बुधवार, 5 अगस्त 2020

श्रीमद्भागवत गीता

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
 मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि॥

तेरा कर्म करने में ही अधिकार है, उसके फलों में कभी नहीं। इसलिए तू कर्मों के फल हेतु मत हो तथा तेरी कर्म न करने में भी आसक्ति न हो
 ॥47॥

~ श्लोक 47 - अध्याय 2 - गीता का सार

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