रविवार, 2 फ़रवरी 2020

श्रीमद्भागवत गीता

एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन।
 अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते॥

हे मधुसूदन! मुझे मारने पर भी अथवा तीनों लोकों के राज्य के लिए भी मैं इन सबको मारना नहीं चाहता, फिर पृथ्वी के लिए तो कहना ही क्या है?
 ॥35॥

~ श्लोक 35 - अध्याय 1 

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