गुरुवार, 17 सितंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्‌।
 कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः॥

निःसंदेह कोई भी मनुष्य किसी भी काल में क्षणमात्र भी बिना कर्म किए नहीं रहता क्योंकि सारा मनुष्य समुदाय प्रकृति जनित गुणों द्वारा परवश हुआ कर्म करने के लिए बाध्य किया जाता है
 ॥5॥

~ श्लोक 5 - अध्याय 3 - कर्मयोग

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