गुरुवार, 11 मार्च 2021

श्रीमद्भागवत गीता

श्रीभगवानुवाच 
 असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्‌।
 अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते॥

श्री भगवान बोले- हे महाबाहो! निःसंदेह मन चंचल और कठिनता से वश में होने वाला है। परन्तु हे कुंतीपुत्र अर्जुन! यह अभ्यास (गीता अध्याय 12 श्लोक 9 की टिप्पणी में इसका विस्तार देखना चाहिए।) और वैराग्य से वश में होता है
 ॥35॥

~ श्लोक 35 - अध्याय 6 - ध्यानयोग

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