शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2021

श्रीमद्भागवत गीता

युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।
 युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा॥

दुःखों का नाश करने वाला योग तो यथायोग्य आहार-विहार करने वाले का, कर्मों में यथायोग्य चेष्टा करने वाले का और यथायोग्य सोने तथा जागने वाले का ही सिद्ध होता है
 ॥17॥

~ श्लोक 17 - अध्याय 6 - ध्यानयोग

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