शुक्रवार, 4 दिसंबर 2020

श्रीमद्भागवत गीता

यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम्‌।
 नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम॥

हे कुरुश्रेष्ठ अर्जुन! यज्ञ से बचे हुए अमृत का अनुभव करने वाले योगीजन सनातन परब्रह्म परमात्मा को प्राप्त होते हैं। और यज्ञ न करने वाले पुरुष के लिए तो यह मनुष्यलोक भी सुखदायक नहीं है, फिर परलोक कैसे सुखदायक हो सकता है?
 ॥31॥

~ श्लोक 31 - अध्याय 4 - दिव्य ज्ञान

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