शनिवार, 29 फ़रवरी 2020

श्रीमद्भागवत गीता

देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा।
 तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति॥

जैसे जीवात्मा की इस देह में बालकपन, जवानी और वृद्धावस्था होती है, वैसे ही अन्य शरीर की प्राप्ति होती है, उस विषय में धीर पुरुष मोहित नहीं होता।13॥

~ श्लोक 13 - अध्याय 2 

गुरुवार, 27 फ़रवरी 2020

श्रीमद्भागवत गीता

न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः।
 न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम्‌॥

न तो ऐसा ही है कि मैं किसी काल में नहीं था, तू नहीं था अथवा ये राजा लोग नहीं थे और न ऐसा ही है कि इससे आगे हम सब नहीं रहेंगे
 ॥12॥

~ श्लोक 12 - अध्याय 2

बुधवार, 26 फ़रवरी 2020

श्रीमद्भागवत गीता

( सांख्ययोग का विषय )
 श्री भगवानुवाच
 अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे।
 गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः॥

श्री भगवान बोले, हे अर्जुन! तू न शोक करने योग्य मनुष्यों के लिए शोक करता है और पण्डितों के से वचनों को कहता है, परन्तु जिनके प्राण चले गए हैं, उनके लिए और जिनके प्राण नहीं गए हैं उनके लिए भी पण्डितजन शोक नहीं करते
 ॥11॥

~ श्लोक 11 - अध्याय 2 

मंगलवार, 25 फ़रवरी 2020

श्रीमद्भगवद्गीता

तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत।
 सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदंतमिदं वचः॥

हे भरतवंशी धृतराष्ट्र! अंतर्यामी श्रीकृष्ण महाराज दोनों सेनाओं के बीच में शोक करते हुए उस अर्जुन को हँसते हुए से यह वचन बोले
 
 ॥10॥

~ श्लोक 10 - अध्याय 2

सोमवार, 24 फ़रवरी 2020

श्रीमद्भागवत गीता

संजय उवाच
 एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तप।
 न योत्स्य इतिगोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह॥

संजय बोले- हे राजन्‌! निद्रा को जीतने वाले अर्जुन अंतर्यामी श्रीकृष्ण महाराज के प्रति इस प्रकार कहकर फिर श्री गोविंद भगवान्‌ से 'युद्ध नहीं करूँगा' यह स्पष्ट कहकर चुप हो गए
 ॥9॥

~ श्लोक 9 - अध्याय 2 

रविवार, 23 फ़रवरी 2020

श्रीमद्भागवत गीता

न हि प्रपश्यामि ममापनुद्या-
 द्यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम्‌।
 अवाप्य भूमावसपत्रमृद्धं-
 राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम्‌॥

क्योंकि भूमि में निष्कण्टक, धन-धान्य सम्पन्न राज्य को और देवताओं के स्वामीपने को प्राप्त होकर भी मैं उस उपाय को नहीं देखता हूँ, जो मेरी इन्द्रियों के सुखाने वाले शोक को दूर कर सके
 ॥8॥

~ श्लोक 8 - अध्याय 2 

शनिवार, 22 फ़रवरी 2020

श्रीमद्भागवत गीता

कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः
 पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः।
 यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे
 शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्‌॥

इसलिए कायरता रूप दोष से उपहत हुए स्वभाव वाला तथा धर्म के विषय में मोहित चित्त हुआ मैं आपसे पूछता हूँ कि जो साधन निश्चित कल्याणकारक हो, वह मेरे लिए कहिए क्योंकि मैं आपका शिष्य हूँ, इसलिए आपके शरण हुए मुझको शिक्षा दीजिए
 ॥7॥

~ श्लोक 7 - अध्याय 2

शुक्रवार, 21 फ़रवरी 2020

श्रीमद्भागवत गीता

न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो-
 यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः।
 यानेव हत्वा न जिजीविषाम-
 स्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः॥

हम यह भी नहीं जानते कि हमारे लिए युद्ध करना और न करना- इन दोनों में से कौन-सा श्रेष्ठ है, अथवा यह भी नहीं जानते कि उन्हें हम जीतेंगे या हमको वे जीतेंगे। और जिनको मारकर हम जीना भी नहीं चाहते, वे ही हमारे आत्मीय धृतराष्ट्र के पुत्र हमारे मुकाबले में खड़े हैं
 ॥6॥

~ श्लोक 6 - अध्याय 2

गुरुवार, 20 फ़रवरी 2020

श्रीमद्भागवत गीता

न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो-
 यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः।
 यानेव हत्वा न जिजीविषाम-
 स्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः॥

हम यह भी नहीं जानते कि हमारे लिए युद्ध करना और न करना- इन दोनों में से कौन-सा श्रेष्ठ है, अथवा यह भी नहीं जानते कि उन्हें हम जीतेंगे या हमको वे जीतेंगे। और जिनको मारकर हम जीना भी नहीं चाहते, वे ही हमारे आत्मीय धृतराष्ट्र के पुत्र हमारे मुकाबले में खड़े हैं
 ॥6॥

~ श्लोक 6 - अध्याय 2 

बुधवार, 19 फ़रवरी 2020

श्रीमद्भागवत गीता

गुरूनहत्वा हि महानुभावा-
 ञ्छ्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके।
 हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव
 भुंजीय भोगान्‌ रुधिरप्रदिग्धान्‌॥

इसलिए इन महानुभाव गुरुजनों को न मारकर मैं इस लोक में भिक्षा का अन्न भी खाना कल्याणकारक समझता हूँ क्योंकि गुरुजनों को मारकर भी इस लोक में रुधिर से सने हुए अर्थ और कामरूप भोगों को ही तो भोगूँगा
 ॥5॥

~ श्लोक 5 - अध्याय 2

मंगलवार, 18 फ़रवरी 2020

श्रीमद्भागवत गीता

अर्जुन उवाच
 कथं भीष्ममहं सङ्‍ख्ये द्रोणं च मधुसूदन।
 इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन॥

अर्जुन बोले- हे मधुसूदन! मैं रणभूमि में किस प्रकार बाणों से भीष्म पितामह और द्रोणाचार्य के विरुद्ध लड़ूँगा? क्योंकि हे अरिसूदन! वे दोनों ही पूजनीय हैं
 ॥4॥

~ श्लोक 4 - अध्याय 2 

सोमवार, 17 फ़रवरी 2020

श्रीमद्भागवत गीता

क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते।
 क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप॥

इसलिए हे अर्जुन! नपुंसकता को मत प्राप्त हो, तुझमें यह उचित नहीं जान पड़ती। हे परंतप! हृदय की तुच्छ दुर्बलता को त्यागकर युद्ध के लिए खड़ा हो जा
 ॥3॥

~ श्लोक 3 - अध्याय 2 

रविवार, 16 फ़रवरी 2020

श्रीमद्भागवत गीता

श्रीभगवानुवाच
 कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम्‌।
 अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन।

श्रीभगवान बोले- हे अर्जुन! तुझे इस असमय में यह मोह किस हेतु से प्राप्त हुआ? क्योंकि न तो यह श्रेष्ठ पुरुषों द्वारा आचरित है, न स्वर्ग को देने वाला है और न कीर्ति को करने वाला ही है
 ॥2॥

~ श्लोक 2 - अध्याय 2 

शनिवार, 15 फ़रवरी 2020

श्रीमद्भागवत गीता।

( अर्जुन की कायरता के विषय में श्री कृष्णार्जुन-संवाद )
 संजय उवाच
 तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम्‌।
 विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः॥

संजय बोले- उस प्रकार करुणा से व्याप्त और आँसुओं से पूर्ण तथा व्याकुल नेत्रों वाले शोकयुक्त उस अर्जुन के प्रति भगवान मधुसूदन ने यह वचन कहा
 ॥1॥

~ श्लोक 1 - अध्याय 2

शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2020

श्रीमद्भागवत गीता।

संजय उवाच
 एवमुक्त्वार्जुनः सङ्‍ख्ये रथोपस्थ उपाविशत्‌।
 विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः॥

संजय बोले- रणभूमि में शोक से उद्विग्न मन वाले अर्जुन इस प्रकार कहकर, बाणसहित धनुष को त्यागकर रथ के पिछले भाग में बैठ गए
 ॥47॥
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादेऽर्जुनविषादयोगो नाम प्रथमोऽध्यायः। 
 ॥1॥

~ श्लोक 47 - अध्याय 1

गुरुवार, 13 फ़रवरी 2020

श्रीमद्भागवत गीता।

यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः।
 धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत्‌॥

यदि मुझ शस्त्ररहित एवं सामना न करने वाले को शस्त्र हाथ में लिए हुए धृतराष्ट्र के पुत्र रण में मार डालें तो वह मारना भी मेरे लिए अधिक कल्याणकारक होगा
 ॥46॥

~ श्लोक 46 - अध्याय 1

बुधवार, 12 फ़रवरी 2020

श्रीमद्भागवत गीता।

अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम्‌।
 यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः॥

हा! शोक! हम लोग बुद्धिमान होकर भी महान पाप करने को तैयार हो गए हैं, जो राज्य और सुख के लोभ से स्वजनों को मारने के लिए उद्यत हो गए हैं
 ॥45॥

~ श्लोक 45 - अध्याय 1

मंगलवार, 11 फ़रवरी 2020

श्रीमद्भागवत गीता।

उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन।
 नरकेऽनियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम॥

हे जनार्दन! जिनका कुल-धर्म नष्ट हो गया है, ऐसे मनुष्यों का अनिश्चितकाल तक नरक में वास होता है, ऐसा हम सुनते आए हैं
 ॥44॥

~ श्लोक 44 - अध्याय 1

सोमवार, 10 फ़रवरी 2020

श्रीमद्भागवत गीता

दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसंकरकारकैः।
 उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः॥

इन वर्णसंकरकारक दोषों से कुलघातियों के सनातन कुल-धर्म और जाति-धर्म नष्ट हो जाते हैं
 ॥43॥

~ श्लोक 43 - अध्याय 1

रविवार, 9 फ़रवरी 2020

श्रीमद्भागवत गीता।

संकरो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च।
 पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः॥

वर्णसंकर कुलघातियों को और कुल को नरक में ले जाने के लिए ही होता है। लुप्त हुई पिण्ड और जल की क्रिया वाले अर्थात श्राद्ध और तर्पण से वंचित इनके पितर लोग भी अधोगति को प्राप्त होते हैं
 ॥42॥

~ श्लोक 42 - अध्याय 1

शुक्रवार, 7 फ़रवरी 2020

श्रीमद्भागवत गीता

अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः।
 स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसंकरः॥

हे कृष्ण! पाप के अधिक बढ़ जाने से कुल की स्त्रियाँ अत्यन्त दूषित हो जाती हैं और हे वार्ष्णेय! स्त्रियों के दूषित हो जाने पर वर्णसंकर उत्पन्न होता है
 ॥41॥

~ श्लोक 41 - अध्याय 1

गुरुवार, 6 फ़रवरी 2020

श्रीमद्भागवत गीता

कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः।
 धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत॥

कुल के नाश से सनातन कुल-धर्म नष्ट हो जाते हैं तथा धर्म का नाश हो जाने पर सम्पूर्ण कुल में पाप भी बहुत फैल जाता है
 ॥40॥

~ श्लोक 40 - अध्याय 1

बुधवार, 5 फ़रवरी 2020

श्रीमद्भागवत गीता

यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः।
 कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम्‌॥
 कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम्‌।
 कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन॥

यद्यपि लोभ से भ्रष्टचित्त हुए ये लोग कुल के नाश से उत्पन्न दोष को और मित्रों से विरोध करने में पाप को नहीं देखते, तो भी हे जनार्दन! कुल के नाश से उत्पन्न दोष को जानने वाले हम लोगों को इस पाप से हटने के लिए क्यों नहीं विचार करना चाहिए?
 ॥38-39॥

~ श्लोक 38, 39 - अध्याय 1

मंगलवार, 4 फ़रवरी 2020

श्रीमद्भागवत गीता

तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान्‌।
 स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव॥

अतएव हे माधव! अपने ही बान्धव धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारने के लिए हम योग्य नहीं हैं क्योंकि अपने ही कुटुम्ब को मारकर हम कैसे सुखी होंगे?
 ॥37॥

~ श्लोक 37 - अध्याय 1

सोमवार, 3 फ़रवरी 2020

श्रीमद्भागवत गीता

निहत्य धार्तराष्ट्रान्न का प्रीतिः स्याज्जनार्दन।
 पापमेवाश्रयेदस्मान्‌ हत्वैतानाततायिनः॥

हे जनार्दन! धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारकर हमें क्या प्रसन्नता होगी? इन आततायियों को मारकर तो हमें पाप ही लगेगा
 ॥36॥

~ श्लोक 36 - अध्याय 1

रविवार, 2 फ़रवरी 2020

श्रीमद्भागवत गीता

एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन।
 अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते॥

हे मधुसूदन! मुझे मारने पर भी अथवा तीनों लोकों के राज्य के लिए भी मैं इन सबको मारना नहीं चाहता, फिर पृथ्वी के लिए तो कहना ही क्या है?
 ॥35॥

~ श्लोक 35 - अध्याय 1 

शनिवार, 1 फ़रवरी 2020

Shremad Bhagwat Gita

आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः।
 मातुलाः श्वशुराः पौत्राः श्यालाः संबंधिनस्तथा॥

गुरुजन, ताऊ-चाचे, लड़के और उसी प्रकार दादे, मामे, ससुर, पौत्र, साले तथा और भी संबंधी लोग हैं 
 ॥34॥

~ श्लोक 34 - अध्याय 1