शुक्रवार, 22 जनवरी 2021

श्रीमद्भागवत गीता

शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात्‌।
 कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः॥

जो साधक इस मनुष्य शरीर में, शरीर का नाश होने से पहले-पहले ही काम-क्रोध से उत्पन्न होने वाले वेग को सहन करने में समर्थ हो जाता है, वही पुरुष योगी है और वही सुखी है
 ॥23॥

~ श्लोक 23 - अध्याय 5 - कर्मयोग-कृष्णभावनाभावित कर्म

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