शुक्रवार, 29 मई 2020

श्रीमद्भागवत गीता

श्रीभगवानुवाच
 कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम्‌।
 अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन।

श्रीभगवान बोले- हे अर्जुन! तुझे इस असमय में यह मोह किस हेतु से प्राप्त हुआ? क्योंकि न तो यह श्रेष्ठ पुरुषों द्वारा आचरित है, न स्वर्ग को देने वाला है और न कीर्ति को करने वाला ही है
 ॥2॥

~ श्लोक 2 - अध्याय 2

गुरुवार, 28 मई 2020

श्रीमद्भागवत गीता

( अर्जुन की कायरता के विषय में श्री कृष्णार्जुन-संवाद )
 संजय उवाच
 तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम्‌।
 विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः॥

संजय बोले- उस प्रकार करुणा से व्याप्त और आँसुओं से पूर्ण तथा व्याकुल नेत्रों वाले शोकयुक्त उस अर्जुन के प्रति भगवान मधुसूदन ने यह वचन कहा
 ॥1॥

~ श्लोक 1 - अध्याय 2 

बुधवार, 27 मई 2020

श्रीमद्भागवत गीता

एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति।
 स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति॥

हे अर्जुन! यह ब्रह्म को प्राप्त हुए पुरुष की स्थिति है, इसको प्राप्त होकर योगी कभी मोहित नहीं होता और अंतकाल में भी इस ब्राह्मी स्थिति में स्थित होकर ब्रह्मानन्द को प्राप्त हो जाता है
 ॥72॥ 

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे सांख्ययोगो नाम द्वितीयोऽध्यायः 
 ॥2॥

~ श्लोक 72 - अध्याय 2 

मंगलवार, 26 मई 2020

श्रीमद्भागवत गीता

विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः।
 निर्ममो निरहंकारः स शान्तिमधिगच्छति॥

जो पुरुष सम्पूर्ण कामनाओं को त्याग कर ममतारहित, अहंकाररहित और स्पृहारहित हुआ विचरता है, वही शांति को प्राप्त होता है अर्थात वह शान्ति को प्राप्त है
 ॥71॥

~ श्लोक 71 - अध्याय 2 

सोमवार, 25 मई 2020

श्रीमद्भागवत गीता

आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं-
 समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत्‌।
 तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे
 स शान्तिमाप्नोति न कामकामी॥

जैसे नाना नदियों के जल सब ओर से परिपूर्ण, अचल प्रतिष्ठा वाले समुद्र में उसको विचलित न करते हुए ही समा जाते हैं, वैसे ही सब भोग जिस स्थितप्रज्ञ पुरुष में किसी प्रकार का विकार उत्पन्न किए बिना ही समा जाते हैं, वही पुरुष परम शान्ति को प्राप्त होता है, भोगों को चाहने वाला नहीं
 ॥70॥

~ श्लोक 70 - अध्याय 2 

शुक्रवार, 22 मई 2020

श्रीमद्भागवत गीता

या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।
 यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः॥

सम्पूर्ण प्राणियों के लिए जो रात्रि के समान है, उस नित्य ज्ञानस्वरूप परमानन्द की प्राप्ति में स्थितप्रज्ञ योगी जागता है और जिस नाशवान सांसारिक सुख की प्राप्ति में सब प्राणी जागते हैं, परमात्मा के तत्व को जानने वाले मुनि के लिए वह रात्रि के समान है
 ॥69॥

~ श्लोक 69 - अध्याय 2 

गुरुवार, 21 मई 2020

श्रीमद्भागवत गीता

तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः।
 इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥

इसलिए हे महाबाहो! जिस पुरुष की इन्द्रियाँ इन्द्रियों के विषयों में सब प्रकार निग्रह की हुई हैं, उसी की बुद्धि स्थिर है
 ॥68॥

~ श्लोक 68 - अध्याय 2 

बुधवार, 20 मई 2020

श्रीमद्भागवत गीता

इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते।
 तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि॥

क्योंकि जैसे जल में चलने वाली नाव को वायु हर लेती है, वैसे ही विषयों में विचरती हुई इन्द्रियों में से मन जिस इन्द्रिय के साथ रहता है, वह एक ही इन्द्रिय इस अयुक्त पुरुष की बुद्धि को हर लेती है
 ॥67॥

~ श्लोक 67 - अध्याय 2 

मंगलवार, 19 मई 2020

श्रीमद्भागवत गीता

नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना।
 न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम्‌॥

न जीते हुए मन और इन्द्रियों वाले पुरुष में निश्चयात्मिका बुद्धि नहीं होती और उस अयुक्त मनुष्य के अन्तःकरण में भावना भी नहीं होती तथा भावनाहीन मनुष्य को शान्ति नहीं मिलती और शान्तिरहित मनुष्य को सुख कैसे मिल सकता है?
 ॥66॥

~ श्लोक 66 - अध्याय 2

सोमवार, 18 मई 2020

श्रीमद्भागवत गीता

प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते।
 प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते॥

अन्तःकरण की प्रसन्नता होने पर इसके सम्पूर्ण दुःखों का अभाव हो जाता है और उस प्रसन्नचित्त वाले कर्मयोगी की बुद्धि शीघ्र ही सब ओर से हटकर एक परमात्मा में ही भलीभाँति स्थिर हो जाती है
 ॥65॥

~ श्लोक 65 - अध्याय 2 

शनिवार, 16 मई 2020

श्रीमद्भागवत गीता

रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन्‌।
 आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति॥

परंन्तु अपने अधीन किए हुए अन्तःकरण वाला साधक अपने वश में की हुई, राग-द्वेष रहित इन्द्रियों द्वारा विषयों में विचरण करता हुआ अन्तःकरण की प्रसन्नता को प्राप्त होता है
 ॥64॥

~ श्लोक 64 - अध्याय 2 

गुरुवार, 14 मई 2020

श्रीमद्भागवत गीता

क्रोधाद्‍भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः।
 स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥

क्रोध से अत्यन्त मूढ़ भाव उत्पन्न हो जाता है, मूढ़ भाव से स्मृति में भ्रम हो जाता है, स्मृति में भ्रम हो जाने से बुद्धि अर्थात ज्ञानशक्ति का नाश हो जाता है और बुद्धि का नाश हो जाने से यह पुरुष अपनी स्थिति से गिर जाता है
 ॥63॥

~ श्लोक 63 - अध्याय 2 

मंगलवार, 12 मई 2020

श्रीमद्भागवत गीता

ध्यायतो विषयान्पुंसः संगस्तेषूपजायते।
 संगात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥

विषयों का चिन्तन करने वाले पुरुष की उन विषयों में आसक्ति हो जाती है, आसक्ति से उन विषयों की कामना उत्पन्न होती है और कामना में विघ्न पड़ने से क्रोध उत्पन्न होता है
 ॥62॥

~ श्लोक 62 - अध्याय 2

सोमवार, 11 मई 2020

श्रीमद्भागवत गीता

तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः।
 वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥

इसलिए साधक को चाहिए कि वह उन सम्पूर्ण इन्द्रियों को वश में करके समाहित चित्त हुआ मेरे परायण होकर ध्यान में बैठे क्योंकि जिस पुरुष की इन्द्रियाँ वश में होती हैं, उसी की बुद्धि स्थिर हो जाती है
 ॥61॥

~ श्लोक 61 - अध्याय 2

शनिवार, 9 मई 2020

श्रीमद्भागवत गीता

यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः।
 इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः॥

हे अर्जुन! आसक्ति का नाश न होने के कारण ये प्रमथन स्वभाव वाली इन्द्रियाँ यत्न करते हुए बुद्धिमान पुरुष के मन को भी बलात्‌ हर लेती हैं
 ॥60॥

~ श्लोक 60 - अध्याय 2

शुक्रवार, 8 मई 2020

श्रीमद्भागवत गीता

विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः।
 रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्टवा निवर्तते॥

इन्द्रियों द्वारा विषयों को ग्रहण न करने वाले पुरुष के भी केवल विषय तो निवृत्त हो जाते हैं, परन्तु उनमें रहने वाली आसक्ति निवृत्त नहीं होती। इस स्थितप्रज्ञ पुरुष की तो आसक्ति भी परमात्मा का साक्षात्कार करके निवृत्त हो जाती है
 ॥59॥

~ श्लोक 59 - अध्याय 2

मंगलवार, 5 मई 2020

श्रीमद्भागवत गीता

दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः।
 वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते॥

दुःखों की प्राप्ति होने पर जिसके मन में उद्वेग नहीं होता, सुखों की प्राप्ति में सर्वथा निःस्पृह है तथा जिसके राग, भय और क्रोध नष्ट हो गए हैं, ऐसा मुनि स्थिरबुद्धि कहा जाता है
 ॥56॥

~ श्लोक 56 - अध्याय 2 

सोमवार, 4 मई 2020

श्रीमद्भागवत गीता

श्रीभगवानुवाच
 प्रजहाति यदा कामान्‌ सर्वान्पार्थ मनोगतान्‌।
 आत्मयेवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते॥

श्री भगवान्‌ बोले- हे अर्जुन! जिस काल में यह पुरुष मन में स्थित सम्पूर्ण कामनाओं को भलीभाँति त्याग देता है और आत्मा से आत्मा में ही संतुष्ट रहता है, उस काल में वह स्थितप्रज्ञ कहा जाता है
 ॥55॥

~ श्लोक 55 - अध्याय 2 

रविवार, 3 मई 2020

श्रीमद्भागवत गीता

( स्थिरबुद्धि पुरुष के लक्षण और उसकी महिमा )
 अर्जुन उवाच
 स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव।
 स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम्‌॥

अर्जुन बोले- हे केशव! समाधि में स्थित परमात्मा को प्राप्त हुए स्थिरबुद्धि पुरुष का क्या लक्षण है? वह स्थिरबुद्धि पुरुष कैसे बोलता है, कैसे बैठता है और कैसे चलता है?
 ॥54॥

~ श्लोक 54 - अध्याय 2 

शनिवार, 2 मई 2020

श्रीमद्भागवत गीता

श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला।
 समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि॥

भाँति-भाँति के वचनों को सुनने से विचलित हुई तेरी बुद्धि जब परमात्मा में अचल और स्थिर ठहर जाएगी, तब तू योग को प्राप्त हो जाएगा अर्थात तेरा परमात्मा से नित्य संयोग हो जाएगा
 ॥53॥

~ श्लोक 53 - अध्याय 2 

शुक्रवार, 1 मई 2020

श्रीमद्भागवत गीता

यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति।
 तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च॥

जिस काल में तेरी बुद्धि मोहरूपी दलदल को भलीभाँति पार कर जाएगी, उस समय तू सुने हुए और सुनने में आने वाले इस लोक और परलोक संबंधी सभी भोगों से वैराग्य को प्राप्त हो जाएगा
 ॥52॥

~ श्लोक 52 - अध्याय 2