शुक्रवार, 19 मार्च 2021

श्रीमद्भागवत गीता

प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः।
 शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते॥

योगभ्रष्ट पुरुष पुण्यवानों के लोकों को अर्थात स्वर्गादि उत्तम लोकों को प्राप्त होकर उनमें बहुत वर्षों तक निवास करके फिर शुद्ध आचरण वाले श्रीमान पुरुषों के घर में जन्म लेता है
 ॥41॥

~ श्लोक 41 - अध्याय 6 - ध्यानयोग

गुरुवार, 18 मार्च 2021

श्रीमद्भागवत गीता

श्रीभगवानुवाच 
 पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते।
 न हि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति॥

श्री भगवान बोले- हे पार्थ! उस पुरुष का न तो इस लोक में नाश होता है और न परलोक में ही क्योंकि हे प्यारे! आत्मोद्धार के लिए अर्थात भगवत्प्राप्ति के लिए कर्म करने वाला कोई भी मनुष्य दुर्गति को प्राप्त नहीं होता
 ॥40॥

~ श्लोक 40 - अध्याय 6 - ध्यानयोग

बुधवार, 17 मार्च 2021

श्रीमद्भागवत गीता

एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः।
 त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते॥

हे श्रीकृष्ण! मेरे इस संशय को सम्पूर्ण रूप से छेदन करने के लिए आप ही योग्य हैं क्योंकि आपके सिवा दूसरा इस संशय का छेदन करने वाला मिलना संभव नहीं है
 ॥39॥

~ श्लोक 39 - अध्याय 6 - ध्यानयोग

मंगलवार, 16 मार्च 2021

श्रीमद्भागवत गीता

कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति।
 अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि॥

हे महाबाहो! क्या वह भगवत्प्राप्ति के मार्ग में मोहित और आश्रयरहित पुरुष छिन्न-भिन्न बादल की भाँति दोनों ओर से भ्रष्ट होकर नष्ट तो नहीं हो जाता?
 ॥38॥

~ श्लोक 38 - अध्याय 6 - ध्यानयोग

सोमवार, 15 मार्च 2021

श्रीमद्भागवत गीता

( योगभ्रष्ट पुरुष की गति का विषय और ध्यानयोगी की महिमा ) 
 अर्जुन उवाच
 अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः।
 अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति॥

अर्जुन बोले- हे श्रीकृष्ण! जो योग में श्रद्धा रखने वाला है, किन्तु संयमी नहीं है, इस कारण जिसका मन अन्तकाल में योग से विचलित हो गया है, ऐसा साधक योग की सिद्धि को अर्थात भगवत्साक्षात्कार को न प्राप्त होकर किस गति को प्राप्त होता है
 ॥37॥

~ श्लोक 37 - अध्याय 6 - ध्यानयोग

रविवार, 14 मार्च 2021

श्रीमद्भागवत गीता

असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः।
 वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः॥

जिसका मन वश में किया हुआ नहीं है, ऐसे पुरुष द्वारा योग दुष्प्राप्य है और वश में किए हुए मन वाले प्रयत्नशील पुरुष द्वारा साधन से उसका प्राप्त होना सहज है- यह मेरा मत है
 ॥36॥

~ श्लोक 36 - अध्याय 6 - ध्यानयोग

गुरुवार, 11 मार्च 2021

श्रीमद्भागवत गीता

श्रीभगवानुवाच 
 असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्‌।
 अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते॥

श्री भगवान बोले- हे महाबाहो! निःसंदेह मन चंचल और कठिनता से वश में होने वाला है। परन्तु हे कुंतीपुत्र अर्जुन! यह अभ्यास (गीता अध्याय 12 श्लोक 9 की टिप्पणी में इसका विस्तार देखना चाहिए।) और वैराग्य से वश में होता है
 ॥35॥

~ श्लोक 35 - अध्याय 6 - ध्यानयोग

मंगलवार, 9 मार्च 2021

श्रीमद्भागवत गीता

चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम्‌।
 तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्‌॥

क्योंकि हे श्रीकृष्ण! यह मन बड़ा चंचल, प्रमथन स्वभाव वाला, बड़ा दृढ़ और बलवान है। इसलिए उसको वश में करना मैं वायु को रोकने की भाँति अत्यन्त दुष्कर मानता हूँ
 ॥34॥

~ श्लोक 34 - अध्याय 6 - ध्यानयोग

सोमवार, 8 मार्च 2021

श्रीमद्भागवत गीता

( मन के निग्रह का विषय ) 
 अर्जुन उवाच
 योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन।
 एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात्स्थितिं स्थिराम्‌॥

अर्जुन बोले- हे मधुसूदन! जो यह योग आपने समभाव से कहा है, मन के चंचल होने से मैं इसकी नित्य स्थिति को नहीं देखता हूँ
 ॥33॥

~ श्लोक 33 - अध्याय 6 - ध्यानयोग

रविवार, 7 मार्च 2021

श्रीमद्भागवत गीता

आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन।
 सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः॥

हे अर्जुन! जो योगी अपनी भाँति (जैसे मनुष्य अपने मस्तक, हाथ, पैर और गुदादि के साथ ब्राह्मण, क्षत्रिय, शूद्र और म्लेच्छादिकों का-सा बर्ताव करता हुआ भी उनमें आत्मभाव अर्थात अपनापन समान होने से सुख और दुःख को समान ही देखता है, वैसे ही सब भूतों में देखना 'अपनी भाँति' सम देखना है।) सम्पूर्ण भूतों में सम देखता है और सुख अथवा दुःख को भी सबमें सम देखता है, वह योगी परम श्रेष्ठ माना गया है
 ॥32॥

~ श्लोक 32 - अध्याय 6 - ध्यानयोग

शुक्रवार, 5 मार्च 2021

श्रीमद्भागवत गीता

सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः।
 सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते॥

जो पुरुष एकीभाव में स्थित होकर सम्पूर्ण भूतों में आत्मरूप से स्थित मुझ सच्चिदानन्दघन वासुदेव को भजता है, वह योगी सब प्रकार से बरतता हुआ भी मुझमें ही बरतता है
 ॥31॥

~ श्लोक 31 - अध्याय 6 - ध्यानयोग

गुरुवार, 4 मार्च 2021

श्रीमद्भागवत गीता

सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।
 ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः॥

सर्वव्यापी अनंत चेतन में एकीभाव से स्थिति रूप योग से युक्त आत्मा वाला तथा सब में समभाव से देखने वाला योगी आत्मा को सम्पूर्ण भूतों में स्थित और सम्पूर्ण भूतों को आत्मा में कल्पित देखता है
 ॥29॥

~ श्लोक 29 - अध्याय 6 - ध्यानयोग

श्रीमद्भागवत गीता

यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
 तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥

जो पुरुष सम्पूर्ण भूतों में सबके आत्मरूप मुझ वासुदेव को ही व्यापक देखता है और सम्पूर्ण भूतों को मुझ वासुदेव के अन्तर्गत (गीता अध्याय 9 श्लोक 6 में देखना चाहिए।) देखता है, उसके लिए मैं अदृश्य नहीं होता और वह मेरे लिए अदृश्य नहीं होता
 ॥30॥

~ श्लोक 30 - अध्याय 6 - ध्यानयोग

मंगलवार, 2 मार्च 2021

श्रीमद्भागवत गीता

युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः।
 सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते॥

वह पापरहित योगी इस प्रकार निरंतर आत्मा को परमात्मा में लगाता हुआ सुखपूर्वक परब्रह्म परमात्मा की प्राप्ति रूप अनन्त आनंद का अनुभव करता है
 ॥28॥

~ श्लोक 28 - अध्याय 6 - ध्यानयोग

सोमवार, 1 मार्च 2021

श्रीमद्भागवत गीता

प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम्‌।
 उपैति शांतरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम्‌॥

क्योंकि जिसका मन भली प्रकार शांत है, जो पाप से रहित है और जिसका रजोगुण शांत हो गया है, ऐसे इस सच्चिदानन्दघन ब्रह्म के साथ एकीभाव हुए योगी को उत्तम आनंद प्राप्त होता है
 ॥27॥

~ श्लोक 27 - अध्याय 6 - ध्यानयोग