मंगलवार, 29 सितंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः।
 यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः॥
 कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम्‌।
 तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम्‌॥

सम्पूर्ण प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैं, अन्न की उत्पत्ति वृष्टि से होती है, वृष्टि यज्ञ से होती है और यज्ञ विहित कर्मों से उत्पन्न होने वाला है। कर्मसमुदाय को तू वेद से उत्पन्न और वेद को अविनाशी परमात्मा से उत्पन्न हुआ जान। इससे सिद्ध होता है कि सर्वव्यापी परम अक्षर परमात्मा सदा ही यज्ञ में प्रतिष्ठित है
 ॥14-15॥

~ श्लोक 14, 15 - अध्याय 3 - कर्मयोग

सोमवार, 28 सितंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः।
 भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्‌॥

यज्ञ से बचे हुए अन्न को खाने वाले श्रेष्ठ पुरुष सब पापों से मुक्त हो जाते हैं और जो पापी लोग अपना शरीर-पोषण करने के लिए ही अन्न पकाते हैं, वे तो पाप को ही खाते हैं
 ॥13॥

~ श्लोक 13 - अध्याय 3 - कर्मयोग

रविवार, 27 सितंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः।
 तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुंक्ते स्तेन एव सः॥

यज्ञ द्वारा बढ़ाए हुए देवता तुम लोगों को बिना माँगे ही इच्छित भोग निश्चय ही देते रहेंगे। इस प्रकार उन देवताओं द्वारा दिए हुए भोगों को जो पुरुष उनको बिना दिए स्वयं भोगता है, वह चोर ही है
 ॥12॥

~ श्लोक 12 - अध्याय 3 - कर्मयोग

शनिवार, 26 सितंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः।
 परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ॥

तुम लोग इस यज्ञ द्वारा देवताओं को उन्नत करो और वे देवता तुम लोगों को उन्नत करें। इस प्रकार निःस्वार्थ भाव से एक-दूसरे को उन्नत करते हुए तुम लोग परम कल्याण को प्राप्त हो जाओगे
 ॥11॥

~ श्लोक 11 - अध्याय 3 - कर्मयोग

शुक्रवार, 25 सितंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

सहयज्ञाः प्रजाः सृष्टा पुरोवाचप्रजापतिः।
 अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक्‌॥

प्रजापति ब्रह्मा ने कल्प के आदि में यज्ञ सहित प्रजाओं को रचकर उनसे कहा कि तुम लोग इस यज्ञ द्वारा वृद्धि को प्राप्त होओ और यह यज्ञ तुम लोगों को इच्छित भोग प्रदान करने वाला हो
 
 ॥10॥

~ श्लोक 10 - अध्याय 3 - कर्मयोग

बुधवार, 23 सितंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

( यज्ञादि कर्मों की आवश्यकता का निरूपण ) यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबंधनः।
 तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसंगः समाचर॥

यज्ञ के निमित्त किए जाने वाले कर्मों से अतिरिक्त दूसरे कर्मों में लगा हुआ ही यह मुनष्य समुदाय कर्मों से बँधता है। इसलिए हे अर्जुन! तू आसक्ति से रहित होकर उस यज्ञ के निमित्त ही भलीभाँति कर्तव्य कर्म कर
 ॥9॥

~ श्लोक 9 - अध्याय 3 - कर्मयोग

सोमवार, 21 सितंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन।
 कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते॥

किन्तु हे अर्जुन! जो पुरुष मन से इन्द्रियों को वश में करके अनासक्त हुआ समस्त इन्द्रियों द्वारा कर्मयोग का आचरण करता है, वही श्रेष्ठ है
 ॥7॥॥

~ श्लोक 7 - अध्याय 3 - कर्मयोग

रविवार, 20 सितंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन।
 कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते॥

किन्तु हे अर्जुन! जो पुरुष मन से इन्द्रियों को वश में करके अनासक्त हुआ समस्त इन्द्रियों द्वारा कर्मयोग का आचरण करता है, वही श्रेष्ठ है
 ॥7॥॥

~ श्लोक 7 - अध्याय 3 - कर्मयोग

शुक्रवार, 18 सितंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन्‌।
 इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते॥

जो मूढ़ बुद्धि मनुष्य समस्त इन्द्रियों को हठपूर्वक ऊपर से रोककर मन से उन इन्द्रियों के विषयों का चिन्तन करता रहता है, वह मिथ्याचारी अर्थात दम्भी कहा जाता है
 ॥6॥

~ श्लोक 6 - अध्याय 3 - कर्मयोग

गुरुवार, 17 सितंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्‌।
 कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः॥

निःसंदेह कोई भी मनुष्य किसी भी काल में क्षणमात्र भी बिना कर्म किए नहीं रहता क्योंकि सारा मनुष्य समुदाय प्रकृति जनित गुणों द्वारा परवश हुआ कर्म करने के लिए बाध्य किया जाता है
 ॥5॥

~ श्लोक 5 - अध्याय 3 - कर्मयोग

मंगलवार, 15 सितंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

न कर्मणामनारंभान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते।
 न च सन्न्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति॥

मनुष्य न तो कर्मों का आरंभ किए बिना निष्कर्मता (जिस अवस्था को प्राप्त हुए पुरुष के कर्म अकर्म हो जाते हैं अर्थात फल उत्पन्न नहीं कर सकते, उस अवस्था का नाम 'निष्कर्मता' है।) को यानी योगनिष्ठा को प्राप्त होता है और न कर्मों के केवल त्यागमात्र से सिद्धि यानी सांख्यनिष्ठा को ही प्राप्त होता है
 ॥4॥

~ श्लोक 4 - अध्याय 3 - कर्मयोग

शुक्रवार, 11 सितंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे।
 तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम्‌॥

आप मिले हुए-से वचनों से मेरी बुद्धि को मानो मोहित कर रहे हैं। इसलिए उस एक बात को निश्चित करके कहिए जिससे मैं कल्याण को प्राप्त हो जाऊँ
 ॥2॥॥

~ श्लोक 2 - अध्याय 3 - कर्मयोग

गुरुवार, 10 सितंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

(ज्ञानयोग और कर्मयोग के अनुसार अनासक्त भाव से नियत कर्म करने की श्रेष्ठता का निरूपण) अर्जुन उवाच ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन।
 तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव॥

अर्जुन बोले- हे जनार्दन! यदि आपको कर्म की अपेक्षा ज्ञान श्रेष्ठ मान्य है तो फिर हे केशव! मुझे भयंकर कर्म में क्यों लगाते हैं?
 ॥1॥

~ श्लोक 1 - अध्याय 3 - कर्मयोग

बुधवार, 9 सितंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति।
 स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति॥

हे अर्जुन! यह ब्रह्म को प्राप्त हुए पुरुष की स्थिति है, इसको प्राप्त होकर योगी कभी मोहित नहीं होता और अंतकाल में भी इस ब्राह्मी स्थिति में स्थित होकर ब्रह्मानन्द को प्राप्त हो जाता है
 ॥72॥ 

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे सांख्ययोगो नाम द्वितीयोऽध्यायः 
 ॥2॥

~ श्लोक 72 - अध्याय 2 - गीता का सार

गुरुवार, 3 सितंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं-
 समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत्‌।
 तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे
 स शान्तिमाप्नोति न कामकामी॥

जैसे नाना नदियों के जल सब ओर से परिपूर्ण, अचल प्रतिष्ठा वाले समुद्र में उसको विचलित न करते हुए ही समा जाते हैं, वैसे ही सब भोग जिस स्थितप्रज्ञ पुरुष में किसी प्रकार का विकार उत्पन्न किए बिना ही समा जाते हैं, वही पुरुष परम शान्ति को प्राप्त होता है, भोगों को चाहने वाला नहीं
 ॥70॥

~ श्लोक 70 - अध्याय 2 - गीता का सार

बुधवार, 2 सितंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।
 यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः॥

सम्पूर्ण प्राणियों के लिए जो रात्रि के समान है, उस नित्य ज्ञानस्वरूप परमानन्द की प्राप्ति में स्थितप्रज्ञ योगी जागता है और जिस नाशवान सांसारिक सुख की प्राप्ति में सब प्राणी जागते हैं, परमात्मा के तत्व को जानने वाले मुनि के लिए वह रात्रि के समान है
 ॥69॥

~ श्लोक 69 - अध्याय 2 - गीता का सार