सोमवार, 19 अक्टूबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम्‌।
 सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः॥

परन्तु जो मनुष्य मुझमें दोषारोपण करते हुए मेरे इस मत के अनुसार नहीं चलते हैं, उन मूर्खों को तू सम्पूर्ण ज्ञानों में मोहित और नष्ट हुए ही समझ
 ॥32॥

~ श्लोक 32 - अध्याय 3 - कर्मयोग

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