सोमवार, 18 मई 2020

श्रीमद्भागवत गीता

प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते।
 प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते॥

अन्तःकरण की प्रसन्नता होने पर इसके सम्पूर्ण दुःखों का अभाव हो जाता है और उस प्रसन्नचित्त वाले कर्मयोगी की बुद्धि शीघ्र ही सब ओर से हटकर एक परमात्मा में ही भलीभाँति स्थिर हो जाती है
 ॥65॥

~ श्लोक 65 - अध्याय 2 

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