गुरुवार, 18 मार्च 2021

श्रीमद्भागवत गीता

श्रीभगवानुवाच 
 पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते।
 न हि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति॥

श्री भगवान बोले- हे पार्थ! उस पुरुष का न तो इस लोक में नाश होता है और न परलोक में ही क्योंकि हे प्यारे! आत्मोद्धार के लिए अर्थात भगवत्प्राप्ति के लिए कर्म करने वाला कोई भी मनुष्य दुर्गति को प्राप्त नहीं होता
 ॥40॥

~ श्लोक 40 - अध्याय 6 - ध्यानयोग

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