बुधवार, 30 दिसंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

साङ्‍ख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः।
 एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम्‌॥

उपर्युक्त संन्यास और कर्मयोग को मूर्ख लोग पृथक्‌-पृथक् फल देने वाले कहते हैं न कि पण्डितजन, क्योंकि दोनों में से एक में भी सम्यक्‌ प्रकार से स्थित पुरुष दोनों के फलरूप परमात्मा को प्राप्त होता है
 ॥4॥

~ श्लोक 4 - अध्याय 5 - कर्मयोग-कृष्णभावनाभावित कर्म

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