गुरुवार, 8 अक्टूबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किंचन।
 नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि॥

हे अर्जुन! मुझे इन तीनों लोकों में न तो कुछ कर्तव्य है और न कोई भी प्राप्त करने योग्य वस्तु अप्राप्त है, तो भी मैं कर्म में ही बरतता हूँ
 ॥22॥

~ श्लोक 22 - अध्याय 3 - कर्मयोग

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