सोमवार, 15 मार्च 2021

श्रीमद्भागवत गीता

( योगभ्रष्ट पुरुष की गति का विषय और ध्यानयोगी की महिमा ) 
 अर्जुन उवाच
 अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः।
 अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति॥

अर्जुन बोले- हे श्रीकृष्ण! जो योग में श्रद्धा रखने वाला है, किन्तु संयमी नहीं है, इस कारण जिसका मन अन्तकाल में योग से विचलित हो गया है, ऐसा साधक योग की सिद्धि को अर्थात भगवत्साक्षात्कार को न प्राप्त होकर किस गति को प्राप्त होता है
 ॥37॥

~ श्लोक 37 - अध्याय 6 - ध्यानयोग

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