शुक्रवार, 31 जनवरी 2020

Shreemad Bhagwat Gita

येषामर्थे काङक्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च।
 त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च॥

हमें जिनके लिए राज्य, भोग और सुखादि अभीष्ट हैं, वे ही ये सब धन और जीवन की आशा को त्यागकर युद्ध में खड़े हैं
 ॥33॥

~ श्लोक 33 - अध्याय 1

गुरुवार, 30 जनवरी 2020

अनमोल वचन

विद्यार्थी जीवन के दो शीर्ष !
पहला माता-पिता दूसरा गुरु- शिक्षक!!

श्रीमद्भागवत गीता

न काङ्‍क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च।
 किं नो राज्येन गोविंद किं भोगैर्जीवितेन वा॥


हे कृष्ण! मैं न तो विजय चाहता हूँ और न राज्य तथा सुखों को ही। हे गोविंद! हमें ऐसे राज्य से क्या प्रयोजन है अथवा ऐसे भोगों से और जीवन से भी क्या लाभ है?
 ॥32॥

~ श्लोक 32 - अध्याय 1

बुधवार, 29 जनवरी 2020

मद्भागवत गीता

निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव।
 न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे॥

हे केशव! मैं लक्षणों को भी विपरीत ही देख रहा हूँ तथा युद्ध में स्वजन-समुदाय को मारकर कल्याण भी नहीं देखता
 ॥31॥

~ श्लोक 31 - अध्याय 1

मंगलवार, 28 जनवरी 2020

श्रीमद्भागवत गीता

गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्वक्चैव परिदह्यते।
 न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः॥

हाथ से गांडीव धनुष गिर रहा है और त्वचा भी बहुत जल रही है तथा मेरा मन भ्रमित-सा हो रहा है, इसलिए मैं खड़ा रहने को भी समर्थ नहीं हूँ
 ॥30॥

~ श्लोक 30 - अध्याय 1 

सोमवार, 27 जनवरी 2020

श्रीमद्भगवत गीता

(मोह से व्याप्त हुए अर्जुन के कायरता, स्नेह और शोकयुक्त वचन ) 
 अर्जुन उवाच
 दृष्टेवमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्‌॥
 सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति। 
 वेपथुश्च शरीरे में रोमहर्षश्च जायते॥

अर्जुन बोले- हे कृष्ण! युद्ध क्षेत्र में डटे हुए युद्ध के अभिलाषी इस स्वजनसमुदाय को देखकर मेरे अंग शिथिल हुए जा रहे हैं और मुख सूखा जा रहा है तथा मेरे शरीर में कम्प एवं रोमांच हो रहा है
 ॥28वें का उत्तरार्ध और 29॥

~ श्लोक 28, 29 - अध्याय 1

रविवार, 26 जनवरी 2020

Shrimad Bhagwat Geeta

तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान्‌ बन्धूनवस्थितान्‌॥
 कृपया परयाविष्टो विषीदत्रिदमब्रवीत्‌।

उन उपस्थित सम्पूर्ण बंधुओं को देखकर वे कुंतीपुत्र अर्जुन अत्यन्त करुणा से युक्त होकर शोक करते हुए यह वचन बोले। 
 ॥27वें का उत्तरार्ध और 28वें का पूर्वार्ध॥

~ श्लोक 27 - अध्याय 1

शनिवार, 25 जनवरी 2020

श्रीमद् भागवत गीता

तत्रापश्यत्स्थितान्‌ पार्थः पितृनथ पितामहान्‌।
 आचार्यान्मातुलान्भ्रातृन्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा॥
 श्वशुरान्‌ सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि।

इसके बाद पृथापुत्र अर्जुन ने उन दोनों ही सेनाओं में स्थित ताऊ-चाचों को, दादों-परदादों को, गुरुओं को, मामाओं को, भाइयों को, पुत्रों को, पौत्रों को तथा मित्रों को, ससुरों को और सुहृदों को भी देखा
 ॥26 और 27वें का पूर्वार्ध॥

~ श्लोक 26 - अध्याय 1

शुक्रवार, 24 जनवरी 2020

shrimad bhagwat Geeta

संजय उवाचः
 एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत।
 सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम्‌॥
 भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम्‌।
 उवाच पार्थ पश्यैतान्‌ समवेतान्‌ कुरूनिति॥

संजय बोले- हे धृतराष्ट्र! अर्जुन द्वारा कहे अनुसार महाराज श्रीकृष्णचंद्र ने दोनों सेनाओं के बीच में भीष्म और द्रोणाचार्य के सामने तथा सम्पूर्ण राजाओं के सामने उत्तम रथ को खड़ा कर इस प्रकार कहा कि हे पार्थ! युद्ध के लिए जुटे हुए इन कौरवों को देख
 ॥24-25॥

~ श्लोक 24, 25 - अध्याय 1

बुधवार, 22 जनवरी 2020

shrimad bhagwat Geeta

योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः।
 धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः॥

दुर्बुद्धि दुर्योधन का युद्ध में हित चाहने वाले जो-जो ये राजा लोग इस सेना में आए हैं, इन युद्ध करने वालों को मैं देखूँगा
 ॥23॥

~ श्लोक 23 - अध्याय 1

मंगलवार, 21 जनवरी 2020

shrimad bhagwat Geeta

यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान्‌।
 कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन् रणसमुद्यमे॥

और जब तक कि मैं युद्ध क्षेत्र में डटे हुए युद्ध के अभिलाषी इन विपक्षी योद्धाओं को भली प्रकार देख न लूँ कि इस युद्ध रूप व्यापार में मुझे किन-किन के साथ युद्ध करना योग्य है, तब तक उसे खड़ा रखिए
 ॥22॥

~ श्लोक 22 - अध्याय 1

सोमवार, 20 जनवरी 2020

shrimad bhagwat Geeta

(अर्जुन द्वारा सेना-निरीक्षण का प्रसंग)
 अथ व्यवस्थितान्दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान्‌ कपिध्वजः।
 प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः॥ 
 हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते। 
 
 अर्जुन उवाचः 
 सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत॥

हे राजन्‌! इसके बाद कपिध्वज अर्जुन ने मोर्चा बाँधकर डटे हुए धृतराष्ट्र-संबंधियों को देखकर, उस शस्त्र चलने की तैयारी के समय धनुष उठाकर हृषीकेश श्रीकृष्ण महाराज से यह वचन कहा- हे अच्युत! मेरे रथ को दोनों सेनाओं के बीच में खड़ा कीजिए
 ॥20-21॥

~ श्लोक 20, 21 - अध्याय 1 

रविवार, 19 जनवरी 2020

shrimad bhagwat Geeta

स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत्‌।
 नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलो व्यनुनादयन्‌॥

और उस भयानक शब्द ने आकाश और पृथ्वी को भी गुंजाते हुए धार्तराष्ट्रों के अर्थात आपके पक्षवालों के हृदय विदीर्ण कर दिए
 ॥19॥

~ श्लोक 19 - अध्याय 1

शनिवार, 18 जनवरी 2020

shrimad bhagwat Geeta

काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः।
 धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः॥
 द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते।
 सौभद्रश्च महाबाहुः शंखान्दध्मुः पृथक्पृथक्‌॥

श्रेष्ठ धनुष वाले काशिराज और महारथी शिखण्डी एवं धृष्टद्युम्न तथा राजा विराट और अजेय सात्यकि, राजा द्रुपद एवं द्रौपदी के पाँचों पुत्र और बड़ी भुजावाले सुभद्रा पुत्र अभिमन्यु- इन सभी ने, हे राजन्‌! सब ओर से अलग-अलग शंख बजाए
 ॥17-18॥

~ श्लोक 17, 18 - अध्याय 1

गुरुवार, 16 जनवरी 2020

shrimad bhagwat Geeta

अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः।
 नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ॥

कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर ने अनन्तविजय नामक और नकुल तथा सहदेव ने सुघोष और मणिपुष्पक नामक शंख बजाए
 ॥16॥

~ श्लोक 16 - अध्याय 1

बुधवार, 15 जनवरी 2020

shrimad bhagwat Geeta

पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जयः।
 पौण्ड्रं दध्मौ महाशंख भीमकर्मा वृकोदरः॥

श्रीकृष्ण महाराज ने पाञ्चजन्य नामक, अर्जुन ने देवदत्त नामक और भयानक कर्मवाले भीमसेन ने पौण्ड्र नामक महाशंख बजाया
 ॥15॥

~ श्लोक 15 - अध्याय 1

मंगलवार, 14 जनवरी 2020

shrimad bhagwat Geeta

ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ।
 माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शंखौ प्रदध्मतुः॥

इसके अनन्तर सफेद घोड़ों से युक्त उत्तम रथ में बैठे हुए श्रीकृष्ण महाराज और अर्जुन ने भी अलौकिक शंख बजाए
 ॥14॥

~ श्लोक 14 - अध्याय 1

सोमवार, 13 जनवरी 2020

shrimadbhagwat Geeta

ततः शंखाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः।
 सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत्‌॥

इसके पश्चात शंख और नगाड़े तथा ढोल, मृदंग और नरसिंघे आदि बाजे एक साथ ही बज उठे। उनका वह शब्द बड़ा भयंकर हुआ
 ॥13॥

~ श्लोक 13 - अध्याय 1

रविवार, 12 जनवरी 2020

shrimadbhagwat Geeta

(दोनों सेनाओं की शंख-ध्वनि का कथन) 
 तस्य सञ्जनयन्हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः।
 सिंहनादं विनद्योच्चैः शंख दध्मो प्रतापवान्‌॥

कौरवों में वृद्ध बड़े प्रतापी पितामह भीष्म ने उस दुर्योधन के हृदय में हर्ष उत्पन्न करते हुए उच्च स्वर से सिंह की दहाड़ के समान गरजकर शंख बजाया
 ॥12॥

~ श्लोक 12 - अध्याय 1

शुक्रवार, 10 जनवरी 2020

shrimad bhagwat Geeta

अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः।
 भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि॥

इसलिए सब मोर्चों पर अपनी-अपनी जगह स्थित रहते हुए आप लोग सभी निःसंदेह भीष्म पितामह की ही सब ओर से रक्षा करें
 ॥11॥

~ श्लोक 11 - अध्याय 1

बुधवार, 8 जनवरी 2020

श्रीमदभागवत गीता

अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः।
 भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि॥

इसलिए सब मोर्चों पर अपनी-अपनी जगह स्थित रहते हुए आप लोग सभी निःसंदेह भीष्म पितामह की ही सब ओर से रक्षा करें
 ॥11॥

~ श्लोक 11 - अध्याय 1

मंगलवार, 7 जनवरी 2020

श्रीमद्भागवत गीता

अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम्‌।
 पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम्‌॥

भीष्म पितामह द्वारा रक्षित हमारी वह सेना सब प्रकार से अजेय है और भीम द्वारा रक्षित इन लोगों की यह सेना जीतने में सुगम है
 
 ॥10॥

~ श्लोक 10 - अध्याय 1

सोमवार, 6 जनवरी 2020

श्रीमद्भागवत गीता

अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः।
 नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः॥

और भी मेरे लिए जीवन की आशा त्याग देने वाले बहुत-से शूरवीर अनेक प्रकार के शस्त्रास्त्रों से सुसज्जित और सब-के-सब युद्ध में चतुर हैं
 ॥9॥

~ श्लोक 9 - अध्याय 1

शुक्रवार, 3 जनवरी 2020

shrimad bhagwat Geeta

भवान्भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिञ्जयः।
 अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च॥

आप-द्रोणाचार्य और पितामह भीष्म तथा कर्ण और संग्रामविजयी कृपाचार्य तथा वैसे ही अश्वत्थामा, विकर्ण और सोमदत्त का पुत्र भूरिश्रवा
 ॥8॥

~ श्लोक 8 - अध्याय 1

गुरुवार, 2 जनवरी 2020

shrimad bhagwat Geeta

अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम।
 नायका मम सैन्यस्य सञ्ज्ञार्थं तान्ब्रवीमि ते॥

हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! अपने पक्ष में भी जो प्रधान हैं, उनको आप समझ लीजिए। आपकी जानकारी के लिए मेरी सेना के जो-जो सेनापति हैं, उनको बतलाता हूँ
 ॥7॥

~ श्लोक 7 - अध्याय 1