शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

प्रकृतेर्गुणसम्मूढ़ाः सज्जन्ते गुणकर्मसु।
 तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्न विचालयेत्‌॥

प्रकृति के गुणों से अत्यन्त मोहित हुए मनुष्य गुणों में और कर्मों में आसक्त रहते हैं, उन पूर्णतया न समझने वाले मन्दबुद्धि अज्ञानियों को पूर्णतया जानने वाला ज्ञानी विचलित न करे
 ॥29॥

~ श्लोक 29 - अध्याय 3 - कर्मयोग

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