मंगलवार, 2 मार्च 2021

श्रीमद्भागवत गीता

युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः।
 सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते॥

वह पापरहित योगी इस प्रकार निरंतर आत्मा को परमात्मा में लगाता हुआ सुखपूर्वक परब्रह्म परमात्मा की प्राप्ति रूप अनन्त आनंद का अनुभव करता है
 ॥28॥

~ श्लोक 28 - अध्याय 6 - ध्यानयोग

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