गुरुवार, 17 दिसंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।
 तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति॥

इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला निःसंदेह कुछ भी नहीं है। उस ज्ञान को कितने ही काल से कर्मयोग द्वारा शुद्धान्तःकरण हुआ मनुष्य अपने-आप ही आत्मा में पा लेता है
 ॥38॥

~ श्लोक 38 - अध्याय 4 - दिव्य ज्ञान

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