सोमवार, 30 नवंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति।
 शब्दादीन्विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति॥

अन्य योगीजन श्रोत्र आदि समस्त इन्द्रियों को संयम रूप अग्नियों में हवन किया करते हैं और दूसरे योगी लोग शब्दादि समस्त विषयों को इन्द्रिय रूप अग्नियों में हवन किया करते हैं
 ॥26॥

~ श्लोक 26 - अध्याय 4 - दिव्य ज्ञान

शनिवार, 28 नवंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते।
 ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति॥

दूसरे योगीजन देवताओं के पूजनरूप यज्ञ का ही भलीभाँति अनुष्ठान किया करते हैं और अन्य योगीजन परब्रह्म परमात्मारूप अग्नि में अभेद दर्शनरूप यज्ञ द्वारा ही आत्मरूप यज्ञ का हवन किया करते हैं। (परब्रह्म परमात्मा में ज्ञान द्वारा एकीभाव से स्थित होना ही ब्रह्मरूप अग्नि में यज्ञ द्वारा यज्ञ को हवन करना है।)
 ॥25॥

~ श्लोक 25 - अध्याय 4 - दिव्य ज्ञान

शुक्रवार, 27 नवंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

( फलसहित पृथक-पृथक यज्ञों का कथन ) ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्रौ ब्रह्मणा हुतम्‌।
 ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना॥

जिस यज्ञ में अर्पण अर्थात स्रुवा आदि भी ब्रह्म है और हवन किए जाने योग्य द्रव्य भी ब्रह्म है तथा ब्रह्मरूप कर्ता द्वारा ब्रह्मरूप अग्नि में आहुति देना रूप क्रिया भी ब्रह्म है- उस ब्रह्मकर्म में स्थित रहने वाले योगी द्वारा प्राप्त किए जाने योग्य फल भी ब्रह्म ही हैं
 ॥24॥

~ श्लोक 24 - अध्याय 4 - दिव्य ज्ञान

गुरुवार, 26 नवंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

गतसङ्‍गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः।
 यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते॥

जिसकी आसक्ति सर्वथा नष्ट हो गई है, जो देहाभिमान और ममता से रहित हो गया है, जिसका चित्त निरन्तर परमात्मा के ज्ञान में स्थित रहता है- ऐसा केवल यज्ञसम्पादन के लिए कर्म करने वाले मनुष्य के सम्पूर्ण कर्म भलीभाँति विलीन हो जाते हैं
 ॥23॥

~ श्लोक 23 - अध्याय 4 - दिव्य ज्ञान

बुधवार, 25 नवंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

यदृच्छालाभसंतुष्टो द्वंद्वातीतो विमत्सरः।
 समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते॥

जो बिना इच्छा के अपने-आप प्राप्त हुए पदार्थ में सदा संतुष्ट रहता है, जिसमें ईर्ष्या का सर्वथा अभाव हो गया हो, जो हर्ष-शोक आदि द्वंद्वों से सर्वथा अतीत हो गया है- ऐसा सिद्धि और असिद्धि में सम रहने वाला कर्मयोगी कर्म करता हुआ भी उनसे नहीं बँधता
 ॥22॥

~ श्लोक 22 - अध्याय 4 - दिव्य ज्ञान

सोमवार, 23 नवंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः।
 कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किंचित्करोति सः॥

जो पुरुष समस्त कर्मों में और उनके फल में आसक्ति का सर्वथा त्याग करके संसार के आश्रय से रहित हो गया है और परमात्मा में नित्य तृप्त है, वह कर्मों में भलीभाँति बर्तता हुआ भी वास्तव में कुछ भी नहीं करता
 ॥20॥

~ श्लोक 20 - अध्याय 4 - दिव्य ज्ञान

रविवार, 22 नवंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

( योगी महात्मा पुरुषों के आचरण और उनकी महिमा ) यस्य सर्वे समारम्भाः कामसंकल्पवर्जिताः।
 ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पंडितं बुधाः॥

जिसके सम्पूर्ण शास्त्रसम्मत कर्म बिना कामना और संकल्प के होते हैं तथा जिसके समस्त कर्म ज्ञानरूप अग्नि द्वारा भस्म हो गए हैं, उस महापुरुष को ज्ञानीजन भी पंडित कहते हैं
 ॥19॥

~ श्लोक 19 - अध्याय 4 - दिव्य ज्ञान

शुक्रवार, 20 नवंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

कर्मण्य कर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः।
 स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत्‌॥

जो मनुष्य कर्म में अकर्म देखता है और जो अकर्म में कर्म देखता है, वह मनुष्यों में बुद्धिमान है और वह योगी समस्त कर्मों को करने वाला है
 ॥18॥

~ श्लोक 18 - अध्याय 4 - दिव्य ज्ञान

गुरुवार, 19 नवंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः।
 अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः॥

कर्म का स्वरूप भी जानना चाहिए और अकर्मण का स्वरूप भी जानना चाहिए तथा विकर्म का स्वरूप भी जानना चाहिए क्योंकि कर्म की गति गहन है
 ॥17॥

~ श्लोक 17 - अध्याय 4 - दिव्य ज्ञान

बुधवार, 18 नवंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः।
 तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्‌॥

कर्म क्या है? और अकर्म क्या है? इस प्रकार इसका निर्णय करने में बुद्धिमान पुरुष भी मोहित हो जाते हैं। इसलिए वह कर्मतत्व मैं तुझे भलीभाँति समझाकर कहूँगा, जिसे जानकर तू अशुभ से अर्थात कर्मबंधन से मुक्त हो जाएगा
 ॥16॥

~ श्लोक 16 - अध्याय 4 - दिव्य ज्ञान

मंगलवार, 17 नवंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः।
 कुरु कर्मैव तस्मात्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम्‌॥

पूर्वकाल में मुमुक्षुओं ने भी इस प्रकार जानकर ही कर्म किए हैं, इसलिए तू भी पूर्वजों द्वारा सदा से किए जाने वाले कर्मों को ही कर
 ॥15॥

~ श्लोक 15 - अध्याय 4 - दिव्य ज्ञान

सोमवार, 16 नवंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा।
 इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते॥

कर्मों के फल में मेरी स्पृहा नहीं है, इसलिए मुझे कर्म लिप्त नहीं करते- इस प्रकार जो मुझे तत्व से जान लेता है, वह भी कर्मों से नहीं बँधता
 ॥14॥

~ श्लोक 14 - अध्याय 4 - दिव्य ज्ञान

शुक्रवार, 13 नवंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

काङ्‍क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः।
 क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा॥

इस मनुष्य लोक में कर्मों के फल को चाहने वाले लोग देवताओं का पूजन किया करते हैं क्योंकि उनको कर्मों से उत्पन्न होने वाली सिद्धि शीघ्र मिल जाती है
 ॥12॥

~ श्लोक 12 - अध्याय 4 - दिव्य ज्ञान

गुरुवार, 12 नवंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

ये यथा माँ प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्‌।
 मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥

हे अर्जुन! जो भक्त मुझे जिस प्रकार भजते हैं, मैं भी उनको उसी प्रकार भजता हूँ क्योंकि सभी मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं
 ॥11॥

~ श्लोक 11 - अध्याय 4 - दिव्य ज्ञान

मंगलवार, 10 नवंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

वीतरागभय क्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः।
 बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः॥

पहले भी, जिनके राग, भय और क्रोध सर्वथा नष्ट हो गए थे और जो मुझ में अनन्य प्रेमपूर्वक स्थित रहते थे, ऐसे मेरे आश्रित रहने वाले बहुत से भक्त उपर्युक्त ज्ञान रूप तप से पवित्र होकर मेरे स्वरूप को प्राप्त हो चुके हैं
 ॥10॥

~ श्लोक 10 - अध्याय 4 - दिव्य ज्ञान

सोमवार, 9 नवंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्वतः।
 त्यक्तवा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन॥

हे अर्जुन! मेरे जन्म और कर्म दिव्य अर्थात निर्मल और अलौकिक हैं- इस प्रकार जो मनुष्य तत्व से (सर्वशक्तिमान, सच्चिदानन्दन परमात्मा अज, अविनाशी और सर्वभूतों के परम गति तथा परम आश्रय हैं, वे केवल धर्म को स्थापन करने और संसार का उद्धार करने के लिए ही अपनी योगमाया से सगुणरूप होकर प्रकट होते हैं। इसलिए परमेश्वर के समान सुहृद्, प्रेमी और पतितपावन दूसरा कोई नहीं है, ऐसा समझकर जो पुरुष परमेश्वर का अनन्य प्रेम से निरन्तर चिन्तन करता हुआ आसक्तिरहित संसार में बर्तता है, वही उनको तत्व से जानता है।) जान लेता है, वह शरीर को त्याग कर फिर जन्म को प्राप्त नहीं होता, किन्तु मुझे ही प्राप्त होता है
 ॥9॥

~ श्लोक 9 - अध्याय 4 - दिव्य ज्ञान

रविवार, 8 नवंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्‌।
 धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥

साधु पुरुषों का उद्धार करने के लिए, पाप कर्म करने वालों का विनाश करने के लिए और धर्म की अच्छी तरह से स्थापना करने के लिए मैं युग-युग में प्रकट हुआ करता हूँ
 ॥9॥

~ श्लोक 8 - अध्याय 4 - दिव्य ज्ञान

शुक्रवार, 6 नवंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
 अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्‌॥

हे भारत! जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब ही मैं अपने रूप को रचता हूँ अर्थात साकार रूप से लोगों के सम्मुख प्रकट होता हूँ
 ॥7॥

~ श्लोक 7 - अध्याय 4 - दिव्य ज्ञान

गुरुवार, 5 नवंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्‌।
 प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया॥

मैं अजन्मा और अविनाशीस्वरूप होते हुए भी तथा समस्त प्राणियों का ईश्वर होते हुए भी अपनी प्रकृति को अधीन करके अपनी योगमाया से प्रकट होता हूँ
 ॥6॥

~ श्लोक 6 - अध्याय 4 - दिव्य ज्ञान

बुधवार, 4 नवंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

श्रीभगवानुवाच बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन।
 तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप॥

श्री भगवान बोले- हे परंतप अर्जुन! मेरे और तेरे बहुत से जन्म हो चुके हैं। उन सबको तू नहीं जानता, किन्तु मैं जानता हूँ
 ॥5॥

~ श्लोक 5 - अध्याय 4 - दिव्य ज्ञान

मंगलवार, 3 नवंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

अर्जुन उवाच अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः।
 कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति॥

अर्जुन बोले- आपका जन्म तो अर्वाचीन-अभी हाल का है और सूर्य का जन्म बहुत पुराना है अर्थात कल्प के आदि में हो चुका था। तब मैं इस बात को कैसे समूझँ कि आप ही ने कल्प के आदि में सूर्य से यह योग कहा था?
 ॥4॥

~ श्लोक 4 - अध्याय 4 - दिव्य ज्ञान

सोमवार, 2 नवंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः।
 भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम्‌॥

तू मेरा भक्त और प्रिय सखा है, इसलिए वही यह पुरातन योग आज मैंने तुझको कहा है क्योंकि यह बड़ा ही उत्तम रहस्य है अर्थात गुप्त रखने योग्य विषय है
 ॥3॥

~ श्लोक 3 - अध्याय 4 - दिव्य ज्ञान

रविवार, 1 नवंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः।
 स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप॥

हे परन्तप अर्जुन! इस प्रकार परम्परा से प्राप्त इस योग को राजर्षियों ने जाना, किन्तु उसके बाद वह योग बहुत काल से इस पृथ्वी लोक में लुप्तप्राय हो गया
 ॥2॥

~ श्लोक 2 - अध्याय 4 - दिव्य ज्ञान