गुरुवार, 30 जुलाई 2020

श्रीमद्भागवत गीता

त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन।
 निर्द्वन्द्वो नित्यसत्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्‌॥

हे अर्जुन! वेद उपर्युक्त प्रकार से तीनों गुणों के कार्य रूप समस्त भोगों एवं उनके साधनों का प्रतिपादन करने वाले हैं, इसलिए तू उन भोगों एवं उनके साधनों में आसक्तिहीन, हर्ष-शोकादि द्वंद्वों से रहित, नित्यवस्तु परमात्मा में स्थित योग (अप्राप्त की प्राप्ति का नाम 'योग' है।) क्षेम (प्राप्त वस्तु की रक्षा का नाम 'क्षेम' है।) को न चाहने वाला और स्वाधीन अन्तःकरण वाला हो
 ॥45॥
~ श्लोक 45 - अध्याय 2

बुधवार, 29 जुलाई 2020

श्रीमद्भागवत गीता

यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः।
 वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः॥
 कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम्‌।
 क्रियाविश्लेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति॥
 भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम्‌।
 व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते॥

हे अर्जुन! जो भोगों में तन्मय हो रहे हैं, जो कर्मफल के प्रशंसक वेदवाक्यों में ही प्रीति रखते हैं, जिनकी बुद्धि में स्वर्ग ही परम प्राप्य वस्तु है और जो स्वर्ग से बढ़कर दूसरी कोई वस्तु ही नहीं है- ऐसा कहने वाले हैं, वे अविवेकीजन इस प्रकार की जिस पुष्पित अर्थात्‌ दिखाऊ शोभायुक्त वाणी को कहा करते हैं, जो कि जन्मरूप कर्मफल देने वाली एवं भोग तथा ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिए नाना प्रकार की बहुत-सी क्रियाओं का वर्णन करने वाली है, उस वाणी द्वारा जिनका चित्त हर लिया गया है, जो भोग और ऐश्वर्य में अत्यन्त आसक्त हैं, उन पुरुषों की परमात्मा में निश्चियात्मिका बुद्धि नहीं होती
 ॥42-44॥

~ श्लोक 42, 43, 44 - अध्याय 2 - गीता का सार

मंगलवार, 28 जुलाई 2020

श्रीमद्भागवत गीता

व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन।
 बहुशाका ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम्‌॥

हे अर्जुन! इस कर्मयोग में निश्चयात्मिका बुद्धि एक ही होती है, किन्तु अस्थिर विचार वाले विवेकहीन सकाम मनुष्यों की बुद्धियाँ निश्चय ही बहुत भेदों वाली और अनन्त होती हैं
 ॥41॥

~ श्लोक 41 - अध्याय 2 - गीता का सार

सोमवार, 27 जुलाई 2020

श्रीमद्भागवत गीता

यनेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवातो न विद्यते।
 स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्‌॥

इस कर्मयोग में आरंभ का अर्थात बीज का नाश नहीं है और उलटा फलरूप दोष भी नहीं है, बल्कि इस कर्मयोग रूप धर्म का थोड़ा-सा भी साधन जन्म-मृत्यु रूप महान भय से रक्षा कर लेता है
 ॥40॥

~ श्लोक 40 - अध्याय 2 - गीता का सार

रविवार, 26 जुलाई 2020

श्रीमद्भागवत गीता

( कर्मयोग का विषय )
 एषा तेऽभिहिता साङ्‍ख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां श्रृणु।
 बुद्ध्‌या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि॥

हे पार्थ! यह बुद्धि तेरे लिए ज्ञानयोग के विषय में कही गई और अब तू इसको कर्मयोग के (अध्याय 3 श्लोक 3 की टिप्पणी में इसका विस्तार देखें।) विषय में सुन- जिस बुद्धि से युक्त हुआ तू कर्मों के बंधन को भली-भाँति त्याग देगा अर्थात सर्वथा नष्ट कर डालेगा
 ॥39॥

~ श्लोक 39 - अध्याय 2

शुक्रवार, 24 जुलाई 2020

श्रीमद्भागवत गीता

सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ।
 ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि॥

जय-पराजय, लाभ-हानि और सुख-दुख को समान समझकर, उसके बाद युद्ध के लिए तैयार हो जा, इस प्रकार युद्ध करने से तू पाप को नहीं प्राप्त होगा
 ॥38॥

~ श्लोक 38 - अध्याय 2 - गीता का सार

गुरुवार, 23 जुलाई 2020

श्रीमद्भागवत गीता

हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्‌।
 तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः॥

या तो तू युद्ध में मारा जाकर स्वर्ग को प्राप्त होगा अथवा संग्राम में जीतकर पृथ्वी का राज्य भोगेगा। इस कारण हे अर्जुन! तू युद्ध के लिए निश्चय करके खड़ा हो जा
 ॥37॥

~ श्लोक 37 - अध्याय 2 - गीता का सार

बुधवार, 22 जुलाई 2020

श्रीमद्भागवत गीता

अवाच्यवादांश्च बहून्‌ वदिष्यन्ति तवाहिताः।
 निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम्‌॥

तेरे वैरी लोग तेरे सामर्थ्य की निंदा करते हुए तुझे बहुत से न कहने योग्य वचन भी कहेंगे, उससे अधिक दुःख और क्या होगा?
 ॥36॥

~ श्लोक 36 - अध्याय 2

मंगलवार, 21 जुलाई 2020

श्रीमद्भागवत गीता

भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः।
 येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम्‌॥

और जिनकी दृष्टि में तू पहले बहुत सम्मानित होकर अब लघुता को प्राप्त होगा, वे महारथी लोग तुझे भय के कारण युद्ध से हटा हुआ मानेंगे
 ॥35॥

~ श्लोक 35 - अध्याय 2

रविवार, 19 जुलाई 2020

श्रीमद्भागवत गीता

अकीर्तिं चापि भूतानि
 कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम्‌।
 सम्भावितस्य चाकीर्ति-
 र्मरणादतिरिच्यते॥

तथा सब लोग तेरी बहुत काल तक रहने वाली अपकीर्ति का भी कथन करेंगे और माननीय पुरुष के लिए अपकीर्ति मरण से भी बढ़कर है
 ॥34॥

~ श्लोक 34 - अध्याय 2 - गीता का सार

शनिवार, 18 जुलाई 2020

श्रीमद्भागवत गीता

अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं सङ्‍ग्रामं न करिष्यसि।
 ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि॥

किन्तु यदि तू इस धर्मयुक्त युद्ध को नहीं करेगा तो स्वधर्म और कीर्ति को खोकर पाप को प्राप्त होगा 
 ॥33॥

~ श्लोक 33 - अध्याय 2 - गीता का सार

शुक्रवार, 17 जुलाई 2020

श्रीमद्भागवत गीता

यदृच्छया चोपपन्नां स्वर्गद्वारमपावृतम्‌।
 सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम्‌॥

हे पार्थ! अपने-आप प्राप्त हुए और खुले हुए स्वर्ग के द्वार रूप इस प्रकार के युद्ध को भाग्यवान क्षत्रिय लोग ही पाते हैं
 ॥32॥

~ श्लोक 32 - अध्याय 2 - गीता का सार

रविवार, 12 जुलाई 2020

श्रीमद्भागवत गीता

( क्षत्रिय धर्म के अनुसार युद्ध करने की आवश्यकता का निरूपण )स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि।
 धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते॥

तथा अपने धर्म को देखकर भी तू भय करने योग्य नहीं है अर्थात्‌ तुझे भय नहीं करना चाहिए क्योंकि क्षत्रिय के लिए धर्मयुक्त युद्ध से बढ़कर दूसरा कोई कल्याणकारी कर्तव्य नहीं है
 ॥31॥

~ श्लोक 31 - अध्याय 2 - गीता का सार

शनिवार, 11 जुलाई 2020

श्रीमद्भागवत गीता

देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत।
 तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि॥

हे अर्जुन! यह आत्मा सबके शरीर में सदा ही अवध्य (जिसका वध नहीं किया जा सके) है। इस कारण सम्पूर्ण प्राणियों के लिए तू शोक करने योग्य नहीं है
 ॥30॥

~ श्लोक 30 - अध्याय 2 - गीता का सार

शुक्रवार, 10 जुलाई 2020

श्रीमद्भागवत गीता

आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेन-
 माश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः।
 आश्चर्यवच्चैनमन्यः श्रृणोति
 श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित्‌॥

कोई एक महापुरुष ही इस आत्मा को आश्चर्य की भाँति देखता है और वैसे ही दूसरा कोई महापुरुष ही इसके तत्व का आश्चर्य की भाँति वर्णन करता है तथा दूसरा कोई अधिकारी पुरुष ही इसे आश्चर्य की भाँति सुनता है और कोई-कोई तो सुनकर भी इसको नहीं जानता
 ॥29॥

~ श्लोक 29 - अध्याय 2 - गीता का सार

बुधवार, 8 जुलाई 2020

श्रीमद्भागवत गीता

अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत।
 अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना॥

हे अर्जुन! सम्पूर्ण प्राणी जन्म से पहले अप्रकट थे और मरने के बाद भी अप्रकट हो जाने वाले हैं, केवल बीच में ही प्रकट हैं, फिर ऐसी स्थिति में क्या शोक करना है?
 ॥28॥

~ श्लोक 28 - अध्याय 2 - गीता का सार

मंगलवार, 7 जुलाई 2020

श्रीमद्भागवत गीता

जातस्त हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च।
 तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि॥

क्योंकि इस मान्यता के अनुसार जन्मे हुए की मृत्यु निश्चित है और मरे हुए का जन्म निश्चित है। इससे भी इस बिना उपाय वाले विषय में तू शोक करने योग्य नहीं है
 ॥27॥

~ श्लोक 27 - अध्याय 2 - गीता का सार

सोमवार, 6 जुलाई 2020

श्रीमद्भागवत गीता

अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम्‌।
 तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि॥

किन्तु यदि तू इस आत्मा को सदा जन्मने वाला तथा सदा मरने वाला मानता हो, तो भी हे महाबाहो! तू इस प्रकार शोक करने योग्य नहीं है
 ॥26॥

~ श्लोक 26 - अध्याय 2 - गीता का सार

रविवार, 5 जुलाई 2020

श्रीमद्भागवत गीता

अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते।
 तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि॥॥

यह आत्मा अव्यक्त है, यह आत्मा अचिन्त्य है और यह आत्मा विकाररहित कहा जाता है। इससे हे अर्जुन! इस आत्मा को उपर्युक्त प्रकार से जानकर तू शोक करने के योग्य नहीं है अर्थात्‌ तुझे शोक करना उचित नहीं है
 ॥25॥

~ श्लोक 25 - अध्याय 2 - गीता का सार

शनिवार, 4 जुलाई 2020

श्रीमद्भागवत गीता

अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च।
 नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः॥

क्योंकि यह आत्मा अच्छेद्य है, यह आत्मा अदाह्य, अक्लेद्य और निःसंदेह अशोष्य है तथा यह आत्मा नित्य, सर्वव्यापी, अचल, स्थिर रहने वाला और सनातन है
 ॥24॥

~ श्लोक 24 - अध्याय 2

बुधवार, 1 जुलाई 2020

श्रीमद्भागवत गीता

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।
 न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः॥

इस आत्मा को शस्त्र नहीं काट सकते, इसको आग नहीं जला सकती, इसको जल नहीं गला सकता और वायु नहीं सुखा सकता
 ॥23॥

~ श्लोक 23 - अध्याय 2 - गीता का सार