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शनिवार, 18 जुलाई 2020
श्रीमद्भागवत गीता
अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं सङ्ग्रामं न करिष्यसि।
ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि॥
किन्तु यदि तू इस धर्मयुक्त युद्ध को नहीं करेगा तो स्वधर्म और कीर्ति को खोकर पाप को प्राप्त होगा
॥33॥
~ श्लोक 33 - अध्याय 2 - गीता का सार
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