शुक्रवार, 19 मार्च 2021

श्रीमद्भागवत गीता

प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः।
 शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते॥

योगभ्रष्ट पुरुष पुण्यवानों के लोकों को अर्थात स्वर्गादि उत्तम लोकों को प्राप्त होकर उनमें बहुत वर्षों तक निवास करके फिर शुद्ध आचरण वाले श्रीमान पुरुषों के घर में जन्म लेता है
 ॥41॥

~ श्लोक 41 - अध्याय 6 - ध्यानयोग

गुरुवार, 18 मार्च 2021

श्रीमद्भागवत गीता

श्रीभगवानुवाच 
 पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते।
 न हि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति॥

श्री भगवान बोले- हे पार्थ! उस पुरुष का न तो इस लोक में नाश होता है और न परलोक में ही क्योंकि हे प्यारे! आत्मोद्धार के लिए अर्थात भगवत्प्राप्ति के लिए कर्म करने वाला कोई भी मनुष्य दुर्गति को प्राप्त नहीं होता
 ॥40॥

~ श्लोक 40 - अध्याय 6 - ध्यानयोग

बुधवार, 17 मार्च 2021

श्रीमद्भागवत गीता

एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः।
 त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते॥

हे श्रीकृष्ण! मेरे इस संशय को सम्पूर्ण रूप से छेदन करने के लिए आप ही योग्य हैं क्योंकि आपके सिवा दूसरा इस संशय का छेदन करने वाला मिलना संभव नहीं है
 ॥39॥

~ श्लोक 39 - अध्याय 6 - ध्यानयोग

मंगलवार, 16 मार्च 2021

श्रीमद्भागवत गीता

कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति।
 अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि॥

हे महाबाहो! क्या वह भगवत्प्राप्ति के मार्ग में मोहित और आश्रयरहित पुरुष छिन्न-भिन्न बादल की भाँति दोनों ओर से भ्रष्ट होकर नष्ट तो नहीं हो जाता?
 ॥38॥

~ श्लोक 38 - अध्याय 6 - ध्यानयोग

सोमवार, 15 मार्च 2021

श्रीमद्भागवत गीता

( योगभ्रष्ट पुरुष की गति का विषय और ध्यानयोगी की महिमा ) 
 अर्जुन उवाच
 अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः।
 अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति॥

अर्जुन बोले- हे श्रीकृष्ण! जो योग में श्रद्धा रखने वाला है, किन्तु संयमी नहीं है, इस कारण जिसका मन अन्तकाल में योग से विचलित हो गया है, ऐसा साधक योग की सिद्धि को अर्थात भगवत्साक्षात्कार को न प्राप्त होकर किस गति को प्राप्त होता है
 ॥37॥

~ श्लोक 37 - अध्याय 6 - ध्यानयोग

रविवार, 14 मार्च 2021

श्रीमद्भागवत गीता

असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः।
 वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः॥

जिसका मन वश में किया हुआ नहीं है, ऐसे पुरुष द्वारा योग दुष्प्राप्य है और वश में किए हुए मन वाले प्रयत्नशील पुरुष द्वारा साधन से उसका प्राप्त होना सहज है- यह मेरा मत है
 ॥36॥

~ श्लोक 36 - अध्याय 6 - ध्यानयोग

गुरुवार, 11 मार्च 2021

श्रीमद्भागवत गीता

श्रीभगवानुवाच 
 असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्‌।
 अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते॥

श्री भगवान बोले- हे महाबाहो! निःसंदेह मन चंचल और कठिनता से वश में होने वाला है। परन्तु हे कुंतीपुत्र अर्जुन! यह अभ्यास (गीता अध्याय 12 श्लोक 9 की टिप्पणी में इसका विस्तार देखना चाहिए।) और वैराग्य से वश में होता है
 ॥35॥

~ श्लोक 35 - अध्याय 6 - ध्यानयोग

मंगलवार, 9 मार्च 2021

श्रीमद्भागवत गीता

चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम्‌।
 तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्‌॥

क्योंकि हे श्रीकृष्ण! यह मन बड़ा चंचल, प्रमथन स्वभाव वाला, बड़ा दृढ़ और बलवान है। इसलिए उसको वश में करना मैं वायु को रोकने की भाँति अत्यन्त दुष्कर मानता हूँ
 ॥34॥

~ श्लोक 34 - अध्याय 6 - ध्यानयोग

सोमवार, 8 मार्च 2021

श्रीमद्भागवत गीता

( मन के निग्रह का विषय ) 
 अर्जुन उवाच
 योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन।
 एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात्स्थितिं स्थिराम्‌॥

अर्जुन बोले- हे मधुसूदन! जो यह योग आपने समभाव से कहा है, मन के चंचल होने से मैं इसकी नित्य स्थिति को नहीं देखता हूँ
 ॥33॥

~ श्लोक 33 - अध्याय 6 - ध्यानयोग

रविवार, 7 मार्च 2021

श्रीमद्भागवत गीता

आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन।
 सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः॥

हे अर्जुन! जो योगी अपनी भाँति (जैसे मनुष्य अपने मस्तक, हाथ, पैर और गुदादि के साथ ब्राह्मण, क्षत्रिय, शूद्र और म्लेच्छादिकों का-सा बर्ताव करता हुआ भी उनमें आत्मभाव अर्थात अपनापन समान होने से सुख और दुःख को समान ही देखता है, वैसे ही सब भूतों में देखना 'अपनी भाँति' सम देखना है।) सम्पूर्ण भूतों में सम देखता है और सुख अथवा दुःख को भी सबमें सम देखता है, वह योगी परम श्रेष्ठ माना गया है
 ॥32॥

~ श्लोक 32 - अध्याय 6 - ध्यानयोग

शुक्रवार, 5 मार्च 2021

श्रीमद्भागवत गीता

सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः।
 सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते॥

जो पुरुष एकीभाव में स्थित होकर सम्पूर्ण भूतों में आत्मरूप से स्थित मुझ सच्चिदानन्दघन वासुदेव को भजता है, वह योगी सब प्रकार से बरतता हुआ भी मुझमें ही बरतता है
 ॥31॥

~ श्लोक 31 - अध्याय 6 - ध्यानयोग

गुरुवार, 4 मार्च 2021

श्रीमद्भागवत गीता

सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।
 ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः॥

सर्वव्यापी अनंत चेतन में एकीभाव से स्थिति रूप योग से युक्त आत्मा वाला तथा सब में समभाव से देखने वाला योगी आत्मा को सम्पूर्ण भूतों में स्थित और सम्पूर्ण भूतों को आत्मा में कल्पित देखता है
 ॥29॥

~ श्लोक 29 - अध्याय 6 - ध्यानयोग

श्रीमद्भागवत गीता

यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
 तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥

जो पुरुष सम्पूर्ण भूतों में सबके आत्मरूप मुझ वासुदेव को ही व्यापक देखता है और सम्पूर्ण भूतों को मुझ वासुदेव के अन्तर्गत (गीता अध्याय 9 श्लोक 6 में देखना चाहिए।) देखता है, उसके लिए मैं अदृश्य नहीं होता और वह मेरे लिए अदृश्य नहीं होता
 ॥30॥

~ श्लोक 30 - अध्याय 6 - ध्यानयोग

मंगलवार, 2 मार्च 2021

श्रीमद्भागवत गीता

युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः।
 सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते॥

वह पापरहित योगी इस प्रकार निरंतर आत्मा को परमात्मा में लगाता हुआ सुखपूर्वक परब्रह्म परमात्मा की प्राप्ति रूप अनन्त आनंद का अनुभव करता है
 ॥28॥

~ श्लोक 28 - अध्याय 6 - ध्यानयोग

सोमवार, 1 मार्च 2021

श्रीमद्भागवत गीता

प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम्‌।
 उपैति शांतरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम्‌॥

क्योंकि जिसका मन भली प्रकार शांत है, जो पाप से रहित है और जिसका रजोगुण शांत हो गया है, ऐसे इस सच्चिदानन्दघन ब्रह्म के साथ एकीभाव हुए योगी को उत्तम आनंद प्राप्त होता है
 ॥27॥

~ श्लोक 27 - अध्याय 6 - ध्यानयोग

रविवार, 28 फ़रवरी 2021

श्रीमद्भागवत गीता

यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्‌।
 ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्‌॥

यह स्थिर न रहने वाला और चंचल मन जिस-जिस शब्दादि विषय के निमित्त से संसार में विचरता है, उस-उस विषय से रोककर यानी हटाकर इसे बार-बार परमात्मा में ही निरुद्ध करे
 ॥26॥

~ श्लोक 26 - अध्याय 6 - ध्यानयोग

शनिवार, 27 फ़रवरी 2021

श्रीमद्भागवत गीता

शनैः शनैरुपरमेद्‍बुद्धया धृतिगृहीतया।
 आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किंचिदपि चिन्तयेत्‌॥

क्रम-क्रम से अभ्यास करता हुआ उपरति को प्राप्त हो तथा धैर्ययुक्त बुद्धि द्वारा मन को परमात्मा में स्थित करके परमात्मा के सिवा और कुछ भी चिन्तन न करे
 ॥25॥

~ श्लोक 25 - अध्याय 6 - ध्यानयोग

शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2021

श्रीमद्भागवत गीता

सङ्‍कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः।
 मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः॥

संकल्प से उत्पन्न होने वाली सम्पूर्ण कामनाओं को निःशेष रूप से त्यागकर और मन द्वारा इन्द्रियों के समुदाय को सभी ओर से भलीभाँति रोककर
 ॥24॥

~ श्लोक 24 - अध्याय 6 - ध्यानयोग

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2021

श्रीमद्भागवत गीता

तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसञ्ज्ञितम्।
 स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा॥

जो दुःखरूप संसार के संयोग से रहित है तथा जिसका नाम योग है, उसको जानना चाहिए। वह योग न उकताए हुए अर्थात धैर्य और उत्साहयुक्त चित्त से निश्चयपूर्वक करना कर्तव्य है
 ॥23॥

~ श्लोक 23 - अध्याय 6 - ध्यानयोग

बुधवार, 24 फ़रवरी 2021

श्रीमद्भागवतगीता

यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः।
 यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते॥

परमात्मा की प्राप्ति रूप जिस लाभ को प्राप्त होकर उसे अधिक दूसरा कुछ भी लाभ नहीं मानता और परमात्मा प्राप्ति रूप जिस अवस्था में स्थित योगी बड़े भारी दुःख से भी चलायमान नहीं होता
 ॥22॥

~ श्लोक 22 - अध्याय 6 - ध्यानयोग

मंगलवार, 23 फ़रवरी 2021

श्रीमद्भागवत गीता

सुखमात्यन्तिकं यत्तद्‍बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम्‌।
 वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः॥

इन्द्रियों से अतीत, केवल शुद्ध हुई सूक्ष्म बुद्धि द्वारा ग्रहण करने योग्य जो अनन्त आनन्द है, उसको जिस अवस्था में अनुभव करता है, और जिस अवस्था में स्थित यह योगी परमात्मा के स्वरूप से विचलित होता ही नहीं
 ॥21॥

~ श्लोक 21 - अध्याय 6 - ध्यानयोग

सोमवार, 22 फ़रवरी 2021

श्रीमद्भागवत गीता

यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया।
 यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति॥

योग के अभ्यास से निरुद्ध चित्त जिस अवस्था में उपराम हो जाता है और जिस अवस्था में परमात्मा के ध्यान से शुद्ध हुई सूक्ष्म बुद्धि द्वारा परमात्मा को साक्षात करता हुआ सच्चिदानन्दघन परमात्मा में ही सन्तुष्ट रहता है
 ॥20॥

~ श्लोक 20 - अध्याय 6 - ध्यानयोग

रविवार, 21 फ़रवरी 2021

श्रीमद्भागवत गीता

यथा दीपो निवातस्थो नेंगते सोपमा स्मृता।
 योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः॥

जिस प्रकार वायुरहित स्थान में स्थित दीपक चलायमान नहीं होता, वैसी ही उपमा परमात्मा के ध्यान में लगे हुए योगी के जीते हुए चित्त की कही गई है
 ॥19॥

~ श्लोक 19 - अध्याय 6 - ध्यानयोग

श्रीमद्भागवत गीता

यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते।
 निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा॥

अत्यन्त वश में किया हुआ चित्त जिस काल में परमात्मा में ही भलीभाँति स्थित हो जाता है, उस काल में सम्पूर्ण भोगों से स्पृहारहित पुरुष योगयुक्त है, ऐसा कहा जाता है
 ॥18॥

~ श्लोक 18 - अध्याय 6 - ध्यानयोग

शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2021

श्रीमद्भागवत गीता

युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।
 युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा॥

दुःखों का नाश करने वाला योग तो यथायोग्य आहार-विहार करने वाले का, कर्मों में यथायोग्य चेष्टा करने वाले का और यथायोग्य सोने तथा जागने वाले का ही सिद्ध होता है
 ॥17॥

~ श्लोक 17 - अध्याय 6 - ध्यानयोग

गुरुवार, 18 फ़रवरी 2021

श्रीमद्भागवत गीता

नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः।
 न चाति स्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन॥

हे अर्जुन! यह योग न तो बहुत खाने वाले का, न बिलकुल न खाने वाले का, न बहुत शयन करने के स्वभाव वाले का और न सदा जागने वाले का ही सिद्ध होता है
 ॥16॥

~ श्लोक 16 - अध्याय 6 - ध्यानयोग

बुधवार, 17 फ़रवरी 2021

श्रीमद्भागवत गीता

युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानसः।
 शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति॥

वश में किए हुए मनवाला योगी इस प्रकार आत्मा को निरंतर मुझ परमेश्वर के स्वरूप में लगाता हुआ मुझमें रहने वाली परमानन्द की पराकाष्ठारूप शान्ति को प्राप्त होता है
 ॥15॥

~ श्लोक 15 - अध्याय 6 - ध्यानयोग

मंगलवार, 16 फ़रवरी 2021

श्रीमद्भागवत गीता

प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः।
 मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः॥

ब्रह्मचारी के व्रत में स्थित, भयरहित तथा भलीभाँति शांत अन्तःकरण वाला सावधान योगी मन को रोककर मुझमें चित्तवाला और मेरे परायण होकर स्थित होए
 ॥14॥

~ श्लोक 14 - अध्याय 6 - ध्यानयोग

सोमवार, 15 फ़रवरी 2021

श्रीमद्भागवत गीता

समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः।
 सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन्‌॥

काया, सिर और गले को समान एवं अचल धारण करके और स्थिर होकर, अपनी नासिका के अग्रभाग पर दृष्टि जमाकर, अन्य दिशाओं को न देखता हुआ
 ॥13॥

~ श्लोक 13 - अध्याय 6 - ध्यानयोग

रविवार, 14 फ़रवरी 2021

श्रीमद्भागवत गीता

तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः।
 उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये॥

उस आसन पर बैठकर चित्त और इन्द्रियों की क्रियाओं को वश में रखते हुए मन को एकाग्र करके अन्तःकरण की शुद्धि के लिए योग का अभ्यास करे
 ॥12॥

~ श्लोक 12 - अध्याय 6 - ध्यानयोग

शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2021

श्रीमद्भागवत गीता

( विस्तार से ध्यान योग का विषय ) 
 शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः।
 नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम्‌॥

शुद्ध भूमि में, जिसके ऊपर क्रमशः कुशा, मृगछाला और वस्त्र बिछे हैं, जो न बहुत ऊँचा है और न बहुत नीचा, ऐसे अपने आसन को स्थिर स्थापन करके
 ॥11॥

~ श्लोक 11 - अध्याय 6 - ध्यानयोग

बुधवार, 10 फ़रवरी 2021

श्रीमद्भागवत गीता

सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु।
 साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते॥

सुहृद् (स्वार्थ रहित सबका हित करने वाला), मित्र, वैरी, उदासीन (पक्षपातरहित), मध्यस्थ (दोनों ओर की भलाई चाहने वाला), द्वेष्य और बन्धुगणों में, धर्मात्माओं में और पापियों में भी समान भाव रखने वाला अत्यन्त श्रेष्ठ है
 ॥9॥

~ श्लोक 9 - अध्याय 6 - ध्यानयोग

मंगलवार, 9 फ़रवरी 2021

श्रीमद्भागवत गीता

ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः।
 युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकांचनः॥

जिसका अन्तःकरण ज्ञान-विज्ञान से तृप्त है, जिसकी स्थिति विकाररहित है, जिसकी इन्द्रियाँ भलीभाँति जीती हुई हैं और जिसके लिए मिट्टी, पत्थर और सुवर्ण समान हैं, वह योगी युक्त अर्थात भगवत्प्राप्त है, ऐसे कहा जाता है
 ॥8॥

~ श्लोक 8 - अध्याय 6 - ध्यानयोग

रविवार, 7 फ़रवरी 2021

श्रीमद्भागवत गीता

जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः।

 शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः॥


सरदी-गरमी और सुख-दुःखादि में तथा मान और अपमान में जिसके अन्तःकरण की वृत्तियाँ भलीभाँति शांत हैं, ऐसे स्वाधीन आत्मावाले पुरुष के ज्ञान में सच्चिदानन्दघन परमात्मा सम्यक्‌ प्रकार से स्थित है अर्थात उसके ज्ञान में परमात्मा के सिवा अन्य कुछ है ही नहीं

 ॥7॥


~ श्लोक 7 - अध्याय 6 - ध्यानयोग

शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2021

श्रीमद्भागवत गीता

बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः।
 अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत्‌॥

जिस जीवात्मा द्वारा मन और इन्द्रियों सहित शरीर जीता हुआ है, उस जीवात्मा का तो वह आप ही मित्र है और जिसके द्वारा मन तथा इन्द्रियों सहित शरीर नहीं जीता गया है, उसके लिए वह आप ही शत्रु के सदृश शत्रुता में बर्तता है
 ॥6॥

~ श्लोक 6 - अध्याय 6 - ध्यानयोग

गुरुवार, 4 फ़रवरी 2021

श्रीमद्भागवत गीता

( आत्म-उद्धार के लिए प्रेरणा और भगवत्प्राप्त पुरुष के लक्षण ) 
 उद्धरेदात्मनाऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्‌।
 आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥

अपने द्वारा अपना संसार-समुद्र से उद्धार करे और अपने को अधोगति में न डाले क्योंकि यह मनुष्य आप ही तो अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु है
 ॥5॥

~ श्लोक 5 - अध्याय 6 - ध्यानयोग

बुधवार, 3 फ़रवरी 2021

श्रीमद्भागवत गीता

यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते।
 सर्वसङ्‍कल्पसन्न्यासी योगारूढ़स्तदोच्यते॥

जिस काल में न तो इन्द्रियों के भोगों में और न कर्मों में ही आसक्त होता है, उस काल में सर्वसंकल्पों का त्यागी पुरुष योगारूढ़ कहा जाता है
 ॥4॥

~ श्लोक 4 - अध्याय 6 - ध्यानयोग

मंगलवार, 2 फ़रवरी 2021

श्रीमद्भागवत गीता

आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते।
 योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते॥

योग में आरूढ़ होने की इच्छा वाले मननशील पुरुष के लिए योग की प्राप्ति में निष्काम भाव से कर्म करना ही हेतु कहा जाता है और योगारूढ़ हो जाने पर उस योगारूढ़ पुरुष का जो सर्वसंकल्पों का अभाव है, वही कल्याण में हेतु कहा जाता है
 ॥3॥

~ श्लोक 3 - अध्याय 6 - ध्यानयोग

सोमवार, 1 फ़रवरी 2021

श्रीमद्भागवत गीता

यं सन्न्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव।
 न ह्यसन्न्यस्तसङ्‍कल्पो योगी भवति कश्चन॥

हे अर्जुन! जिसको संन्यास (गीता अध्याय 3 श्लोक 3 की टिप्पणी में इसका खुलासा अर्थ लिखा है।) ऐसा कहते हैं, उसी को तू योग (गीता अध्याय 3 श्लोक 3 की टिप्पणी में इसका खुलासा अर्थ लिखा है।) जान क्योंकि संकल्पों का त्याग न करने वाला कोई भी पुरुष योगी नहीं होता
 ॥2॥

~ श्लोक 2 - अध्याय 6 - ध्यानयोग

रविवार, 31 जनवरी 2021

श्रीमद्भागवत गीता

( कर्मयोग का विषय और योगारूढ़ पुरुष के लक्षण ) 
 श्रीभगवानुवाच
 अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः।
 स सन्न्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः॥

श्री भगवान बोले- जो पुरुष कर्मफल का आश्रय न लेकर करने योग्य कर्म करता है, वह संन्यासी तथा योगी है और केवल अग्नि का त्याग करने वाला संन्यासी नहीं है तथा केवल क्रियाओं का त्याग करने वाला योगी नहीं है
 ॥1॥

~ श्लोक 1 - अध्याय 6 - ध्यानयोग

शुक्रवार, 29 जनवरी 2021

श्रीमद्भागवत गीता

भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम्‌।
 सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति॥

मेरा भक्त मुझको सब यज्ञ और तपों का भोगने वाला, सम्पूर्ण लोकों के ईश्वरों का भी ईश्वर तथा सम्पूर्ण भूत-प्राणियों का सुहृद् अर्थात स्वार्थरहित दयालु और प्रेमी, ऐसा तत्व से जानकर शान्ति को प्राप्त होता है
 ॥29॥ 
 
 ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे कर्मसंन्यासयोगो नाम पंचमोऽध्यायः
 ॥5॥

~ श्लोक 29 - अध्याय 5 - कर्मयोग-कृष्णभावनाभावित कर्म

गुरुवार, 28 जनवरी 2021

श्रीमद्भागवत गीता

( भक्ति सहित ध्यानयोग का वर्णन ) 
 स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः।
 प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ॥
 यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायणः।
 विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः॥

बाहर के विषय-भोगों को न चिन्तन करता हुआ बाहर ही निकालकर और नेत्रों की दृष्टि को भृकुटी के बीच में स्थित करके तथा नासिका में विचरने वाले प्राण और अपानवायु को सम करके, जिसकी इन्द्रियाँ मन और बुद्धि जीती हुई हैं, ऐसा जो मोक्षपरायण मुनि (परमेश्वर के स्वरूप का निरन्तर मनन करने वाला।) इच्छा, भय और क्रोध से रहित हो गया है, वह सदा मुक्त ही है
 ॥27-28॥

~ श्लोक 27, 28 - अध्याय 5 - कर्मयोग-कृष्णभावनाभावित कर्म

बुधवार, 27 जनवरी 2021

श्रीमद्भागवत गीता

कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम्‌।
 अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम्‌॥

काम-क्रोध से रहित, जीते हुए चित्तवाले, परब्रह्म परमात्मा का साक्षात्कार किए हुए ज्ञानी पुरुषों के लिए सब ओर से शांत परब्रह्म परमात्मा ही परिपूर्ण है
 ॥26॥

~ श्लोक 26 - अध्याय 5 - कर्मयोग-कृष्णभावनाभावित कर्म

सोमवार, 25 जनवरी 2021

श्रीमद्भागवत गीता

लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः।
 छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः॥

जिनके सब पाप नष्ट हो गए हैं, जिनके सब संशय ज्ञान द्वारा निवृत्त हो गए हैं, जो सम्पूर्ण प्राणियों के हित में रत हैं और जिनका जीता हुआ मन निश्चलभाव से परमात्मा में स्थित है, वे ब्रह्मवेत्ता पुरुष शांत ब्रह्म को प्राप्त होते हैं
 ॥25॥

~ श्लोक 25 - अध्याय 5 - कर्मयोग-कृष्णभावनाभावित कर्म

रविवार, 24 जनवरी 2021

श्रीमद्भागवत गीता

योऽन्तःसुखोऽन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव यः।
 स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति॥

जो पुरुष अन्तरात्मा में ही सुखवाला है, आत्मा में ही रमण करने वाला है तथा जो आत्मा में ही ज्ञान वाला है, वह सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमात्मा के साथ एकीभाव को प्राप्त सांख्य योगी शांत ब्रह्म को प्राप्त होता है
 ॥24॥

~ श्लोक 24 - अध्याय 5 - कर्मयोग-कृष्णभावनाभावित कर्म

शुक्रवार, 22 जनवरी 2021

श्रीमद्भागवत गीता

शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात्‌।
 कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः॥

जो साधक इस मनुष्य शरीर में, शरीर का नाश होने से पहले-पहले ही काम-क्रोध से उत्पन्न होने वाले वेग को सहन करने में समर्थ हो जाता है, वही पुरुष योगी है और वही सुखी है
 ॥23॥

~ श्लोक 23 - अध्याय 5 - कर्मयोग-कृष्णभावनाभावित कर्म

गुरुवार, 21 जनवरी 2021

श्रीमद्भागवत गीता

ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते।
 आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः॥

जो ये इन्द्रिय तथा विषयों के संयोग से उत्पन्न होने वाले सब भोग हैं, यद्यपि विषयी पुरुषों को सुखरूप भासते हैं, तो भी दुःख के ही हेतु हैं और आदि-अन्तवाले अर्थात अनित्य हैं। इसलिए हे अर्जुन! बुद्धिमान विवेकी पुरुष उनमें नहीं रमता
 ॥22॥

~ श्लोक 22 - अध्याय 5 - कर्मयोग-कृष्णभावनाभावित कर्म

बुधवार, 20 जनवरी 2021

श्रीमद्भागवत गीता

बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम्‌।
 स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते॥

बाहर के विषयों में आसक्तिरहित अन्तःकरण वाला साधक आत्मा में स्थित जो ध्यानजनित सात्विक आनंद है, उसको प्राप्त होता है, तदनन्तर वह सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमात्मा के ध्यानरूप योग में अभिन्न भाव से स्थित पुरुष अक्षय आनन्द का अनुभव करता है
 ॥21॥

~ श्लोक 21 - अध्याय 5 - कर्मयोग-कृष्णभावनाभावित कर्म

मंगलवार, 19 जनवरी 2021

श्रीमद्भागवत गीता

न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम्‌।
 स्थिरबुद्धिरसम्मूढो ब्रह्मविद् ब्रह्मणि स्थितः॥

जो पुरुष प्रिय को प्राप्त होकर हर्षित नहीं हो और अप्रिय को प्राप्त होकर उद्विग्न न हो, वह स्थिरबुद्धि, संशयरहित, ब्रह्मवेत्ता पुरुष सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमात्मा में एकीभाव से नित्य स्थित है
 ॥20॥

~ श्लोक 20 - अध्याय 5 - कर्मयोग-कृष्णभावनाभावित कर्म

सोमवार, 18 जनवरी 2021

श्रीमद्भागवत गीता

इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः।
 निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद् ब्रह्मणि ते स्थिताः॥

जिनका मन समभाव में स्थित है, उनके द्वारा इस जीवित अवस्था में ही सम्पूर्ण संसार जीत लिया गया है क्योंकि सच्चिदानन्दघन परमात्मा निर्दोष और सम है, इससे वे सच्चिदानन्दघन परमात्मा में ही स्थित हैं
 ॥19॥

~ श्लोक 19 - अध्याय 5 - कर्मयोग-कृष्णभावनाभावित कर्म

रविवार, 17 जनवरी 2021

श्रीमद्भागवत गीता

विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि।
 शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः॥

वे ज्ञानीजन विद्या और विनययुक्त ब्राह्मण में तथा गौ, हाथी, कुत्ते और चाण्डाल में भी समदर्शी (इसका विस्तार गीता अध्याय 6 श्लोक 32 की टिप्पणी में देखना चाहिए।) ही होते हैं
 ॥18॥

~ श्लोक 18 - अध्याय 5 - कर्मयोग-कृष्णभावनाभावित कर्म

गुरुवार, 14 जनवरी 2021

श्रीमद्भागवत गीता

तद्‍बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः।
 गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः॥

जिनका मन तद्रूप हो रहा है, जिनकी बुद्धि तद्रूप हो रही है और सच्चिदानन्दघन परमात्मा में ही जिनकी निरंतर एकीभाव से स्थिति है, ऐसे तत्परायण पुरुष ज्ञान द्वारा पापरहित होकर अपुनरावृत्ति को अर्थात परमगति को प्राप्त होते हैं
 ॥17॥

~ श्लोक 17 - अध्याय 5 - कर्मयोग-कृष्णभावनाभावित कर्म

मंगलवार, 12 जनवरी 2021

श्रीमद्भागवत गीता

ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः।
 तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम्‌॥

परन्तु जिनका वह अज्ञान परमात्मा के तत्व ज्ञान द्वारा नष्ट कर दिया गया है, उनका वह ज्ञान सूर्य के सदृश उस सच्चिदानन्दघन परमात्मा को प्रकाशित कर देता है
 ॥16॥

~ श्लोक 16 - अध्याय 5 - कर्मयोग-कृष्णभावनाभावित कर्म

सोमवार, 11 जनवरी 2021

श्रीमद्भागवत गीता

नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः।
 अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः॥

सर्वव्यापी परमेश्वर भी न किसी के पाप कर्म को और न किसी के शुभकर्म को ही ग्रहण करता है, किन्तु अज्ञान द्वारा ज्ञान ढँका हुआ है, उसी से सब अज्ञानी मनुष्य मोहित हो रहे हैं
 ॥15॥

~ श्लोक 15 - अध्याय 5 - कर्मयोग-कृष्णभावनाभावित कर्म

रविवार, 10 जनवरी 2021

श्रीमद्भागवत गीता

न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः।
 न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते।

परमेश्वर मनुष्यों के न तो कर्तापन की, न कर्मों की और न कर्मफल के संयोग की रचना करते हैं, किन्तु स्वभाव ही बर्त रहा है
 ॥14॥

~ श्लोक 14 - अध्याय 5 - कर्मयोग-कृष्णभावनाभावित कर्म

शुक्रवार, 8 जनवरी 2021

श्रीमद्भागवत गीता

(ज्ञानयोग का विषय ) 
 सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी।
 नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन्‌॥

अन्तःकरण जिसके वश में है, ऐसा सांख्य योग का आचरण करने वाला पुरुष न करता हुआ और न करवाता हुआ ही नवद्वारों वाले शरीर रूप घर में सब कर्मों को मन से त्यागकर आनंदपूर्वक सच्चिदानंदघन परमात्मा के स्वरूप में स्थित रहता है
 ॥13॥

~ श्लोक 13 - अध्याय 5 - कर्मयोग-कृष्णभावनाभावित कर्म

गुरुवार, 7 जनवरी 2021

श्रीमद्भागवत गीता

युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम्‌।
 अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते॥

कर्मयोगी कर्मों के फल का त्याग करके भगवत्प्राप्ति रूप शान्ति को प्राप्त होता है और सकामपुरुष कामना की प्रेरणा से फल में आसक्त होकर बँधता है
 ॥12॥

~ श्लोक 12 - अध्याय 5 - कर्मयोग-कृष्णभावनाभावित कर्म

बुधवार, 6 जनवरी 2021

श्रीमद्भागवत गीता

कायेन मनसा बुद्धया केवलैरिन्द्रियैरपि।
 योगिनः कर्म कुर्वन्ति संग त्यक्त्वात्मशुद्धये॥

कर्मयोगी ममत्वबुद्धिरहित केवल इन्द्रिय, मन, बुद्धि और शरीर द्वारा भी आसक्ति को त्याग कर अन्तःकरण की शुद्धि के लिए कर्म करते हैं
 ॥11॥

~ श्लोक 11 - अध्याय 5 - कर्मयोग-कृष्णभावनाभावित कर्म

मंगलवार, 5 जनवरी 2021

श्रीमद्भागवत गीता

नैव किंचित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्ववित्‌।
 पश्यञ्श्रृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपंश्वसन्‌॥
 प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि॥
 इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन्‌॥

तत्व को जानने वाला सांख्ययोगी तो देखता हुआ, सुनता हुआ, स्पर्श करता हुआ, सूँघता हुआ, भोजन करता हुआ, गमन करता हुआ, सोता हुआ, श्वास लेता हुआ, बोलता हुआ, त्यागता हुआ, ग्रहण करता हुआ तथा आँखों को खोलता और मूँदता हुआ भी, सब इन्द्रियाँ अपने-अपने अर्थों में बरत रही हैं- इस प्रकार समझकर निःसंदेह ऐसा मानें कि मैं कुछ भी नहीं करता हूँ
 ॥8-9॥

~ श्लोक 8, 9 - अध्याय 5 - कर्मयोग-कृष्णभावनाभावित कर्म

सोमवार, 4 जनवरी 2021

श्रीमद्भागवत गीता

( सांख्ययोगी और कर्मयोगी के लक्षण और उनकी महिमा ) 
 योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः।
 सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते॥

जिसका मन अपने वश में है, जो जितेन्द्रिय एवं विशुद्ध अन्तःकरण वाला है और सम्पूर्ण प्राणियों का आत्मरूप परमात्मा ही जिसका आत्मा है, ऐसा कर्मयोगी कर्म करता हुआ भी लिप्त नहीं होता
 ॥7॥

~ श्लोक 7 - अध्याय 5 - कर्मयोग-कृष्णभावनाभावित कर्म

रविवार, 3 जनवरी 2021

श्रीमद्भागवत गीता

सन्न्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः।
 योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म नचिरेणाधिगच्छति॥

परन्तु हे अर्जुन! कर्मयोग के बिना संन्यास अर्थात्‌ मन, इन्द्रिय और शरीर द्वारा होने वाले सम्पूर्ण कर्मों में कर्तापन का त्याग प्राप्त होना कठिन है और भगवत्स्वरूप को मनन करने वाला कर्मयोगी परब्रह्म परमात्मा को शीघ्र ही प्राप्त हो जाता है
 ॥6॥

~ श्लोक 6 - अध्याय 5 - कर्मयोग-कृष्णभावनाभावित कर्म

शुक्रवार, 1 जनवरी 2021

श्रीमद्भागवत गीता

यत्साङ्‍ख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्यौगैरपि गम्यते।
 एकं साङ्‍ख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति॥

ज्ञान योगियों द्वारा जो परमधाम प्राप्त किया जाता है, कर्मयोगियों द्वारा भी वही प्राप्त किया जाता है। इसलिए जो पुरुष ज्ञानयोग और कर्मयोग को फलरूप में एक देखता है, वही यथार्थ देखता है
 ॥5॥

~ श्लोक 5 - अध्याय 5 - कर्मयोग-कृष्णभावनाभावित कर्म