बुधवार, 24 फ़रवरी 2021

श्रीमद्भागवतगीता

यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः।
 यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते॥

परमात्मा की प्राप्ति रूप जिस लाभ को प्राप्त होकर उसे अधिक दूसरा कुछ भी लाभ नहीं मानता और परमात्मा प्राप्ति रूप जिस अवस्था में स्थित योगी बड़े भारी दुःख से भी चलायमान नहीं होता
 ॥22॥

~ श्लोक 22 - अध्याय 6 - ध्यानयोग

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