रविवार, 28 फ़रवरी 2021

श्रीमद्भागवत गीता

यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्‌।
 ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्‌॥

यह स्थिर न रहने वाला और चंचल मन जिस-जिस शब्दादि विषय के निमित्त से संसार में विचरता है, उस-उस विषय से रोककर यानी हटाकर इसे बार-बार परमात्मा में ही निरुद्ध करे
 ॥26॥

~ श्लोक 26 - अध्याय 6 - ध्यानयोग

शनिवार, 27 फ़रवरी 2021

श्रीमद्भागवत गीता

शनैः शनैरुपरमेद्‍बुद्धया धृतिगृहीतया।
 आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किंचिदपि चिन्तयेत्‌॥

क्रम-क्रम से अभ्यास करता हुआ उपरति को प्राप्त हो तथा धैर्ययुक्त बुद्धि द्वारा मन को परमात्मा में स्थित करके परमात्मा के सिवा और कुछ भी चिन्तन न करे
 ॥25॥

~ श्लोक 25 - अध्याय 6 - ध्यानयोग

शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2021

श्रीमद्भागवत गीता

सङ्‍कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः।
 मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः॥

संकल्प से उत्पन्न होने वाली सम्पूर्ण कामनाओं को निःशेष रूप से त्यागकर और मन द्वारा इन्द्रियों के समुदाय को सभी ओर से भलीभाँति रोककर
 ॥24॥

~ श्लोक 24 - अध्याय 6 - ध्यानयोग

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2021

श्रीमद्भागवत गीता

तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसञ्ज्ञितम्।
 स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा॥

जो दुःखरूप संसार के संयोग से रहित है तथा जिसका नाम योग है, उसको जानना चाहिए। वह योग न उकताए हुए अर्थात धैर्य और उत्साहयुक्त चित्त से निश्चयपूर्वक करना कर्तव्य है
 ॥23॥

~ श्लोक 23 - अध्याय 6 - ध्यानयोग

बुधवार, 24 फ़रवरी 2021

श्रीमद्भागवतगीता

यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः।
 यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते॥

परमात्मा की प्राप्ति रूप जिस लाभ को प्राप्त होकर उसे अधिक दूसरा कुछ भी लाभ नहीं मानता और परमात्मा प्राप्ति रूप जिस अवस्था में स्थित योगी बड़े भारी दुःख से भी चलायमान नहीं होता
 ॥22॥

~ श्लोक 22 - अध्याय 6 - ध्यानयोग

मंगलवार, 23 फ़रवरी 2021

श्रीमद्भागवत गीता

सुखमात्यन्तिकं यत्तद्‍बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम्‌।
 वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः॥

इन्द्रियों से अतीत, केवल शुद्ध हुई सूक्ष्म बुद्धि द्वारा ग्रहण करने योग्य जो अनन्त आनन्द है, उसको जिस अवस्था में अनुभव करता है, और जिस अवस्था में स्थित यह योगी परमात्मा के स्वरूप से विचलित होता ही नहीं
 ॥21॥

~ श्लोक 21 - अध्याय 6 - ध्यानयोग

सोमवार, 22 फ़रवरी 2021

श्रीमद्भागवत गीता

यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया।
 यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति॥

योग के अभ्यास से निरुद्ध चित्त जिस अवस्था में उपराम हो जाता है और जिस अवस्था में परमात्मा के ध्यान से शुद्ध हुई सूक्ष्म बुद्धि द्वारा परमात्मा को साक्षात करता हुआ सच्चिदानन्दघन परमात्मा में ही सन्तुष्ट रहता है
 ॥20॥

~ श्लोक 20 - अध्याय 6 - ध्यानयोग

रविवार, 21 फ़रवरी 2021

श्रीमद्भागवत गीता

यथा दीपो निवातस्थो नेंगते सोपमा स्मृता।
 योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः॥

जिस प्रकार वायुरहित स्थान में स्थित दीपक चलायमान नहीं होता, वैसी ही उपमा परमात्मा के ध्यान में लगे हुए योगी के जीते हुए चित्त की कही गई है
 ॥19॥

~ श्लोक 19 - अध्याय 6 - ध्यानयोग

श्रीमद्भागवत गीता

यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते।
 निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा॥

अत्यन्त वश में किया हुआ चित्त जिस काल में परमात्मा में ही भलीभाँति स्थित हो जाता है, उस काल में सम्पूर्ण भोगों से स्पृहारहित पुरुष योगयुक्त है, ऐसा कहा जाता है
 ॥18॥

~ श्लोक 18 - अध्याय 6 - ध्यानयोग

शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2021

श्रीमद्भागवत गीता

युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।
 युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा॥

दुःखों का नाश करने वाला योग तो यथायोग्य आहार-विहार करने वाले का, कर्मों में यथायोग्य चेष्टा करने वाले का और यथायोग्य सोने तथा जागने वाले का ही सिद्ध होता है
 ॥17॥

~ श्लोक 17 - अध्याय 6 - ध्यानयोग

गुरुवार, 18 फ़रवरी 2021

श्रीमद्भागवत गीता

नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः।
 न चाति स्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन॥

हे अर्जुन! यह योग न तो बहुत खाने वाले का, न बिलकुल न खाने वाले का, न बहुत शयन करने के स्वभाव वाले का और न सदा जागने वाले का ही सिद्ध होता है
 ॥16॥

~ श्लोक 16 - अध्याय 6 - ध्यानयोग

बुधवार, 17 फ़रवरी 2021

श्रीमद्भागवत गीता

युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानसः।
 शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति॥

वश में किए हुए मनवाला योगी इस प्रकार आत्मा को निरंतर मुझ परमेश्वर के स्वरूप में लगाता हुआ मुझमें रहने वाली परमानन्द की पराकाष्ठारूप शान्ति को प्राप्त होता है
 ॥15॥

~ श्लोक 15 - अध्याय 6 - ध्यानयोग

मंगलवार, 16 फ़रवरी 2021

श्रीमद्भागवत गीता

प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः।
 मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः॥

ब्रह्मचारी के व्रत में स्थित, भयरहित तथा भलीभाँति शांत अन्तःकरण वाला सावधान योगी मन को रोककर मुझमें चित्तवाला और मेरे परायण होकर स्थित होए
 ॥14॥

~ श्लोक 14 - अध्याय 6 - ध्यानयोग

सोमवार, 15 फ़रवरी 2021

श्रीमद्भागवत गीता

समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः।
 सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन्‌॥

काया, सिर और गले को समान एवं अचल धारण करके और स्थिर होकर, अपनी नासिका के अग्रभाग पर दृष्टि जमाकर, अन्य दिशाओं को न देखता हुआ
 ॥13॥

~ श्लोक 13 - अध्याय 6 - ध्यानयोग

रविवार, 14 फ़रवरी 2021

श्रीमद्भागवत गीता

तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः।
 उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये॥

उस आसन पर बैठकर चित्त और इन्द्रियों की क्रियाओं को वश में रखते हुए मन को एकाग्र करके अन्तःकरण की शुद्धि के लिए योग का अभ्यास करे
 ॥12॥

~ श्लोक 12 - अध्याय 6 - ध्यानयोग

शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2021

श्रीमद्भागवत गीता

( विस्तार से ध्यान योग का विषय ) 
 शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः।
 नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम्‌॥

शुद्ध भूमि में, जिसके ऊपर क्रमशः कुशा, मृगछाला और वस्त्र बिछे हैं, जो न बहुत ऊँचा है और न बहुत नीचा, ऐसे अपने आसन को स्थिर स्थापन करके
 ॥11॥

~ श्लोक 11 - अध्याय 6 - ध्यानयोग

बुधवार, 10 फ़रवरी 2021

श्रीमद्भागवत गीता

सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु।
 साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते॥

सुहृद् (स्वार्थ रहित सबका हित करने वाला), मित्र, वैरी, उदासीन (पक्षपातरहित), मध्यस्थ (दोनों ओर की भलाई चाहने वाला), द्वेष्य और बन्धुगणों में, धर्मात्माओं में और पापियों में भी समान भाव रखने वाला अत्यन्त श्रेष्ठ है
 ॥9॥

~ श्लोक 9 - अध्याय 6 - ध्यानयोग

मंगलवार, 9 फ़रवरी 2021

श्रीमद्भागवत गीता

ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः।
 युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकांचनः॥

जिसका अन्तःकरण ज्ञान-विज्ञान से तृप्त है, जिसकी स्थिति विकाररहित है, जिसकी इन्द्रियाँ भलीभाँति जीती हुई हैं और जिसके लिए मिट्टी, पत्थर और सुवर्ण समान हैं, वह योगी युक्त अर्थात भगवत्प्राप्त है, ऐसे कहा जाता है
 ॥8॥

~ श्लोक 8 - अध्याय 6 - ध्यानयोग

रविवार, 7 फ़रवरी 2021

श्रीमद्भागवत गीता

जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः।

 शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः॥


सरदी-गरमी और सुख-दुःखादि में तथा मान और अपमान में जिसके अन्तःकरण की वृत्तियाँ भलीभाँति शांत हैं, ऐसे स्वाधीन आत्मावाले पुरुष के ज्ञान में सच्चिदानन्दघन परमात्मा सम्यक्‌ प्रकार से स्थित है अर्थात उसके ज्ञान में परमात्मा के सिवा अन्य कुछ है ही नहीं

 ॥7॥


~ श्लोक 7 - अध्याय 6 - ध्यानयोग

शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2021

श्रीमद्भागवत गीता

बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः।
 अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत्‌॥

जिस जीवात्मा द्वारा मन और इन्द्रियों सहित शरीर जीता हुआ है, उस जीवात्मा का तो वह आप ही मित्र है और जिसके द्वारा मन तथा इन्द्रियों सहित शरीर नहीं जीता गया है, उसके लिए वह आप ही शत्रु के सदृश शत्रुता में बर्तता है
 ॥6॥

~ श्लोक 6 - अध्याय 6 - ध्यानयोग

गुरुवार, 4 फ़रवरी 2021

श्रीमद्भागवत गीता

( आत्म-उद्धार के लिए प्रेरणा और भगवत्प्राप्त पुरुष के लक्षण ) 
 उद्धरेदात्मनाऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्‌।
 आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥

अपने द्वारा अपना संसार-समुद्र से उद्धार करे और अपने को अधोगति में न डाले क्योंकि यह मनुष्य आप ही तो अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु है
 ॥5॥

~ श्लोक 5 - अध्याय 6 - ध्यानयोग

बुधवार, 3 फ़रवरी 2021

श्रीमद्भागवत गीता

यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते।
 सर्वसङ्‍कल्पसन्न्यासी योगारूढ़स्तदोच्यते॥

जिस काल में न तो इन्द्रियों के भोगों में और न कर्मों में ही आसक्त होता है, उस काल में सर्वसंकल्पों का त्यागी पुरुष योगारूढ़ कहा जाता है
 ॥4॥

~ श्लोक 4 - अध्याय 6 - ध्यानयोग

मंगलवार, 2 फ़रवरी 2021

श्रीमद्भागवत गीता

आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते।
 योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते॥

योग में आरूढ़ होने की इच्छा वाले मननशील पुरुष के लिए योग की प्राप्ति में निष्काम भाव से कर्म करना ही हेतु कहा जाता है और योगारूढ़ हो जाने पर उस योगारूढ़ पुरुष का जो सर्वसंकल्पों का अभाव है, वही कल्याण में हेतु कहा जाता है
 ॥3॥

~ श्लोक 3 - अध्याय 6 - ध्यानयोग

सोमवार, 1 फ़रवरी 2021

श्रीमद्भागवत गीता

यं सन्न्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव।
 न ह्यसन्न्यस्तसङ्‍कल्पो योगी भवति कश्चन॥

हे अर्जुन! जिसको संन्यास (गीता अध्याय 3 श्लोक 3 की टिप्पणी में इसका खुलासा अर्थ लिखा है।) ऐसा कहते हैं, उसी को तू योग (गीता अध्याय 3 श्लोक 3 की टिप्पणी में इसका खुलासा अर्थ लिखा है।) जान क्योंकि संकल्पों का त्याग न करने वाला कोई भी पुरुष योगी नहीं होता
 ॥2॥

~ श्लोक 2 - अध्याय 6 - ध्यानयोग