रविवार, 31 जनवरी 2021

श्रीमद्भागवत गीता

( कर्मयोग का विषय और योगारूढ़ पुरुष के लक्षण ) 
 श्रीभगवानुवाच
 अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः।
 स सन्न्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः॥

श्री भगवान बोले- जो पुरुष कर्मफल का आश्रय न लेकर करने योग्य कर्म करता है, वह संन्यासी तथा योगी है और केवल अग्नि का त्याग करने वाला संन्यासी नहीं है तथा केवल क्रियाओं का त्याग करने वाला योगी नहीं है
 ॥1॥

~ श्लोक 1 - अध्याय 6 - ध्यानयोग

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