सोमवार, 1 फ़रवरी 2021

श्रीमद्भागवत गीता

यं सन्न्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव।
 न ह्यसन्न्यस्तसङ्‍कल्पो योगी भवति कश्चन॥

हे अर्जुन! जिसको संन्यास (गीता अध्याय 3 श्लोक 3 की टिप्पणी में इसका खुलासा अर्थ लिखा है।) ऐसा कहते हैं, उसी को तू योग (गीता अध्याय 3 श्लोक 3 की टिप्पणी में इसका खुलासा अर्थ लिखा है।) जान क्योंकि संकल्पों का त्याग न करने वाला कोई भी पुरुष योगी नहीं होता
 ॥2॥

~ श्लोक 2 - अध्याय 6 - ध्यानयोग

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