शुक्रवार, 28 अगस्त 2020

श्रीमद्भागवत गीता

नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना।
 न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम्‌॥

न जीते हुए मन और इन्द्रियों वाले पुरुष में निश्चयात्मिका बुद्धि नहीं होती और उस अयुक्त मनुष्य के अन्तःकरण में भावना भी नहीं होती तथा भावनाहीन मनुष्य को शान्ति नहीं मिलती और शान्तिरहित मनुष्य को सुख कैसे मिल सकता है?
 ॥66॥

~ श्लोक 66 - अध्याय 2 - गीता का सार

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