सोमवार, 15 फ़रवरी 2021

श्रीमद्भागवत गीता

समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः।
 सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन्‌॥

काया, सिर और गले को समान एवं अचल धारण करके और स्थिर होकर, अपनी नासिका के अग्रभाग पर दृष्टि जमाकर, अन्य दिशाओं को न देखता हुआ
 ॥13॥

~ श्लोक 13 - अध्याय 6 - ध्यानयोग

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