रविवार, 1 दिसंबर 2019

श्रीमद्भागवत गीता

व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन। बहुशाका ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम्‌॥ हे अर्जुन! इस कर्मयोग में निश्चयात्मिका बुद्धि एक ही होती है, किन्तु अस्थिर विचार वाले विवेकहीन सकाम मनुष्यों की बुद्धियाँ निश्चय ही बहुत भेदों वाली और अनन्त होती हैं ॥41॥ ~ श्लोक 41 - अध्याय 2

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