बुधवार, 11 मार्च 2020

श्रीमद्भागवत गीता

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय
 नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।
 तथा शरीराणि विहाय जीर्णा-
 न्यन्यानि संयाति नवानि देही॥

जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर दूसरे नए वस्त्रों को ग्रहण करता है, वैसे ही जीवात्मा पुराने शरीरों को त्यागकर दूसरे नए शरीरों को प्राप्त होता है
 ॥22॥

~ श्लोक 22 - अध्याय 2 

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