मंगलवार, 17 दिसंबर 2019

श्रीमद्भागवत गीता

यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम्‌। नाभिनंदति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥ जो पुरुष सर्वत्र स्नेहरहित हुआ उस-उस शुभ या अशुभ वस्तु को प्राप्त होकर न प्रसन्न होता है और न द्वेष करता है, उसकी बुद्धि स्थिर है ॥57॥ ~ श्लोक 57 - अध्याय 2

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