शुक्रवार, 7 फ़रवरी 2020

श्रीमद्भागवत गीता

अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः।
 स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसंकरः॥

हे कृष्ण! पाप के अधिक बढ़ जाने से कुल की स्त्रियाँ अत्यन्त दूषित हो जाती हैं और हे वार्ष्णेय! स्त्रियों के दूषित हो जाने पर वर्णसंकर उत्पन्न होता है
 ॥41॥

~ श्लोक 41 - अध्याय 1

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