रविवार, 14 मार्च 2021

श्रीमद्भागवत गीता

असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः।
 वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः॥

जिसका मन वश में किया हुआ नहीं है, ऐसे पुरुष द्वारा योग दुष्प्राप्य है और वश में किए हुए मन वाले प्रयत्नशील पुरुष द्वारा साधन से उसका प्राप्त होना सहज है- यह मेरा मत है
 ॥36॥

~ श्लोक 36 - अध्याय 6 - ध्यानयोग

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