सोमवार, 5 अक्टूबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः।
 लोकसंग्रहमेवापि सम्पश्यन्कर्तुमर्हसि॥

जनकादि ज्ञानीजन भी आसक्ति रहित कर्मद्वारा ही परम सिद्धि को प्राप्त हुए थे, इसलिए तथा लोकसंग्रह को देखते हुए भी तू कर्म करने के ही योग्य है अर्थात तुझे कर्म करना ही उचित है
 ॥20॥

~ श्लोक 20 - अध्याय 3 - कर्मयोग

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