गुरुवार, 5 नवंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्‌।
 प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया॥

मैं अजन्मा और अविनाशीस्वरूप होते हुए भी तथा समस्त प्राणियों का ईश्वर होते हुए भी अपनी प्रकृति को अधीन करके अपनी योगमाया से प्रकट होता हूँ
 ॥6॥

~ श्लोक 6 - अध्याय 4 - दिव्य ज्ञान

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