मंगलवार, 30 जून 2020

श्रीमद्भागवत गीता

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय
 नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।
 तथा शरीराणि विहाय जीर्णा-
 न्यन्यानि संयाति नवानि देही॥

जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर दूसरे नए वस्त्रों को ग्रहण करता है, वैसे ही जीवात्मा पुराने शरीरों को त्यागकर दूसरे नए शरीरों को प्राप्त होता है
 ॥22॥

~ श्लोक 22 - अध्याय 2 - गीता का सार

सोमवार, 29 जून 2020

श्रीमद्भागवत गीता

वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम्‌।
 कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम्‌॥

हे पृथापुत्र अर्जुन! जो पुरुष इस आत्मा को नाशरहित, नित्य, अजन्मा और अव्यय जानता है, वह पुरुष कैसे किसको मरवाता है और कैसे किसको मारता है?
 ॥21॥

~ श्लोक 21 - अध्याय 2 - गीता का सार

रविवार, 28 जून 2020

श्रीमद्भगवद्गीता

न जायते म्रियते वा कदाचि-
 न्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।
 अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो-
 न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥

यह आत्मा किसी काल में भी न तो जन्मता है और न मरता ही है तथा न यह उत्पन्न होकर फिर होने वाला ही है क्योंकि यह अजन्मा, नित्य, सनातन और पुरातन है, शरीर के मारे जाने पर भी यह नहीं मारा जाता
 ॥20॥

~ श्लोक 20 - अध्याय 2 

शनिवार, 27 जून 2020

श्रीमद्भागवत गीता

य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम्‌।
 उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते॥

जो इस आत्मा को मारने वाला समझता है तथा जो इसको मरा मानता है, वे दोनों ही नहीं जानते क्योंकि यह आत्मा वास्तव में न तो किसी को मारता है और न किसी द्वारा मारा जाता है
 ॥19॥

~ श्लोक 19 - अध्याय 2 - गीता का सार

शुक्रवार, 26 जून 2020

श्रीमद्भागवत गीता

अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः।
 अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत॥

इस नाशरहित, अप्रमेय, नित्यस्वरूप जीवात्मा के ये सब शरीर नाशवान कहे गए हैं, इसलिए हे भरतवंशी अर्जुन! तू युद्ध कर
 ॥18॥

~ श्लोक 18 - अध्याय 2 - गीता का सार

गुरुवार, 18 जून 2020

श्रीमद्भागवत गीता

अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम्‌।
 विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति॥

नाशरहित तो तू उसको जान, जिससे यह सम्पूर्ण जगत्‌- दृश्यवर्ग व्याप्त है। इस अविनाशी का विनाश करने में कोई भी समर्थ नहीं है
 ॥17॥

~ श्लोक 17 - अध्याय 2 - गीता का सार

बुधवार, 17 जून 2020

श्रीमद्भागवत गीता

नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः।
 उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्वदर्शिभिः॥

असत्‌ वस्तु की तो सत्ता नहीं है और सत्‌ का अभाव नहीं है। इस प्रकार इन दोनों का ही तत्व तत्वज्ञानी पुरुषों द्वारा देखा गया है
 ॥16॥

~ श्लोक 16 - अध्याय 2 

मंगलवार, 16 जून 2020

श्रीमद्भागवत गीता

यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ।
 समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते॥

क्योंकि हे पुरुषश्रेष्ठ! दुःख-सुख को समान समझने वाले जिस धीर पुरुष को ये इन्द्रिय और विषयों के संयोग व्याकुल नहीं करते, वह मोक्ष के योग्य होता है
 ॥15॥

~ श्लोक 15 - अध्याय 2 

सोमवार, 15 जून 2020

श्रीमद्भागवत गीता

मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः।
 आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत॥

हे कुंतीपुत्र! सर्दी-गर्मी और सुख-दुःख को देने वाले इन्द्रिय और विषयों के संयोग तो उत्पत्ति-विनाशशील और अनित्य हैं, इसलिए हे भारत! उनको तू सहन कर
 ॥14॥

~ श्लोक 14 - अध्याय 2 

शनिवार, 13 जून 2020

श्रीमद्भागवत गीता

देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा।
 तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति॥

जैसे जीवात्मा की इस देह में बालकपन, जवानी और वृद्धावस्था होती है, वैसे ही अन्य शरीर की प्राप्ति होती है, उस विषय में धीर पुरुष मोहित नहीं होता।13॥

~ श्लोक 13 - अध्याय 2 

शुक्रवार, 12 जून 2020

श्रीमद्भागवत गीता

न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः।
 न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम्‌॥

न तो ऐसा ही है कि मैं किसी काल में नहीं था, तू नहीं था अथवा ये राजा लोग नहीं थे और न ऐसा ही है कि इससे आगे हम सब नहीं रहेंगे
 ॥12॥

~ श्लोक 12 - अध्याय 2 

गुरुवार, 11 जून 2020

श्रीमद्भागवत गीता

( सांख्ययोग का विषय )
 श्री भगवानुवाच
 अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे।
 गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः॥

श्री भगवान बोले, हे अर्जुन! तू न शोक करने योग्य मनुष्यों के लिए शोक करता है और पण्डितों के से वचनों को कहता है, परन्तु जिनके प्राण चले गए हैं, उनके लिए और जिनके प्राण नहीं गए हैं उनके लिए भी पण्डितजन शोक नहीं करते
 ॥11॥

~ श्लोक 11 - अध्याय 2 

सोमवार, 8 जून 2020

श्रीमद्भागवत गीता

तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत।
 सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदंतमिदं वचः॥

हे भरतवंशी धृतराष्ट्र! अंतर्यामी श्रीकृष्ण महाराज दोनों सेनाओं के बीच में शोक करते हुए उस अर्जुन को हँसते हुए से यह वचन बोले
 
 ॥10॥

~ श्लोक 10 - अध्याय 2 

रविवार, 7 जून 2020

श्रीमद्भागवत गीता

संजय उवाच
 एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तप।
 न योत्स्य इतिगोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह॥

संजय बोले- हे राजन्‌! निद्रा को जीतने वाले अर्जुन अंतर्यामी श्रीकृष्ण महाराज के प्रति इस प्रकार कहकर फिर श्री गोविंद भगवान्‌ से 'युद्ध नहीं करूँगा' यह स्पष्ट कहकर चुप हो गए
 ॥9॥

~ श्लोक 9 - अध्याय 2 

शनिवार, 6 जून 2020

श्रीमद्भागवत गीता

न हि प्रपश्यामि ममापनुद्या-
 द्यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम्‌।
 अवाप्य भूमावसपत्रमृद्धं-
 राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम्‌॥

क्योंकि भूमि में निष्कण्टक, धन-धान्य सम्पन्न राज्य को और देवताओं के स्वामीपने को प्राप्त होकर भी मैं उस उपाय को नहीं देखता हूँ, जो मेरी इन्द्रियों के सुखाने वाले शोक को दूर कर सके
 ॥8॥

~ श्लोक 8 - अध्याय 2 

शुक्रवार, 5 जून 2020

श्रीमद्भागवत गीता

कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः
 पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः।
 यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे
 शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्‌॥

इसलिए कायरता रूप दोष से उपहत हुए स्वभाव वाला तथा धर्म के विषय में मोहित चित्त हुआ मैं आपसे पूछता हूँ कि जो साधन निश्चित कल्याणकारक हो, वह मेरे लिए कहिए क्योंकि मैं आपका शिष्य हूँ, इसलिए आपके शरण हुए मुझको शिक्षा दीजिए
 ॥7॥

~ श्लोक 7 - अध्याय 2 

गुरुवार, 4 जून 2020

श्रीमद्भागवत गीता

न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो-
 यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः।
 यानेव हत्वा न जिजीविषाम-
 स्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः॥

हम यह भी नहीं जानते कि हमारे लिए युद्ध करना और न करना- इन दोनों में से कौन-सा श्रेष्ठ है, अथवा यह भी नहीं जानते कि उन्हें हम जीतेंगे या हमको वे जीतेंगे। और जिनको मारकर हम जीना भी नहीं चाहते, वे ही हमारे आत्मीय धृतराष्ट्र के पुत्र हमारे मुकाबले में खड़े हैं
 ॥6॥

~ श्लोक 6 - अध्याय 2 

बुधवार, 3 जून 2020

श्रीमद्भागवत गीता

गुरूनहत्वा हि महानुभावा-
 ञ्छ्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके।
 हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव
 भुंजीय भोगान्‌ रुधिरप्रदिग्धान्‌॥

इसलिए इन महानुभाव गुरुजनों को न मारकर मैं इस लोक में भिक्षा का अन्न भी खाना कल्याणकारक समझता हूँ क्योंकि गुरुजनों को मारकर भी इस लोक में रुधिर से सने हुए अर्थ और कामरूप भोगों को ही तो भोगूँगा
 ॥5॥

~ श्लोक 5 - अध्याय 2 

मंगलवार, 2 जून 2020

श्रीमद्भागवत गीता

अर्जुन उवाच
 कथं भीष्ममहं सङ्‍ख्ये द्रोणं च मधुसूदन।
 इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन॥

अर्जुन बोले- हे मधुसूदन! मैं रणभूमि में किस प्रकार बाणों से भीष्म पितामह और द्रोणाचार्य के विरुद्ध लड़ूँगा? क्योंकि हे अरिसूदन! वे दोनों ही पूजनीय हैं
 ॥4॥

~ श्लोक 4 - अध्याय 2