शुक्रवार, 18 सितंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन्‌।
 इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते॥

जो मूढ़ बुद्धि मनुष्य समस्त इन्द्रियों को हठपूर्वक ऊपर से रोककर मन से उन इन्द्रियों के विषयों का चिन्तन करता रहता है, वह मिथ्याचारी अर्थात दम्भी कहा जाता है
 ॥6॥

~ श्लोक 6 - अध्याय 3 - कर्मयोग

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