सोमवार, 31 अगस्त 2020

श्रीमद्भागवत गीता

तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः।
 इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥

इसलिए हे महाबाहो! जिस पुरुष की इन्द्रियाँ इन्द्रियों के विषयों में सब प्रकार निग्रह की हुई हैं, उसी की बुद्धि स्थिर है
 ॥68॥

~ श्लोक 68 - अध्याय 2 - गीता का सार

रविवार, 30 अगस्त 2020

श्रीमद्भागवत गीता

इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते।
 तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि॥

क्योंकि जैसे जल में चलने वाली नाव को वायु हर लेती है, वैसे ही विषयों में विचरती हुई इन्द्रियों में से मन जिस इन्द्रिय के साथ रहता है, वह एक ही इन्द्रिय इस अयुक्त पुरुष की बुद्धि को हर लेती है
 ॥67॥

~ श्लोक 67 - अध्याय 2 - गीता का सार

शुक्रवार, 28 अगस्त 2020

श्रीमद्भागवत गीता

नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना।
 न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम्‌॥

न जीते हुए मन और इन्द्रियों वाले पुरुष में निश्चयात्मिका बुद्धि नहीं होती और उस अयुक्त मनुष्य के अन्तःकरण में भावना भी नहीं होती तथा भावनाहीन मनुष्य को शान्ति नहीं मिलती और शान्तिरहित मनुष्य को सुख कैसे मिल सकता है?
 ॥66॥

~ श्लोक 66 - अध्याय 2 - गीता का सार

बुधवार, 26 अगस्त 2020

श्रीमद्भागवत गीता

( क्षत्रिय धर्म के अनुसार युद्ध करने की आवश्यकता का निरूपण )स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि।
 धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते॥

तथा अपने धर्म को देखकर भी तू भय करने योग्य नहीं है अर्थात्‌ तुझे भय नहीं करना चाहिए क्योंकि क्षत्रिय के लिए धर्मयुक्त युद्ध से बढ़कर दूसरा कोई कल्याणकारी कर्तव्य नहीं है
 ॥31॥

~ श्लोक 31 - अध्याय 2 - गीता का सार

श्रीमद्भगवद्गीता

श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला।
 समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि॥

भाँति-भाँति के वचनों को सुनने से विचलित हुई तेरी बुद्धि जब परमात्मा में अचल और स्थिर ठहर जाएगी, तब तू योग को प्राप्त हो जाएगा अर्थात तेरा परमात्मा से नित्य संयोग हो जाएगा
 ॥53॥

~ श्लोक 53 - अध्याय 2 - गीता का सार

श्रीमद्भागवत गीता

रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन्‌।
 आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति॥

परंन्तु अपने अधीन किए हुए अन्तःकरण वाला साधक अपने वश में की हुई, राग-द्वेष रहित इन्द्रियों द्वारा विषयों में विचरण करता हुआ अन्तःकरण की प्रसन्नता को प्राप्त होता है
 ॥64॥

~ श्लोक 64 - अध्याय 2 - गीता का सार

मंगलवार, 25 अगस्त 2020

श्रीमद्भागवत गीता

क्रोधाद्‍भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः।
 स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥

क्रोध से अत्यन्त मूढ़ भाव उत्पन्न हो जाता है, मूढ़ भाव से स्मृति में भ्रम हो जाता है, स्मृति में भ्रम हो जाने से बुद्धि अर्थात ज्ञानशक्ति का नाश हो जाता है और बुद्धि का नाश हो जाने से यह पुरुष अपनी स्थिति से गिर जाता है
 ॥63॥

~ श्लोक 63 - अध्याय 2 - गीता का सार

सोमवार, 24 अगस्त 2020

श्रीमद्भागवत गीता

ध्यायतो विषयान्पुंसः संगस्तेषूपजायते।
 संगात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥

विषयों का चिन्तन करने वाले पुरुष की उन विषयों में आसक्ति हो जाती है, आसक्ति से उन विषयों की कामना उत्पन्न होती है और कामना में विघ्न पड़ने से क्रोध उत्पन्न होता है
 ॥62॥

~ श्लोक 62 - अध्याय 2 - गीता का सार

रविवार, 23 अगस्त 2020

श्रीमद्भागवत गीता

तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः।
 वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥

इसलिए साधक को चाहिए कि वह उन सम्पूर्ण इन्द्रियों को वश में करके समाहित चित्त हुआ मेरे परायण होकर ध्यान में बैठे क्योंकि जिस पुरुष की इन्द्रियाँ वश में होती हैं, उसी की बुद्धि स्थिर हो जाती है
 ॥61॥

~ श्लोक 61 - अध्याय 2 - गीता का सार

शनिवार, 22 अगस्त 2020

श्रीमद्भगवद्गीता

यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः।
 इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः॥

हे अर्जुन! आसक्ति का नाश न होने के कारण ये प्रमथन स्वभाव वाली इन्द्रियाँ यत्न करते हुए बुद्धिमान पुरुष के मन को भी बलात्‌ हर लेती हैं
 ॥60॥

~ श्लोक 60 - अध्याय 2 - गीता का सार

शुक्रवार, 21 अगस्त 2020

श्रीमद्भागवत गीता

विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः।
 रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्टवा निवर्तते॥

इन्द्रियों द्वारा विषयों को ग्रहण न करने वाले पुरुष के भी केवल विषय तो निवृत्त हो जाते हैं, परन्तु उनमें रहने वाली आसक्ति निवृत्त नहीं होती। इस स्थितप्रज्ञ पुरुष की तो आसक्ति भी परमात्मा का साक्षात्कार करके निवृत्त हो जाती है
 ॥59॥

~ श्लोक 59 - अध्याय 2 - गीता का सार

गुरुवार, 20 अगस्त 2020

श्रीमद्भागवत गीता

यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गनीव सर्वशः।
 इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥

और कछुवा सब ओर से अपने अंगों को जैसे समेट लेता है, वैसे ही जब यह पुरुष इन्द्रियों के विषयों से इन्द्रियों को सब प्रकार से हटा लेता है, तब उसकी बुद्धि स्थिर है (ऐसा समझना चाहिए)
 ॥58॥

~ श्लोक 58 - अध्याय 2 - गीता का सार

बुधवार, 19 अगस्त 2020

श्रीमद्भागवत गीता

यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम्‌।
 नाभिनंदति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥

जो पुरुष सर्वत्र स्नेहरहित हुआ उस-उस शुभ या अशुभ वस्तु को प्राप्त होकर न प्रसन्न होता है और न द्वेष करता है, उसकी बुद्धि स्थिर है
 ॥57॥

~ श्लोक 57 - अध्याय 2 - गीता का सार

मंगलवार, 18 अगस्त 2020

श्रीमद्भागवत गीता

दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः।
 वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते॥

दुःखों की प्राप्ति होने पर जिसके मन में उद्वेग नहीं होता, सुखों की प्राप्ति में सर्वथा निःस्पृह है तथा जिसके राग, भय और क्रोध नष्ट हो गए हैं, ऐसा मुनि स्थिरबुद्धि कहा जाता है
 ॥56॥

~ श्लोक 56 - अध्याय 2 - गीता का सार

सोमवार, 17 अगस्त 2020

श्रीमद्भागवत गीता

श्रीभगवानुवाच
 प्रजहाति यदा कामान्‌ सर्वान्पार्थ मनोगतान्‌।
 आत्मयेवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते॥

श्री भगवान्‌ बोले- हे अर्जुन! जिस काल में यह पुरुष मन में स्थित सम्पूर्ण कामनाओं को भलीभाँति त्याग देता है और आत्मा से आत्मा में ही संतुष्ट रहता है, उस काल में वह स्थितप्रज्ञ कहा जाता है
 ॥55॥

~ श्लोक 55 - अध्याय 2 - गीता का सार

रविवार, 16 अगस्त 2020

श्रीमद्भागवत गीता

( स्थिरबुद्धि पुरुष के लक्षण और उसकी महिमा )
 अर्जुन उवाच
 स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव।
 स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम्‌॥

अर्जुन बोले- हे केशव! समाधि में स्थित परमात्मा को प्राप्त हुए स्थिरबुद्धि पुरुष का क्या लक्षण है? वह स्थिरबुद्धि पुरुष कैसे बोलता है, कैसे बैठता है और कैसे चलता है?
 ॥54॥

~ श्लोक 54 - अध्याय 2 - गीता का सार

शनिवार, 15 अगस्त 2020

श्रीमद्भगवद्गीता

श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला।
 समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि॥

भाँति-भाँति के वचनों को सुनने से विचलित हुई तेरी बुद्धि जब परमात्मा में अचल और स्थिर ठहर जाएगी, तब तू योग को प्राप्त हो जाएगा अर्थात तेरा परमात्मा से नित्य संयोग हो जाएगा
 ॥53॥

~ श्लोक 53 - अध्याय 2 - गीता का सार

शुक्रवार, 14 अगस्त 2020

श्रीमद्भागवत गीता

यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति।
 तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च॥

जिस काल में तेरी बुद्धि मोहरूपी दलदल को भलीभाँति पार कर जाएगी, उस समय तू सुने हुए और सुनने में आने वाले इस लोक और परलोक संबंधी सभी भोगों से वैराग्य को प्राप्त हो जाएगा
 ॥52॥

~ श्लोक 52 - अध्याय 2 - गीता का सार

गुरुवार, 13 अगस्त 2020

श्रीमद्भागवत गीता

कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः।
 जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम्‌॥

क्योंकि समबुद्धि से युक्त ज्ञानीजन कर्मों से उत्पन्न होने वाले फल को त्यागकर जन्मरूप बंधन से मुक्त हो निर्विकार परम पद को प्राप्त हो जाते हैं
 ॥51॥

~ श्लोक 51 - अध्याय 2 - गीता का सार

बुधवार, 12 अगस्त 2020

श्रीमद्भागवत गीता

बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते।
 तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्‌॥

समबुद्धियुक्त पुरुष पुण्य और पाप दोनों को इसी लोक में त्याग देता है अर्थात उनसे मुक्त हो जाता है। इससे तू समत्व रूप योग में लग जा, यह समत्व रूप योग ही कर्मों में कुशलता है अर्थात कर्मबंध से छूटने का उपाय है
 ॥50॥

~ श्लोक 50 - अध्याय 2 - गीता का सार

मंगलवार, 11 अगस्त 2020

श्रीमद्भागवत गीता

दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनंजय।
 बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः॥

इस समत्वरूप बुद्धियोग से सकाम कर्म अत्यन्त ही निम्न श्रेणी का है। इसलिए हे धनंजय! तू समबुद्धि में ही रक्षा का उपाय ढूँढ अर्थात्‌ बुद्धियोग का ही आश्रय ग्रहण कर क्योंकि फल के हेतु बनने वाले अत्यन्त दीन हैं
 ॥49॥

~ श्लोक 49 - अध्याय 2 - गीता का सार

गुरुवार, 6 अगस्त 2020

श्रीमद्भागवत गीता

योगस्थः कुरु कर्माणि संग त्यक्त्वा धनंजय।
 सिद्धयसिद्धयोः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥

हे धनंजय! तू आसक्ति को त्यागकर तथा सिद्धि और असिद्धि में समान बुद्धिवाला होकर योग में स्थित हुआ कर्तव्य कर्मों को कर, समत्व (जो कुछ भी कर्म किया जाए, उसके पूर्ण होने और न होने में तथा उसके फल में समभाव रहने का नाम 'समत्व' है।) ही योग कहलाता है
 ॥48॥

~ श्लोक 48 - अध्याय 2 - गीता का सार

बुधवार, 5 अगस्त 2020

श्रीमद्भागवत गीता

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
 मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि॥

तेरा कर्म करने में ही अधिकार है, उसके फलों में कभी नहीं। इसलिए तू कर्मों के फल हेतु मत हो तथा तेरी कर्म न करने में भी आसक्ति न हो
 ॥47॥

~ श्लोक 47 - अध्याय 2 - गीता का सार

शनिवार, 1 अगस्त 2020

श्रीमद्भागवत गीता

यावानर्थ उदपाने सर्वतः सम्प्लुतोदके।
 तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः॥

सब ओर से परिपूर्ण जलाशय के प्राप्त हो जाने पर छोटे जलाशय में मनुष्य का जितना प्रयोजन रहता है, ब्रह्म को तत्व से जानने वाले ब्राह्मण का समस्त वेदों में उतना ही प्रयोजन रह जाता है
 ॥46॥

~ श्लोक 46 - अध्याय 2 - गीता का सार