मंगलवार, 28 जनवरी 2020

श्रीमद्भागवत गीता

गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्वक्चैव परिदह्यते।
 न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः॥

हाथ से गांडीव धनुष गिर रहा है और त्वचा भी बहुत जल रही है तथा मेरा मन भ्रमित-सा हो रहा है, इसलिए मैं खड़ा रहने को भी समर्थ नहीं हूँ
 ॥30॥

~ श्लोक 30 - अध्याय 1 

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