सोमवार, 15 जून 2020

श्रीमद्भागवत गीता

मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः।
 आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत॥

हे कुंतीपुत्र! सर्दी-गर्मी और सुख-दुःख को देने वाले इन्द्रिय और विषयों के संयोग तो उत्पत्ति-विनाशशील और अनित्य हैं, इसलिए हे भारत! उनको तू सहन कर
 ॥14॥

~ श्लोक 14 - अध्याय 2 

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