मंगलवार, 3 मार्च 2020

श्रीमद्भागवत गीता

यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ।
 समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते॥

क्योंकि हे पुरुषश्रेष्ठ! दुःख-सुख को समान समझने वाले जिस धीर पुरुष को ये इन्द्रिय और विषयों के संयोग व्याकुल नहीं करते, वह मोक्ष के योग्य होता है
 ॥15॥

~ श्लोक 15 - अध्याय 2

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