर्मयोग

बुधवार, 21 अक्टूबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ।
 तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ॥

इन्द्रिय-इन्द्रिय के अर्थ में अर्थात प्रत्येक इन्द्रिय के विषय में राग और द्वेष छिपे हुए स्थित हैं। मनुष्य को उन दोनों के वश में नहीं होना चाहिए क्योंकि वे दोनों ही इसके कल्याण मार्ग में विघ्न करने वाले महान्‌ शत्रु हैं
 ॥34॥

~ श्लोक 34 - अध्याय 3 - कर्मयोग

मंगलवार, 20 अक्टूबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि।
 प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति॥

सभी प्राणी प्रकृति को प्राप्त होते हैं अर्थात अपने स्वभाव के परवश हुए कर्म करते हैं। ज्ञानवान्‌ भी अपनी प्रकृति के अनुसार चेष्टा करता है। फिर इसमें किसी का हठ क्या करेगा
 ॥33॥

~ श्लोक 33 - अध्याय 3 - कर्मयोग

सोमवार, 19 अक्टूबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम्‌।
 सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः॥

परन्तु जो मनुष्य मुझमें दोषारोपण करते हुए मेरे इस मत के अनुसार नहीं चलते हैं, उन मूर्खों को तू सम्पूर्ण ज्ञानों में मोहित और नष्ट हुए ही समझ
 ॥32॥

~ श्लोक 32 - अध्याय 3 - कर्मयोग

रविवार, 18 अक्टूबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः।
 श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽति कर्मभिः॥

जो कोई मनुष्य दोषदृष्टि से रहित और श्रद्धायुक्त होकर मेरे इस मत का सदा अनुसरण करते हैं, वे भी सम्पूर्ण कर्मों से छूट जाते हैं
 ॥31॥

~ श्लोक 31 - अध्याय 3 - कर्मयोग

शनिवार, 17 अक्टूबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

मयि सर्वाणि कर्माणि सन्नयस्याध्यात्मचेतसा।
 निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः॥

मुझ अन्तर्यामी परमात्मा में लगे हुए चित्त द्वारा सम्पूर्ण कर्मों को मुझमें अर्पण करके आशारहित, ममतारहित और सन्तापरहित होकर युद्ध कर
 ॥30॥

~ श्लोक 30 - अध्याय 3 - कर्मयोग

शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

प्रकृतेर्गुणसम्मूढ़ाः सज्जन्ते गुणकर्मसु।
 तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्न विचालयेत्‌॥

प्रकृति के गुणों से अत्यन्त मोहित हुए मनुष्य गुणों में और कर्मों में आसक्त रहते हैं, उन पूर्णतया न समझने वाले मन्दबुद्धि अज्ञानियों को पूर्णतया जानने वाला ज्ञानी विचलित न करे
 ॥29॥

~ श्लोक 29 - अध्याय 3 - कर्मयोग

गुरुवार, 15 अक्टूबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः।
 गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते॥

परन्तु हे महाबाहो! गुण विभाग और कर्म विभाग (त्रिगुणात्मक माया के कार्यरूप पाँच महाभूत और मन, बुद्धि, अहंकार तथा पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ और शब्दादि पाँच विषय- इन सबके समुदाय का नाम 'गुण विभाग' है और इनकी परस्पर की चेष्टाओं का नाम 'कर्म विभाग' है।) के तत्व (उपर्युक्त 'गुण विभाग' और 'कर्म विभाग' से आत्मा को पृथक अर्थात्‌ निर्लेप जानना ही इनका तत्व जानना है।) को जानने वाला ज्ञान योगी सम्पूर्ण गुण ही गुणों में बरत रहे हैं, ऐसा समझकर उनमें आसक्त नहीं होता।
 ॥28॥

~ श्लोक 28 - अध्याय 3 - कर्मयोग

बुधवार, 14 अक्टूबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः।
 अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते॥

- वास्तव में सम्पूर्ण कर्म सब प्रकार से प्रकृति के गुणों द्वारा किए जाते हैं, तो भी जिसका अन्तःकरण अहंकार से मोहित हो रहा है, ऐसा अज्ञानी 'मैं कर्ता हूँ' ऐसा मानता है
 ॥27॥

~ श्लोक 27 - अध्याय 3 - कर्मयोग

मंगलवार, 13 अक्टूबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङि्गनाम्‌।
 जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्तः समाचरन्‌॥

परमात्मा के स्वरूप में अटल स्थित हुए ज्ञानी पुरुष को चाहिए कि वह शास्त्रविहित कर्मों में आसक्ति वाले अज्ञानियों की बुद्धि में भ्रम अर्थात कर्मों में अश्रद्धा उत्पन्न न करे, किन्तु स्वयं शास्त्रविहित समस्त कर्म भलीभाँति करता हुआ उनसे भी वैसे ही करवाए
 ॥26॥

~ श्लोक 26 - अध्याय 3 - कर्मयोग

रविवार, 11 अक्टूबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

( अज्ञानी और ज्ञानवान के लक्षण तथा राग-द्वेष से रहित होकर कर्म करने के लिए प्रेरणा ) सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत।
 कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसंग्रहम्‌॥

हे भारत! कर्म में आसक्त हुए अज्ञानीजन जिस प्रकार कर्म करते हैं, आसक्तिरहित विद्वान भी लोकसंग्रह करना चाहता हुआ उसी प्रकार कर्म करे
 ॥25॥

~ श्लोक 25 - अध्याय 3 - कर्मयोग

शनिवार, 10 अक्टूबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

यदि उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम्‌।
 संकरस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः॥

इसलिए यदि मैं कर्म न करूँ तो ये सब मनुष्य नष्ट-भ्रष्ट हो जाएँ और मैं संकरता का करने वाला होऊँ तथा इस समस्त प्रजा को नष्ट करने वाला बनूँ
 ॥24॥

~ श्लोक 24 - अध्याय 3 - कर्मयोग

शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः।
 मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥

क्योंकि हे पार्थ! यदि कदाचित्‌ मैं सावधान होकर कर्मों में न बरतूँ तो बड़ी हानि हो जाए क्योंकि मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं
 ॥23॥

~ श्लोक 23 - अध्याय 3 - कर्मयोग

गुरुवार, 8 अक्टूबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किंचन।
 नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि॥

हे अर्जुन! मुझे इन तीनों लोकों में न तो कुछ कर्तव्य है और न कोई भी प्राप्त करने योग्य वस्तु अप्राप्त है, तो भी मैं कर्म में ही बरतता हूँ
 ॥22॥

~ श्लोक 22 - अध्याय 3 - कर्मयोग

मंगलवार, 6 अक्टूबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।
 स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥

श्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण करता है, अन्य पुरुष भी वैसा-वैसा ही आचरण करते हैं। वह जो कुछ प्रमाण कर देता है, समस्त मनुष्य-समुदाय उसी के अनुसार बरतने लग जाता है (यहाँ क्रिया में एकवचन है, परन्तु 'लोक' शब्द समुदायवाचक होने से भाषा में बहुवचन की क्रिया लिखी गई है।)
 ॥21॥

~ श्लोक 21 - अध्याय 3 - कर्मयोग

सोमवार, 5 अक्टूबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः।
 लोकसंग्रहमेवापि सम्पश्यन्कर्तुमर्हसि॥

जनकादि ज्ञानीजन भी आसक्ति रहित कर्मद्वारा ही परम सिद्धि को प्राप्त हुए थे, इसलिए तथा लोकसंग्रह को देखते हुए भी तू कर्म करने के ही योग्य है अर्थात तुझे कर्म करना ही उचित है
 ॥20॥

~ श्लोक 20 - अध्याय 3 - कर्मयोग

रविवार, 4 अक्टूबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर।
 असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पुरुषः॥

इसलिए तू निरन्तर आसक्ति से रहित होकर सदा कर्तव्यकर्म को भलीभाँति करता रह क्योंकि आसक्ति से रहित होकर कर्म करता हुआ मनुष्य परमात्मा को प्राप्त हो जाता है
 ॥19॥

~ श्लोक 19 - अध्याय 3 - कर्मयोग

शनिवार, 3 अक्टूबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

संजय उवाच: नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन।
 न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः॥

उस महापुरुष का इस विश्व में न तो कर्म करने से कोई प्रयोजन रहता है और न कर्मों के न करने से ही कोई प्रयोजन रहता है तथा सम्पूर्ण प्राणियों में भी इसका किञ्चिन्मात्र भी स्वार्थ का संबंध नहीं रहता
 ॥18॥

~ श्लोक 18 - अध्याय 3 - कर्मयोग

शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

( ज्ञानवान और भगवान के लिए भी लोकसंग्रहार्थ कर्मों की आवश्यकता ) यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः।
 आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते॥

परन्तु जो मनुष्य आत्मा में ही रमण करने वाला और आत्मा में ही तृप्त तथा आत्मा में ही सन्तुष्ट हो, उसके लिए कोई कर्तव्य नहीं है
 ॥17॥

~ श्लोक 17 - अध्याय 3 - कर्मयोग

गुरुवार, 1 अक्टूबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः।
 अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति॥

हे पार्थ! जो पुरुष इस लोक में इस प्रकार परम्परा से प्रचलित सृष्टिचक्र के अनुकूल नहीं बरतता अर्थात अपने कर्तव्य का पालन नहीं करता, वह इन्द्रियों द्वारा भोगों में रमण करने वाला पापायु पुरुष व्यर्थ ही जीता है
 ॥16॥

~ श्लोक 16 - अध्याय 3 - कर्मयोग