मंगलवार, 18 अगस्त 2020

श्रीमद्भागवत गीता

दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः।
 वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते॥

दुःखों की प्राप्ति होने पर जिसके मन में उद्वेग नहीं होता, सुखों की प्राप्ति में सर्वथा निःस्पृह है तथा जिसके राग, भय और क्रोध नष्ट हो गए हैं, ऐसा मुनि स्थिरबुद्धि कहा जाता है
 ॥56॥

~ श्लोक 56 - अध्याय 2 - गीता का सार

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