सोमवार, 27 जुलाई 2020

श्रीमद्भागवत गीता

यनेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवातो न विद्यते।
 स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्‌॥

इस कर्मयोग में आरंभ का अर्थात बीज का नाश नहीं है और उलटा फलरूप दोष भी नहीं है, बल्कि इस कर्मयोग रूप धर्म का थोड़ा-सा भी साधन जन्म-मृत्यु रूप महान भय से रक्षा कर लेता है
 ॥40॥

~ श्लोक 40 - अध्याय 2 - गीता का सार

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