गुरुवार, 25 फ़रवरी 2021

श्रीमद्भागवत गीता

तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसञ्ज्ञितम्।
 स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा॥

जो दुःखरूप संसार के संयोग से रहित है तथा जिसका नाम योग है, उसको जानना चाहिए। वह योग न उकताए हुए अर्थात धैर्य और उत्साहयुक्त चित्त से निश्चयपूर्वक करना कर्तव्य है
 ॥23॥

~ श्लोक 23 - अध्याय 6 - ध्यानयोग

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