मंगलवार, 11 अगस्त 2020

श्रीमद्भागवत गीता

दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनंजय।
 बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः॥

इस समत्वरूप बुद्धियोग से सकाम कर्म अत्यन्त ही निम्न श्रेणी का है। इसलिए हे धनंजय! तू समबुद्धि में ही रक्षा का उपाय ढूँढ अर्थात्‌ बुद्धियोग का ही आश्रय ग्रहण कर क्योंकि फल के हेतु बनने वाले अत्यन्त दीन हैं
 ॥49॥

~ श्लोक 49 - अध्याय 2 - गीता का सार

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